दिसम्बर शुरू हो चुका था। खेतों से ईख कट चुकी थी या कट रही थी।

इधर-उधर ईख का जलावन झुंड के झुंड रूप में बिखरा पड़ा था। रात्रि अपने चरम पर थी। यदा-कदा कुत्ते और सियारों की आवाज से गांव गूंज उठता था या कभी-कभी चमगादड़ आवाज करते तेजी से उड़ जाते थे। उसके अलावा स्तब्धता और शांति ऐसी कि कइयों मील दूर जाती रेलगाड़ी के चलने की आवाज तक स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी। जब रेल का हॉर्न बजता तो उसकी गूंज से कुत्ते और सियार प्रतिस्पर्धा में अपना सम्मिलित स्वर निकालते थे।

अकस्मात वो सन्नाटा टूटा। हांफते हुए किसी के एक जोड़ी पैरों के तेजी से भागने की पदचाप कुत्तों के कानों में पड़ी। कुत्ते कान खड़े कर सावधान हो गए। अगहन (अग्रहायण अथवा मार्गशीर्ष) के महीने की बदली भरी अमावस के आस-पास की अंधेरी रातों में एक साया तेजी से भाग रहा था। फिर उस साये के पीछे कुछ और साये भी उसे पकड़ने की कोशिश में भाग रहे थें। कस्बे से गांव को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग जो अब आजादी के बाद मात्र एक बार बने खड़ंजे के अवशेषों के रूप में था के दोनों दूर-दूर तक खेत ही खेत दिख रहे थे। आस-पास कोई बस्ती न थी। दूर कहीं से पानीे बहने सी कोई आवाज आ रही थी जो शायद किसी नदी या नहर की थी और जिसके पार बस्ती थी। पीछे वाले साये फुसफुसाते हुए चिल्ला रहे थे। "छोड़ना नही साली को आज तो इसका घमण्ड चूर कर के ही मानेंगे। बहुत अकड़ती है अपने रूप-रंग पर। आज इसकी सारी अकड़ यहीं मिट्टी में मिला देंगे।"

अंधेरे में कुछ भी नही दिख रहा था इसलिए ये जानना मुश्किल था कि ये साये आस-पास के किसी गाँव के थे या निकटवर्ती कस्बे के या दूर किसी शहर के पर इतना तो तय था आगे भागने वाला साया जो किसी महिला का था, आज उसका बच पाना मुश्किल था।

अधिक दूरी तक भागने से थकान कहो या न बच पाने की नाउम्मीदी सबसे आगे भागने वाले साये के पीछे भागते साये लगातार पास आते जा रहे थें।

सबसे आगे वाले साये ने बचाव की एक अंतिम गुहार लगाई, "भगवान के लिए मुझे छोड़ दो। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?" प्रत्युत्तर में सभी सायों का सम्मिलित अट्टहास मिला। फिर सभी सायों ने प्रशिक्षित शिकारियों की तरह मिलकर अपने उस शिकार को घेरना शुरू कर दिया। अब उसका बचना उसे नितांत असंभव दिख रहा था। भेड़ियों के झुंड में मेमने की बिसात ही भला क्या होती?

फिर भी उसने अपनी पूरी शक्ति से उसे अपना अंतिम प्रयास मानते हुए और अधिक तेजी से भागना आरम्भ किया परंतु ये प्रयास भी अधिक देर तक उन दरिंदों के सामने स्थिर न रहा वो फिर से पास आने लगे। सबसे आगे वाले साये की आंखें एकाएक खुशी से चमक उठी। वो एकाएक ठिठकी फिर तो जैसे उसके थक चुके कदमों में पर लग गए, वो दुगनी तेजी से भागने लगी। पीछा करने वाले साये भय और विस्मय मिश्रित भाव से उसे देखने लगे। धीरे-धीरे शिकार और शिकारियों के बीच की दूरी बढ़ने लगी। भावी शिकार ने विस्मय और भय से भरे दूर खड़े शिकारियों को देखा और एक संतोष की सांस ली। इसी समय चाँद के ऊपर से बादलों का पहरा भी हट गया और महीन से चाँद की झीनी सी रौशनी में एक गौरवर्णी युवती का शरीर चमका जो छपाक की आवाज के साथ पानी में आलोप हो गया।

सभी शिकारी लुटे-पिटे, अवाक से मौन होकर अपने शिकार को जल-समाधि लेते देखते रहें। दूर गांव में भौंकते कुत्ते और सियार भी अब शांत हो गए थे। नदी का पानी ऐसे स्थिर हो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो और शिकारियों को ढांढस बंधा रहा हो कि देखो तुम्हारा पाप मैंने अपने आँचल में छिपा लिया है। अपना कलंक रात के अंधेरों में मिलाकर सुबह की आभा फूटते ही पवित्र और मर्यादित लगना। अब तुम लोग सुरक्षित हो। रात्रि की नीरवता भी वैसे ही जड़वत मौन हो गयी जैसे कुछ देर पहले थी। चमगादड़ों की आवाज आनी भी बंद हो गयी थी। शायद सभी अब शोक मग्न थें।

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