अमावस की तमस भरी रात जगमगाने लगी थी स उस बच्चे का मन अभी बिजली की लड़ियों में ही उलझा था स जैसे ही दीपों से सजी थालियां छतों -छज्जों और द्वार पर सजने लगीं उस बच्चे का ध्यान बिजली की चकाचौंध से हटकर दीपों की ओर आकृष्ट हो गया और वह जैसे स्वयं दीया बन गया स उसकी दृष्टि हट ही नहीं रही थी , वह दरवाजे पर देर तक खड़ा रहा स तभी उसके कानों में ध्वनि सुनाई दी श्ना जाने किस नीयत से यह लड़का खड़ा है श् और तपाक से थप्पड़ जड़े जाने की गूँज से वह विचलित हो गया स उसे लगा ,जलता दीपक बुझ गया है स किन्तु उसने अपने गाल पर हाथ फेरा , पीड़ा को सहलाया स और कुछ दूर नजर बचाकर फिर खड़ा हो गया स
बम -पटाखे फूटे और लोग इधर -उधर हो गए स उसने देखा -जलते दीये हवा में बुझ गए थे स किन्तु तेल दीयों में अभी भी भरा था स बच्चा जल्दी -जल्दी दीयों का तेल एक शीशी में इकठ्ठा करने लगा स आज इस तेल से वह माँ के पैर की मालिश करेगा , सब्जी में छौंक लगाएगा , दो पराठे बनाएगा , एक माँ को खिलायेगा ,एक खुद खायेगा ,दीवाली मनाएगा स

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