‘ का री फूलमनी जवान होती बेटियों की भी कुछ फिकर है की नाही कब तक बैठा के रखोगी घर में ?’ राजकुमारी काकी की चुभती बातें सुन फूलमनी बोल पड़ी -‘बस वाही वास्ते तो तुम्हारे पास आयी थी काकी ! पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा हमारी छोरियों की किसी को चिंता हुई तो तुम हो काकी | मैंने सोचा कुछ पैसे उधार दे देती तो दोनों बेटियों का ब्याह ठान देती एक साथ | तुम भी बिना गंगा -तीरथ किए पुण्य कमा स्वरग की राह का पट्टा कटा लेती !’

खिसियाते हुए राजकुमारी काकी ने कहा –‘अरे ! पैसा कहाँ है ? होता तो घर दुमंजिला ना करवा लेती ?’

‘ तो सुनो काकी ! हम गरीब गुरबे आदमी, हमारे पास ना पक्के मकान हैं ना पक्की किस्मत | हमारे दुःख भी भगवान जैसे होवे हैं, सबको ना दीखें हैं | दो हाथ हैं इन्ही से हर मुसीबत और खुशी को सलाम करना है |और हाँ एक अरज है हमारी , जवान होती बेटियों के माँ -बाप से बार –बार ये सवाल मत पूछना | हम दिन -रात मेहनत – मजूरी करके, पसीना बहाके दो जून की रोटी का बंदोबस्त करना जाने हैं ,पर इन प्रश्नों का उत्तर कमाना हमें ना आवे है | ऐसा लग रहा था मानो - दो जुड़े हुए हाथ प्रश्नों से आज़ादी माँग रहे हों .....|

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