"ये विधर्मी गौमाता का माँस खा रहे हैं, तो हम क्या चुप बैठेंगे? जो हमारे लिये पूज्यनीय है उसकी हत्या करने की सज़ा हम देंगे ही।" उसकी आँखों में खून उतर आया था, आवाज़ में चीख के साथ-साथ, अपने लोगों की भीड़ देखकर, बहुत जोश भी भरा हुआ था।


"ये लोग गौमाता को जहाँ से लेकर आते हैं, वो जड़ ही खत्म कर देनी चाहिये" सामने खड़ी भीड़ में से किसी ने कहा।


"गौमाता को बेचता कौन है?" तीसरे ने पूछा।


सब चुप हो गये, किसी के पास जवाब नहीं था।


"मुझे पता है..." एक वृद्ध व्यक्ति बोला।


सभी का प्रश्नवाचक चेहरा उसकी ओर घूम गया.. और उसने कहा,

"हम में से वो सब दोषी हैं, जो बूढी गाय को हमेशा के लिए घर से निकाल देते हैं और जवान गाय को सवेरे-सवेरे दुह कर, भटकने वाले आवारा-पशु को तो कोई भी उठा..."


बात ख़त्म होने से पहले ही भीड़ में किसी ने उसे धक्का दे दिया।

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