कहानी अभी बाकी है .... पार्ट 1

कहानी अभी बाकी है .......... 1
सिद्धार्थ शर्मा
रायपुर
+918889234884
२१/5/२०१७

कैरेक्टर्स

1 सिद्धार्थ – राइटर
2 राजकुमार अपूर्व – सिद्धार्थ के कॉलेज का दोस्त और रामगढ़ रियासत का राजकुमार 
3 बाबा  – ट्रेन की बोगी पे सिद्धार्थ से मिलने वाला साधू
4 टांगेवाला - बुजुर्ग राजस्थानी टांगेवाले की आत्मा
5 भीमसिंग – नौकर
6 कविता – कहानी सुनाने वाली बंजारन की आत्मा
7 बूढ़ा आदमी - ऊँट चलाने वाला बूढ़ा राजस्थानी 
9 दासी – कविता  की आत्मा जो दासी बनकर सिद्धार्थ से अपूर्व के महल में मिलती है  
8 अंग्रेज़ अधिकारी – दुष्ट आत्मा


मैं सिद्ध स्वागत करता हूँ आप सबका ऐसी कहानियों की दुनिया में जो आज से पहले आपने न सुनी न ही किसी ने कही होंगी ....
कहानियाँ जिनमे से कुछ हमें गुदगुदाएंगी ,,कुछ बीते वक़्त की दास्ताँ फिर से सुनाएंगी ,, तो कुछ हमारे ज़हन में खौफ और डर का ऐसा एहसास भर जाएँगी ,,, के उन्हें याद करके अक्सर हम सहम जाया करेंगे |
आज मैं आपको बताऊंगा ऐसी ही एक कहानी और उसके लेखक के बारे में जो अधूरी होकर भी इतनी भयानक और डरावनी है के उसे पूरी करने की हिम्मत किसी में नहीं है ,....
ये कहानी आज मैं शुरू करने जा रहा हूँ,,  जो एक अनसुलझा रहस्य बन जायेगा हम सब के लिए ,, तो बस बने रहिये मेरे और इस कहानी के साथ ...

{A} [I] यूँ तो हम सभी इन कहानियों के कच्छे धागों से बंधी कठपुतलियों जैसे हैं ,, हम सबकी अपनी भी एक कहानी होती है ,, हमारी किस्मत ,, जो ज़िन्दगी के सफ़र में हमें जहाँ चाहे जिधर चाहे ले जाती है और लिखती है हमारी अपनी कहानी,.,.., पर आज जो कहानी मैं लेकर आया हूँ वो खुद एक कहानीकार की है ,.,., जिसका नाम है सिद्धार्थ ,.,., जो कहानियाँ लिखता है और उन कहानियों के लिए ही जीता है .,.,., उसकी सुबहो-शाम बस कहानियों की दुनिया के इर्द- गिर्द ही घूमती रहती हैं ,.,,..,.,. और फिर वो गढ़ता है कहानियाँ अपने दिल की .,.,.,.,.,.,
 
[II] {रात के करीब २ बज रहे हैं ,., सिद्धार्थ सोया नहीं है ,.,. आज हमारे लेखक की कहानी उसे एक लम्बे सफ़र पे ले जा रही है ,.,.,. और उसकी मंजिल है राजस्थान की रेतीली ज़मीं पे बसा एक खूबसूरत गाँव “रामगढ़” ,.,. ,.,
तभी उसके मोबाइल की रिंग बजती है .,., और ये रिंग बजती ही रह जाती है दो बार ,, पर उसका ध्यान तो उसके सफ़र के शुरू होने के इंतज़ार और कल्पनाओं की दुनिया में खोया रहता है ,.,., कुछ देर बाद उसका ध्यान मोबाइल पर पड़ता है ,.,.}

सिद्धार्थ – {चौंक कर} अरे ... ये दो मिस कॉल्स अपूर्व के,.,,.,

[अपूर्व सिद्धार्थ के कालेज का दोस्त और जैसलमेर के पास भारत-पाक बार्डर से सटी रियासत “रामगढ़” का राजकुमार है ,.,. सिद्धार्थ कॉल बैक करता है  ,. रिंग बजती है ,,.,. ]
अपूर्व – [ फ़ोन की दूसरी तरफ से ] भाई साहब तुम सोये तो नहीं होगे हाँ पर खोये ज़रूर होगे अपने ख़यालों की दुनिया में ,., तभी तो मेरे दो बार रिंग करने पर भी जवाब नहीं दिया तुमने,.,. हा हा हा .,.,.,

सिद्धार्थ – [हँसते हुवे] सहीं कहते हो कुंवर साब ., सफ़र ही इतना खूबसूरत होने वाला है की मैं अभी से उसके ख़यालों  में ही खोया हुआ हूँ ,.,.,.
अपूर्व- [चुटकी लेते हुवे ] जी हाँ वो तो है .,., पर अपनी कल्पनाओं को ज़रा काबू में  रखिये लेखक साहब .,., क्यूंकि मैं आपके  यहाँ पहुँचने पर आपको एक ऐसी खूबसूरत चीज़ से रूबरू कराने वाला हूँ ,.,., जो आपकी कहानियों की दुनिया से भी ज्यादा दिलचस्प और रहस्यमयी है ,.,.,,., जिसे देख कर आपके होश उड़ जायेंगे होश ,.,. हा हा ,.,.,

सिद्धार्थ—[ खुश होते हुवे ] अरे वाह मेरे यार क्या बात है ,., तो अब बता भी दो आखिर वो चीज़ है क्या ,.,.?

अपूर्व --- whatsapp चेक कीजिये जनाब आप वहीँ ठहरने वाले हैं .,.,.,मैं फ़ोन रखता हूँ ,.., ओके

[सिद्धार्थ झट से मेसेजेस देखता है ,.,. उसमे एक बड़ी ही पुरानी और खूबसूरत सी हवेली की फ़ोटोज़ हैं ,.,.,
  जिन्हें देखकर उसे ऐसा लग रहा है के उसकी आँखों के सामने उस प्रेरणा का ज़रिया है जिसके सहारे वो एक नयी कहानी लिख सकता है ,, इसी बीच समय हो चुका है .,. उसकी ट्रेन का ,.,., और वो जल्दी से अपना बैग उठाता है और भागकर अपनी बाइक निकाल के निकल जाता  है रेलवे स्टेशन की ओर ,.,., स्टेशन पर खड़ी ट्रेन आगे बढ़ रही है .,.,  सिद्धार्थ दौड़ कर एक बोगी के डरवाज़े पर चढ़ता है ,.,.,. और चढ़ते ही एक साधू से टकरा जाता है ,.,.,.]

सिद्धार्थ-- [अचानक से] अरे अरे,,, माफ़ करना बाबा मुझे ज़रा सी देर हो गयी है ,., मैं ज़रा जल्दी में हूँ .,.,.
  
साधू – [ रहस्यमयी अंदाज़ में ] हा हा हा ., देर तो हो गयी है बच्चा ,., और जल्दी तुम्हे ही नहीं उसे भी है जो सदियों से खड़ी है तुम्हारे इंतज़ार में ,.,.,

सिद्धार्थ – [ आश्चार्य से ] कौन बाबा ????
साधू – ,.,.,.,..कहानी बच्चा कहानी ,.,.,.,.,.,
[ फिर वो साधू चलती ट्रेन से उतर जाता है ] [सिद्धार्थ डरवाज़े पे लटके दूर जाते हुवे साधू को एकटक देखता ही रह जाता है,.,. अभी अभी उस साधू ने कुछ ऐसा कहा है जिसने सिद्धार्थ को सोच में डाल दिया है,.,. साधू के नज़रों से ओझल होते ही  वो अपनी बर्थ पर जाकर लेट जाता है ]

सिद्धार्थ— [परेशानहोकर]  न जाने ये साधू क्या कह रहा था ,.,, क्या होने वाला है आखिर मेरे साथ और ऐसी कौन सी कहानी है जिसे मेरा इंतज़ार ,, मेरी तलब है ,.,., वो भी सदियों से ,.,., जबकि मैं खुद कहानियों के इंतज़ार और उनकी तलाश में रहता हूँ ,.,.,
[सिद्धार्थ के कानों में बाबा के कहे वो शब्द गूंज रहे हैं ,,.,.,.,, कहानी बच्चा कहानी ,.,.,.,.,.,कहानी बच्चा कहानी ,.,.,..,]

सिद्धार्थ – [ अपने आप से ] छोड़ो यार ,.,., ये बाबा लोग भी न बेकार का डराते रहते हैं ,.,., सफ़र का मज़ा लेता हूँ,.,.
[ चौंक कर ]  अरे ये मोबाइल कहाँ गया मेरा ओफ्फो भूल गया लगता है मैं रूम में ही मोबाइल ..अब अपूर्व को कॉल कैसे करूँगा उसका नंबर भी तो याद नहीं है यार शिट,,.,,.,. [ ठंडा पड़ते हुवे ] पर क्या फर्क पड़ता है ये कोई नयी बात तो है नहीं मेरे लिए ,., पहेले भी तो कई चीज़ें जैसे कैमरा .,., बैग और न जाने क्या क्या भूल आया हूँ मैं कई जगहों पे अपनी इस भुल्लाक्कड़ आदत के चलते,.,,. कोई नहीं पेंटिंग की जाये बड़े दिनों से पेंटिंग भी तो नहीं की मैंने .,.,.,.,,,.


[पेंटिंग बनाने में सिद्धार्थ ऐसा गुम हो जाता है के उसे पता ही नहीं चलता के २ दिन और २ रातों का लम्बा सफ़र कब ख़त्म हो जाता है ]


{B} [जैसलमेर पहुँचने पर उसे राजस्थान की गर्मी का एहसास होने लगता है ,.,. दोपहर के ढीक १२ बज रहे हैं सूरज की सीधी नज़र रेगिस्तानी ज़मीन के माथे पर पड़ रही हैं ,.,. ट्रेन से उतरते ही उसे चक्कर आने लगे हैं ,.,. पेंटिंग बनाने के चक्कर में वो पूरे सफ़र भर सोया नहीं न ही उसने कुछ ढंग से खाया और पिया है ,.,., बस पेंटिंग हाँथ में लिए और बैग टाँगे वो बेसुध सा चला जा रहा है स्टेशन के बहार के ओर ,.,.,., स्टेशन से बहार आने पर उसका सर थकान और प्यास से घूमने लगता है ,,., वो सीधे जाके स्टेशन के सामने खड़े एक टाँगे के पास पहुँचता है और लड़खड़ा जाता है .,.,.,. टाँगे के सामने की तरफ बैठा बुज़ुर्ग टाँगे वाला झट से उतरकर उसे सहारा देते हुवे कहता है ,.,. ]
        
टांगेवाला- खम्मा घंणी सा .,.,., संभालो संभालो अपने आप नो,.,.,,.

सिद्धार्थ – [रूंधे हुवे प्यासे गले से ] अपूर्व राजकुमार अपूर्व,..,.,.
[तभी टांगेवाले की नज़र उसके हाँथ में रखी पेंटिंग पर पड़ती है .,.,जिसे सिद्धार्थ ने बनाया है सफ़र में और वो पेंटिंग है उस हवेली की ]

टांगेवाला- बैट्ठो सा बैट्ठो ले चडता हूँ आपने म्हारे को समझ आ गयो.,., अपने कहाँ जानो हे,.,.,.,

[सिद्धार्थ समझता है राजकुमार अपूर्व का नाम सुनकर टांगेवाला समझ गया है उसे महल को जाना है , वो और कुछ नहीं कहता बैठ जाता है उस टाँगे पे और जल्द ही उसकी आँख लग जाती है ]


{C} [टांगेवाला स्टेशन से हवेली का सफ़र पूरा करके हवेली के गेट के सामने लगे बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा हो जाता है]
टांगेवाला- उट्ठो सा उट्ठो उट्ठो ,, थारो मंजिड़ आ गयो ,, लो पाणी पियो सा पाणी पियो |
सिद्धार्थ – [ जम्हाई भरते हुवे ] हा हा मंज़िल कहाँ आती है काका मुसाफिर आया करते हैं | {चौंकते हुवे } अरे लेकिन आप मुझे यहाँ कहाँ ले आये काका मुझे तो राजकुमार अपूर्व सिंह से मिलने उनके महल जाना था |
टांगेवाला – म्हारे से कोई गलती हो गी हो तो साब गरीब ने माफ़ करो,.,.आपके हाँथाँ मा जो मने यो हवेल्ली की तस्वीर देक्खी सो आपने हियाँ ले आयो | मने यो भी पता से के यो हवेल्ली राजकुमार अपूर्व प्रताप सिंह जी की सै जिनानो नाम आप बार बार टांगे में सोण से पैले ले रहे थो ||
सिद्धार्थ- { खीजते हुवे } उन्ह्हूँ मैं भी ना कहाँ पहुँच गया,, अपूर्व मुझे न जाने कहाँ-कहाँ ढूंढ रहा होगा ,. और मैं इस पेंटिंग के चक्कर में सीधे इस हवेली पर ही पहुँच गया ,.,.,. [ इतना कहकर सिद्धार्थ उस पेंटिंग को खोलकर देखता है ]
{ चौंकते हुवे } अरे ये क्या इस कागज़ से पेंटिंग कहाँ गायब हो गयी !,.,.,., ये कैसे हो गया यार ,.,.,.!
टांगेवाला – { चौंकते हुवे } कईं होयो सा ????
सिद्धार्थ- { आश्चर्य के साथ } देखिये न काका जिस चित्र को देखकर आप मुझे यहाँ ले आये वो इस पन्ने से ही गायब है ,.,.,.
टांगेवाला- { चौंकते हुवे } सांची कै रे हो सा मने तो म्हारी आँखां पे विश्वास न हो रो ||
सिद्धार्थ- सच बताओ काका क्या इस हवेली में कोई गड़बड़ है ????
टांगेवाला – ऊपर वाला झूठ न बोलाए सा पर इस हवेल्ली की मने कहानियाँ सुनी हैं कहानियाँ .,.,.,.,.,.,.
सिद्धार्थ- कैसी कहानियां काका ??
टांगेवाला- सा ज्यादा तो ना जाणू ,,, मैं इस गाँव का सूं भी ना,,, पर लोग कहा करते सें ,, यो हवेली माँ जान सै जान,,
सिद्धार्थ- {हँसते हुवे} हवेली में भूत तो सुना था काका पर हवेली में जान हा हा ,.,. ये पहली बार सुन रहा हूँ ,.,.,
टांगेवाला –{डरते हुवे } विश्ववास करो सा म्हारे पै ,., जान है जान यो हेवली मा.. यो हवेली ठीक न सै बहुत भयानक कहानी सै यो हवेली की | अब मने आज्ञा दो सा मैं ज्यादा देर हियाँ रुक न सकूँ ,,.,., मने डर लागे है सै सा डर ||
[इतना कहकर टांगेवाला आगे बढ़ने लगता है ]
सिद्धार्थ – {परेशानहोते हुवे } अरे पर काका मुझे अपूर्व के महल कौन पहुंचाएगा ???
टांगेवाला- नौकरां ने कै दो सा पहुँचा आवेंगे मने जाण दो शाम हो गी सै मने घर जाणा सै |

{D} [ सिद्धार्थ के कदम हवेली की तरफ चल पड़े हैं , हवेली के मेन गेट पे पहुँचते ही उसे अन्दर से भागकर आते एक नौकर की आवाज़ उसे सुनाई पड़ती है ]
नौकर – {दौड़ते हुवे } रुकिए हुज़ूर रुकिए कहाँ चले आ रहे हैं ??? यहाँ अनजान मुसाफिरों का आना मना है रुकिए |
सिद्धार्थ- {परेशानहोते हुवे } अरे यार अब ये नयी आफत ,.,भाई मेरे मैं कोई अनजान मुसाफिर नहीं आपके राजकुमार का मेहमान हूँ |
नौकर – [ हांफते हुवे ] अच्छा तो आप ही सिद्धार्थ हुज़ूर हैं,, जिनकी खोज में हमारे महल के आधे नौकर लगे हुवे हैं ,.,.,
सिद्धार्थ – { चौंकते हुवे }  मेरी खोज में !!!
नौकर – जी हुज़ूर आपको खोजने के लिए कुंवर सा ने हमारे रामगढ़ महल के चालीस नौकरों को दोपहर से स्टेशन  और हर चप्पे-चप्पे पर लगा रखा है  ,., और आप यहाँ हवेली पर सीधे पधार गए हो ,.,., आपको तो कल आना था आप आज ही कैसे ????
सिद्धार्थ – {हँसते हुवे } लम्बी कहानी है भाई तुम ये सब छोड़ो ये बताओ यहाँ टेलीफ़ोन है के नहीं मुझे अपूर्व से तुरंत बात करनी है ,.,,.,.
नौकर – है ना हुज़ूर पर काम कर रहा है या नहीं कुछ कह नहीं सकते,, आप अपना बैग मुझे दीजिये ,, और अन्दर चलिए ,, माफ़ी चाहूँगा आज आपको पैदल ही चलना होगा हवेली की कार का ड्राईवर न जाने कहाँ चार दिनों से लापता है ,.,.,.
सिद्धार्थ – नहीं नहीं रहने दो भाई बैग मैं खुद ले जाऊँगा ,.,. तुम बस जल्दी अन्दर ले चलो यहाँ गर्मी बहुत लग रही है |    
नौकर – आइये हुज़ूर स्वागत है आपका हमारी राजस्थान की सबसे पुरानी और खूबसूरत हवेली में,.,., जिसे कुंवर सा के परदादा जी ने बड़े प्यार से बनवाया था || पर अब यहाँ हम नौकरों और ऊँठ-घोड़ों के अलावा कोई रहता नहीं है ||
सिद्धार्थ- { चौंकते हुवे } अरे क्यों नहीं रहता कोई अब यहाँ ???
नौकर – {रहस्यमयी अंदाज़ में} कहानी है हुज़ूर कहानी बोहोत लम्बी और पुरानी कहानी ,.,.,.,.,जिसे सुनाने का अभी न तो वक़्त है न ही कोई ज़रुरत वैसे भी आप कल महल चले जायेंगे कोई नहीं रुक सकता इस हवेली में अकेले ,.,. मैं खुद शाम ढलते ही अपने दूर बने कमरे में दुबक जाता हूँ ,.,.,.
सिद्धार्थ- {डरते हुवे} भाई अब तो मुझे भी डर लगने लगा है ,.,., बहुत कुछ सुन चूका हूँ मैं आते वक़्त इस हवेली के बारे में उस टांगेवाले से भी और अभी तुमसे भी ,.,.,.,
नौकर --- { चौंकते हुवे } टांगेवाला !! ??
सिद्धार्थ – हाँ भाई टांगेवाला ,.. मुझे वो स्टेशन पे मिला था ||
नौकर – { चौंकते हुवे } लेकिन हुज़ूर यहाँ एक ही टांगेवाला आता था वो तो पिछले साल ही गुज़र चूका है बेचारा बूढ़ा हो गया था ,.,. यहीं हवेली के पीछे बागीचे में हमें उसकी लाश मिली थी ,, उसका कोई था भी नहीं इस दुनिया में ,, तो हम लोगो ने ही कुंवर सा के कहने पर उसका अंतिम संस्कार यही पास के शमशान में कर दिया था ,,, उसका घोडा और टांगा आज भी हमारी हवेली के अस्तबल में हैं ,.,.,.
सिद्धार्थ—{ चौंकते हुवे } क्या कहते हो दोस्त मैं तो उस टांगे पे ही आया हूँ  ,,, क्या मैं उस घोड़े और टांगे को देख सकता हूँ ,.,.,                   नौकर – जी हुज़ूर आप पहले अन्दर तो चलिए ,, आराम तो कर लीजिये रात होने वाली है कल सुबह मैं आपको वो घोडा और टांगा दिखाने ले चलूँगा |


{E}  [सिद्धार्थ और नौकर हवेली के डरवाजे को खोलकर अन्दर घुसते हैं,, सिद्धार्थ को अभी भी उस टांगेवाले की मौत की बात पर भरोसा नहीं हो रहा है }
नौकर – हुज़ूर आप यहीं रुकिए मैं लाइट का मेन बोर्ड चालू कर के आता हूँ,,,
सिद्धार्थ – ठीक है आओ ,,,
नौकर – जी अभी आया ,.,, {इतना कहकर नौकर उसे अकेला छोड़ कर हवेली के बाहर बने एक शेड की तरफ चला जाता है }
[सिद्धार्थ अब अकेला है उसे हवेली के अन्दर कुछ दिख नहीं रहा बस डरवाजे पर खड़ा है हॉल के एकदम सामने,, हवाओं की आवाजें हवेली की अन्दर से गुज़रती हुई उसके कानों में पड़ रही हैं ,,,तभी हवेली के ऊपर हॉल की सीढ़ी से लगे एक कमरे का डरवाज़ा अपने आप खुलता है ,,, और उस कमरे से हल्की सी रौशनी आते हुवे नज़र आती है]
सिद्धार्थ – { चौंकते हुवे } कौन है वहाँ कौन है ?? कोई है ????? [ कोई जवाब नहीं बस हवायें]
[सिद्धार्थ उस हॉल से होते हुवे ऊपर उस कमरे की ओर बढ़ने लगता है ,.] तभी उसे लगता है के कोई उसके पीछे खड़ा है ,,, अचानक पलटने पर ]
सिद्धार्थ – [चैंकते हुवे] ओह .... अरे यार तुमने तो मुझे डरा ही दिया .,.,.,. थैंक गॉड तुम हो ,.
नौकर – आप कहाँ चल पड़े थे हुज़ूर मैंने तो आपको डरवाजे पे ही रुकने को कहा था ,.,.,
सिद्दार्थ- पर मुझे लगा यहाँ ऊपर कमरे में कोई है .,.,.
नौकर – हवा है हुज़ूर हवा रेगिस्तान की हवा ,,,,
सिद्धार्थ – पर वहां से रौशनी भी तो आ रही है ,.,.
नौकर – कहाँ से हुज़ूर .,
सिद्धार्थ – [ कमरे की ओर इशारा करते हुवे ] वो वहाँ ,, { चौंकते हुवे } अरे अभी तो ये कमरा खुला था अभी यहाँ से रौशनी आई थी ,.,. ये बंद कैसे हो गया ,.,.,.
नौकर – छोड़िये ये सब ,, ये लीजिये हुज़ूर एक लालटेन आप रखिये ,., मेन बोर्ड में खराबी आ गयी है ,, आज रात आपको अँधेरे में ही गुजारनी पड़ेगी ,, पर आप फिक्र मत कीजिये मैं आपके लिए छत वाला कमरा खोल देता हूँ जिसकी खिड़की से पूरे चाँद की रौशनी आती है ,,,, वैसे भी आज पूरे चाँद की रात है ., बहुत अच्छा उजाला रहता है उस कमरे में ,.,, आप यहीं हॉल में रुकिए .,.,.
सिद्धार्थ – {परेशानहोते हुवे} चलो भाई वाही सहीं रहेगा ,.,.,
नौकर – जी मैं अभी आया ,.,.


{F} [नौकर जाकर ऊपर का कमरा खोल देता है और आवाज़ देता है नौकर – ऊपर आ जाइये हुज़ूर आपका कमरा खुल चूका है ] 
सिद्धार्थ – हाँ आता हूँ ,.,.,
[ सिद्धार्थ सीढ़ियों पे से चढ़ते हुवे ऊपर जाने लगता है ,..,. बीच में वो कमरा पड़ता है जो अपने अप खुला था कुछ देर पहले और बंद भी हो गया अपने आप ,,, उस कमरे के पास से गुज़रते हुवे उसे उस के कमरे अन्दर से आवाज़ आती हुई सुनाई देती है ,..जैसे कोई औरत हंस रही हो और केह रही हो उस कमरे के अन्दर से,.,..,. ही ही ही ही हा हा हा हा  आखिर आ गए ना तुम ,.,.,.,]
सिद्धार्थ – { डरते हुवे नौकर से जोर से } भाई यहाँ से कुछ आवाज़ आ रही है इस कमरे से ,.,.
नौकर – {थोड़ी दूर से चिल्लाते हुवे } अरे कोई नहीं है हुज़ूर आप बस चले आइये ,, इस हवेली में आपके और मेरे अलावा और कोई नहीं है ,.,.,
सिद्धार्थ – { डरते हुवे } ठीक है ,.,., आता हूँ ,.,.,.
[ जैसे ही सिद्धार्थ उस कमरे से आगे बढ़ता है ,.,. अचानक फिर वो डरवाज़ा अपने आप एक झटके से खुल जाता है सिद्धार्थ जैसे ही डरवाज़े के खुलने की आवाज़ सुनता है लालटेन वही गिरा कर भागने लगता है उस नौकर की आवाज़ की ओर,, और पहुँचता है उस कमरे के अन्दर जहाँ वो नौकर है हाथ में लालटेन लिए वो कमरे की खिडकियों के पर्दों हटा रहा है ]
नौकर – { चौंकते हुवे } क्या हुआ हुज़ूर भाग क्यूँ रहे हैं आप ,.,. क्या हुआ आपको ???
सिद्धार्थ {डरते और हांफते हुवे} मैंने कुछ अजीब सा महसूस किया यार यहाँ कोई तो है उस कमरे में .,.
नौकर --  {समझाते हुए }  हुज़ूर आप बस इतना जान लीजिये ये आपका कमरा है और ,,, इसके अलावा न आप किसी कमरे पर ध्यान दें न ही हवेली में अकेले कहीं निकलें ,.,. क्यूंकि कई बार इस हवेली की खिड़कियाँ खुली होती हैं जिनसे आने वाली रेगिस्तानी आवाजें आपको डरा सकती हैं ,.,. आप ही क्या मैं खुद कई बार चौंक चूका हूँ .,. पर अब आदत पड़ गयी है ,.,. अब देखिये नज़ारा ,.,
[ इतना कहकर नौकर हवेली की छत पे जाने वाले डरवाज़े के उस पर्दे पर से पर्दा हटा देता है ,, जिसे हटाने पर पूरा चाँद नज़र आने लगता है और उसकी रौशनी में  हवेली के सामने झाड़ियों के बीच बना एक सुन्दर ताल उसे नज़र आने लगता है ]
सिद्धार्थ – { खोया हुआ सा } वाह बहुत खूब ,,.,. क्या बात है बेहद खूबसूरत ,,......... मेरी आँखों ने ऐसा खूबसूरत नज़ारा बहोत दिनों बाद देखा है ,.,......
नौकर – साहब यही तो है खासियत इस हवेली की जो भी इस कमरे से एक बार पूरे चाँद को देख लेता है, देखता ही रह जाता है ,, दूर रेतीली ज़मीन से निकला ये पूरा चाँद है भी इतना प्यारा के कोई भी इसे देखकर,,, बस खो सा जाता है ,.,..................
सिद्धार्थ – { मुस्कुराते हुवे }  सच कहते हो यार ,, पर तुम यहीं रहना क्यूंकि न जाने ये हवेली अभी अपने और कौन कौन से रंग दिखाये,,,, और हाँ मुझे अभी अपूर्व से बात करनी है ,., फ़ोन कहाँ है ,.,.,
नौकर – हुज़ूर फ़ोन तो नीचे है मैं अपना मोबाइल लेकर आता हूँ अपने कमरे से उसी से बात कर लीजियेगा ,, और आपको भूख भी तो लगी होगी ,.,. आपके लिए खाना भी लेकर आता हूँ ,.,.,
सिद्धार्थ – ठीक है भाई .,., तब तक मैं फ्रेश हो जाता हूँ ,.,., तुम जल्दी से आ जाओ ,..,. और हाँ ये लालटेन मुझे दे जाना मेरा लालटेन गिर गया सीढ़ियों में मुझसे ,.,.
नौकर – खाना तैयार ही है हुज़ूर ,, मेरी बीवी ने खाना बनाया है आपके लिए,, मैं बस अभी गया अभी आया ,.,.,.,
सिद्धार्थ – ओके,.,.,. बॉस जाओ और जल्दी आना बड़ी भूख लगी है मेरे भाई ,..
[ नौकर सिद्धार्थ को उस कमरे और पूरे चाँद के खूबसूरत नज़ारे के में अकेला छोड़ नीचे को चला आता है ]


{G} [ सिद्धार्थ एक बड़े आलिशान बैड पर बैठता है और  अपने बैग से कुछ सामान निकलता है  ,, फिर वो कमरे से लगे बाथरूम में गुनगुनाते हुवे लालटेन लेकर चला जाता है ]
सिद्धार्थ – {अपने आप से } क्या किस्मत है ,. इतनी खूबसूरत हवेली में लाइट नहीं और वो भी रात ,., कहीं गिर गया न फिसल कर तो कोई उठाने वाला भी नहीं आएगा यहाँ  .. [फिर पानी चालू कर के नहाने लगता है और नहाकर वापस आके सोफे पर बैठ कर चाँद को देखने लगता है ]
नौकर – हुज़ूर अन्दर आऊं ??
सिद्धार्थ – {चौंक कर } अरे आ गए तुम .,.,. हाँ हाँ भई,., आओ तुम्हारी ही हवेली है .,.,
नौकर – कहाँ साहब ,.,. हम ठहरे नौकर आदमी ,.,., हमारी हवेलियाँ नहीं झोपड़ियाँ होती हैं ,., ये लीजिये आज आपको राजस्थानी स्वाद चखते हैं .,., दाल-बाटी चूरमाँ ,, बेसन के गट्टे की सब्जी और घी में डूबी रोटी,.,., सलाद भी है हुज़ूर की खिदमत में,.,.
सिद्धार्थ- और मोबाइल लाये ???
नौकर – नहीं साहब लगता है मेरे बच्चों ने कहीं रख दिया है ,.,.,.,.मैंने बहोत ढूँढा पर मिला ही नहीं ,.,.
सिद्धार्थ – तुमने खाना खा लिया या नहीं .,.
नौकर—नहीं हुज़ूर आपके बाद ,.,.
सिद्धार्थ – अरे भाई ,., मैं कोई हुज़ूर वुजूर नहीं .,., सिद्धार्थ हूँ तुम मुझे हुज़ूर मत कहा करो ,.,., अजीब लगता है ,.,.
नौकर – नहीं मालिक आप हमारे अन्नदाता के दोस्त हैं ,.,., आप हमारे हुज़ूर ही हैं .,.,.
सिद्धार्थ – तो ठीक है एक बात मनो ,.,.
नौकर – हुकुम कीजिये हुज़ूर ,.
सिद्धार्थ – तुम्हे भी मेरे साथ खाना खाना पड़ेगा .,., मैं अकेले ये सारा खाना नहीं खा सकता ,.,.,.,
नौकर – जी जैसी हुज़ूर की मर्ज़ी ,.,.,.,.,
सिद्धार्थ – ये हुई ना बात ,. और हाँ खाने के बाद मुझे कुछ पेपर और एक पेन ला देना ,. मैं यहाँ इस कमरे में इस चाँद की रौशनी में बैठकर कुछ लिखना चाहता हूँ |
नौकर – जी .
[फिर दोनों खाना खाने लगते हैं ,,. खाने के बाद नौकर कमरे की एक अलमारी से कुछ पुराने पेपर, एक पुरानी इंक वाली पेन और दवात लाकर सोफे के सामने लगे टेबल पर रख कर चला जाता है ]
{H} [ रात के ११:३० बज चुके हैं ,, रेगिस्तान का पारा गिरने के साथ ही ठंडी हवाएं भी चलने लगी हैं ,.,.  पूरे चाँद की ये चांदनी रात सिद्धार्थ को एक खूबसूरत सी दुनिया में ले चली है उसके कलापनाओं की दुनिया में ....कलम में स्याही भरते हुवे सिद्धार्थ की नज़रें ऊपर चाँद और नीचे वीरान रेगिस्तान पे पड़ रही हैं ,,, उसे रेगिस्तान की झाड़ियों में ताल के किनारे चहलकदमी करते हिरणों की चमकती आँखें नज़र आती हैं ,.,.,रात में निकलने वाले पंछिओं और भेड़ियों की आवाज़ भी सुने देने लगती हैं ,,., इन सब के बीच सिद्धार्थ का लालटेन बुझ गया है,., उसे लिखने में दिक्कत हो रही है ,,., मन में विचार तो है के कुछ लिखे पर चाँद की रौशनी कमरे में इतनी नहीं है के कुछ लिख सके ,.,.,. वो बहार छत पर आता है और जोर से [ पुकार कर कहता है ]----
कोई है  कोई है ,.,. अरे भई कुछ जलाकर ला दो ,.,. मुझे लिखना है ,.,.,.,.,.,
[तभी हवेली की छत के नीचे कहीं दूर से आवाज़ आती है ]
मैं हूँ साहब मैं हूँ ,.,., आती हूँ ,.,.
सिद्धार्थ – { जोर से } कौन ,.,., ????
जवाब आता है – कहानी हूँ आपकी कहानी .,.,.,
[घडी की ढन ढन से उसकी नींद खुलती है ,.,.,  12 बज चुके हैं रात अपने सफ़र के बीच पहुँच चुकी है  ,,.,.,., सिद्धार्थ सोया हुआ रहता है.,.,. न जाने कब उसकी आँख लग गयी थी ,., इस बीच जो भी हुआ ये सब उसका ख्वाब है |] [आँखें खुलते ही वो खुद को पसीने से लतफत पाता है .. उसके सामने रखी हुई दावत की बोतल कागजों के किनारे पर गिरी हुई है ,, वो दौड़ कर छत की दीवार के किनारे पर जाता है ,., और देखता है ,.,., एक लड़की का सफ़ेद साया दौड़ कर हवेली से बहार उस ताल की ओर जा रहा है और उसके पैरों से पायल की आवाज़ आ रही है छन छन छन छन,.,., और फिर वो साया दूर उस ताल में जाकर गायब हो जाता है ]
[ सिद्धार्थ डरा हुआ दौड़कर वापस अपनी कागज़ और कलम की और बढ़ता है ,.,. वो हांफ रहा है  ,.,., कागज़ को देखकर तो वो और भी चौंक जाता है ]
सिद्धार्थ – {चौंक कर }—अरे ये क्या लिखा है इस पुराने कागज़ पर ,.,., “ कल फिर आउंगी जो अधूरी है ये कहानी उसे पूरी कर जाउंगी” ...|
सिद्धार्थ – {सहमते हुवे} कोई तो आया था पता करना होगा आख़िर कौन है इस हवेली में ,.,.कहीं ये कोई आत्मा तो नहीं जो यहाँ रहती हो और मुझसे अपनी अधूरी कहानी पूरी करने को कह रही हो,.,., या ये सब जो मुझे महसूस हुआ अभी सिर्फ मेरा एक वहम एक इत्तेफाक हो ,.,.,. पर ये जो भी लिखा हुआ है इस पन्ने पर वो आख़िर किसने लिखा ,.,. कोई तो है .,...... कोई तो है ,.,..
[ इसी कशमकश में सिद्धार्थ रात भर नहीं सोता ,.,., सुबह सुबह करीब 5 बजे उसकी आँख फिर लग जाती है ]

  {I} [सुबह हो चुकी है,, राजस्थान की पिली सुबह की रौशनी में सिद्धार्थ की आँखें खुलती हैं ,.,,. सुबह के 9 बज रहे हैं ,.,, आँखों को मलते और बैड के किनारे रखी सुराही से पानी पीते हुवे उसकी नज़रें टेबल पर फाड़फड़ाते कागज़ के उस पन्ने पे पड़ती है जो कल रात उसने लिखने को निकलवाया था और वहीँ छोड़ दिया था,., वो दौड़कर उस पन्ने को उठाता है और देखता है तो पाता है के वो कागज़ इतना कोरा और साफ़ है जैसे उसपे स्याही तो क्या आजतक किसीकी नज़र तक न पड़ी हो ,.,., उसके दिमाग की नसें अब जवाब देने लगी हैं ,., इसी बीच वो ये भी सोच रहा है के कल रात उसे जो भी महसूस हुआ,,. वो आवाजें ,., एक साए का हवेली से दूर भागकर ताल में खो जाना ,,, फिर पन्ने पर कुछ लिखा हुआ होना ,.,. क्या वो सब सपना ही था ,., या उसके सोच और विचारों की दुनिया से आया बस एक वहम ,.,.,.,., ]

सिद्धार्थ – {परेशान होकर} न जाने ये सब कैसे और क्यूँ हो रहा है ,., मेरा गलती से सीधे इस हवेली में आ जाना और फिर रात में अनजाने ख्वाब और साये का दिखना ,.,., और वो टांगेवाला ,.,. नौकर तो कह रहा था,., वो मर चुका है .,., जबके कल शाम उसी ने मुझे यहाँ छोड़ा था .,.,..,., पता करना होगा ये सब हो क्या रहा है ,.,., {चिल्ला कर } कोई है कोई है ,.,.,.,???
नौकर--- {दूर से चिल्ला कर } जी हुज़ूर आया... मैं हूँ मैं हूँ .,.,, कहिये क्या हुकम है सेवक के लिए ,... हवेली में पहली रात अच्छी रही आपकी ????
सिद्धार्थ – भाई ये बताओ क्या मैं अभी उस टांगेवाले के घोड़े और टाँगे को देख सकता हूँ ,., जिसकी मौत तुम्हारे कहने के हिसाब से पिछले साल ही हो गयी है  ,.,.,.,
नौकर – ज़रूर हुजूर आप पहले तैयार हो जाइये फिर मैं आपको ले चलता हूँ ,.,.,.,.
सिद्धार्थ – ठीक है और ज़रा लाइट का भी देख लेना यार ,. रात में बड़ी दिक्कत होती है अँधेरे में ,.,.,.
नौकर – आप फ़िक्र मत कीजिये मालिक मैं हूँ ना सब ठीक कर दूंगा मैं आज ,.,.,.,.,     
[ इतना कहकर नौकर नीचे चला जाता है  ,., फिर सिद्धार्थ फ्रेश होने चला जाता है,., कुछ देर में हवेली के अन्दर से सिद्धार्थ के ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आती है ]
सिद्धार्थ – {की चीख़} आ आआआआआआअ,.,...,.,.,.,,.,
नौकर दौड़कर आता है – हाँफते हुवे ,.,. क्या हुआ हुजुर क्या हुआ ,.,.,
सिद्धार्थ – {कराहते हुवे } अरे भाई फर्श पर पानी था और मैं फिसलकर गिर गया उठाओ ज़रा ,., 
नौकर –  मुझे लगा कुछ और ,.,.,.,.
सिद्धार्थ – क्या ?????
नौकर – कुछ नहीं हुज़ूर आपको ज्यादा चोट तो नहीं आई ,.,.,.
सिद्धार्थ – नहीं बस कमर में हल्की मोच है चलने पर ठीक हो जाएगी ,.,., चलो मैं तैय्यार भी हूँ चलते हैं तुम्हारे अस्तबल .,.,
नौकर – जी हुज़ूर,.,.,.
[ दोनों अस्तबल के लिए कमरे से निकल पड़ते हैं ,,. पीछे रह जाते हैं वो कोरे कागज़ और कलम टेबल पर ,. सिद्धार्थ अब भी सीढ़ियों के पास वाले कमरे से गुज़रते हुवे डर रहा है ,., कल रात की बातें उसे याद आ रही हैं कैसे वो कमरा कल अपने आप खुला .. वो किसी के हसने की आवाज़ वो रौशनी .. सबकुछ ,., पर जैसे तैसे खुद को संभल कर वो बहार आ जाता है ,.,,]
नौकर --- रुकिए साहब मैं आपके लिये छाता लेकर आता हूँ  .,., धूप बहुत है हमारे देश में .,., पर आप कहीं जाना नहीं अकेले .,. कल रात भी मैंने आपको मना किया था अकेले हवेली में जाने से पर आप चले गए .,.,.,,
सिद्धार्थ – { हंस्ते हुवे } ठीक है भई ,., जाओ तुम छाता ले आओ ,.,.
नौकर – जी अभी आया आप यहीं रहिये ,.,.,.
[ नौकर दौड़ कर जाता है छाता लेने ,,. पर ..उसे आने में थोड़ी देर लग रही है .,.,. इतने में सिद्धार्थ निकल पड़ता है पैदल ही हवेली के पीछे अस्तबल की ओर... वो बागीचों से होता हुआ अस्तबल पहुँच जाता है ,, जहाँ पर कई घोड़े और ऊँठ बंधे हुए हैं .,.,. वहीँ कोने में वो टांगा भी है जिसमें वो कल शाम हवेली आया था ,,. वो दौड़ कर जाता है उस टाँगे के पास और उसे ऊपर से नीचे आगे से पीछे बड़ी गौर से देखने लगता है ]
सिद्धार्थ – {चौंक कर } ओह माय गॉड,.,. ये तो वही टांगा है ,. और ये टाँगे पे लगी फोटो भी उसी बूढ़े टांगेवाले की है.. जिससे कल मैं मिला था ,.,., पर अगर ये मर चूका है तो वो कौन था ,.,., क्या उसका हमशक्ल या वो थी एक आत्मा ,.,,.,.,.,.,., अब मैं इस हवेली में एक पल को नहीं रुकुंगा ,,,.,.,.,.
[ इतना कहकर सिद्धार्थ भागने लगता है हवेली के सामने की ओर .,.,. और जा टकराता है उस नौकर से ]
नौकर – [कराहते हुवे] अरे आराम से हुज़ूर ,.,., मैं कमज़ोर दिल का आदमी हूँ ,.,.
सिद्धार्थ – { डर और गुस्से में } भाई हार्ट अटैक तो मुझे आ जायेगा अगर मैं इस हवेली से अभी नहीं निकला तो ,.,., भूतिया है ये हवेली भूतिया,.,.,.,
नौकर – [रहस्यमयी अंदाज़ और डर में]  कह रहे हैं हुज़ूर सब यही कहते हैं ,., मैंने भी बहुत से साये देखे हैं इस हवेली .,. जो चीखते हैं .,., चिल्लाते हैं .,.,.,.,. हँसते हैं ,.,., रोते हैं ,., और शोर मचाते हैं ,. इस हवेली में .,.,., मैंने कल रात आपको ये सब इसलिए नहीं बताया क्यूंकि आप डर जाते फिर आपको रातों रात महल छोड़ने का कोई साधन भी नहीं था मेरे पास ,.,., और हाँ मुझे मेरा मोबाइल मिल गया है ,.,., लीजिये बात कर लीजिये कुंवर सा से ,.,.,
सिद्धार्थ – यार दो जल्दी दो ,.,, ट्रिंग ट्रिंग .......... ,.,
अपूर्व – हेलो,.,.हेल्लो
सिद्धार्थ – {डांटते हुवे } अबे हेल्लो के बच्चे सिद्धार्थ बोल रहा हूँ ,.,.,,
अपूर्व – भाई कहाँ है यार कल से तुझे ढूँढने में आधा रामगढ़ लगा हुआ है ,.,. तू है कहाँ ????
सिद्धार्थ – {डांटते हुवे } तेरी भूतिया हवेली में ,.,.,., अच्छा प्लान बनाया है तूने भी मुझे मरवाने का ,., यही रुकवाने वाला था ना तू मुझे ,., मैं जा रहा हूँ यहाँ से अभी इसी पल ,.,एक सेकंड अनहि रुकुंगा अब मैं यहाँ .,.,.
अपूर्व – {समझाते हुवे} भाई सिद्धार्थ ,.,. सुन मेरी बात सुन ,.,.,.,
सिद्धार्थ – { चिल्लाते हुवे } कुछ नहीं सुनना मुझे मेरे दोस्त मैं तो चला ,.,. माना कहानिओं के लिए जीता हूँ मैं.,. पर मरने का कोई शौख नहीं मुझे ,.,.,.,.,.
अपूर्व – {उदास मन से} ठीक है भाई चले जाना ,.,. पर तू एक बार मिलेगा भी नहीं मुझसे ,.,. यही है तेरी यारी .,.,., 
सिद्धार्थ – {नर्म पड़ते हुवे } अच्छा चल आता हूँ मैं ,.,. तू मत आना मैं इस हवेली से तुरंत निकलना चाहता हूँ ...
अपूर्व – ठीक है ,.,., हवेली में एक ऊँठ और उसे चलाने वाला है ,., किसी से भी पूछ लेना वो बता देंगे ,., वो तुझे सीधे महल ले आएगा ,.,,.,
सिद्धार्थ – ठीक है ,., फ़ोन रख मैं देखता हूँ ,.,.
अपूर्व – ओके .....
सिद्धार्थ – नौकर से – मुझे हवेली के ऊँठ को चलाने वाले से मिलना है ,.,.,.,.
नौकर – {अब भी कराहते हुवे } हुज़ूर वो जो सामने आपको बगीचे के किनारे में छोटा सा कमरा दिख रहा है ना,., वही है ऊँठ वाले का ठिकाना ,., आप उसके पास जाइये ,.,. मैं थोडा मरहम पट्टी लगा कर आता हूँ .,.,.
सिद्धार्थ – ठीक है तुम जाओ और ये लो तुम्हारी बक्शीश,.,.,.
नौकर – नहीं हुज़ूर मुझे भला पैसों का क्या काम ,.,. कुंवर सा की हवेली में हमें किसी चीज़ की कमी नहीं ,.,. आप रहने दीजिये .,.,.,,,. मैं चलता हूँ ,.,.,.
सिद्धार्थ – तुमने अभी तक अपना नाम नहीं बताया ,.,. ना ही मैंने पुछा .,.,., नाम क्या है तुम्हारा ???
नौकर --  भीमसिंग नाम है मेरा हुज़ूर,., मध्यप्रदेश के रीवां का रहने वाला हूँ ,.,.,.अब आज्ञा दें मुझे ,.,.,..
{J} [ नौकर के वहां से जाते ही सिद्धार्थ ऊँठ चलाने वाले के कमरे की तरफ बढ़ता है ,, वहां उसे एक बुज़ुर्ग आदमी मिलता है,.  जो उसे महल ले जाने के लिए ऊँठ तैयार कर ले आता है और सिद्धार्थ निकल पड़ता है रेगिस्तान के जहाज पे अपने दोस्त राजकुमार अपूर्व सिंह के महल की ओर  ] [ रेगिस्तान के जहाज़ की सवारी सिद्धार्थ को धीरे धीरे मजेदार लगने लगती है ,., वो फिर अपने में मस्त हो जाता है ,. उसे तो इतना भी ख्याल नहीं के वो अपना सारा सामान हवेली में ही भूल आया है ,.,.,  उसकी नज़रें दूर तक फैले रेत के समन्दर को देख रही हैं ,.,.,.,]
[वो अब रेगिस्तान की मरीचिका में खोने लगा है .,.,,. दूर देख कर ऐसा लग रहा है जैसे वहां पानी हो ,.,. और वो उसे एकटक देखता ही जा रहा है ,., खोता ही जा रहा है इस द्रिश्य में ,.,.,., धीरे से उसे इस मरीचिका के बीचों बीच एक सफ़ेद साया उभरता नज़र आने लगा है ,.,,., वो साया हुबहू वैसा ही नज़र आ रहा है जैसा कल रात उसने हवेली की छत से देखा था ,.,,.,., और वो आवाज़ फिर से उसके कानों में गूंजने लगती है .,., छन् छन् छन् ,......]
[तपती धूप और गर्म हवाओं की आगोश में सिद्धार्थ का दिमाग खो सा गया है ,.,.,, उस नज़ारे और उसके एहसास में जो उसे हो रहा है ,.,.,.,., लग रहा है जैसे वो गुम सा हो गया है उस जहाँ में जहाँ सिर्फ वो है वो साया है और वो आवाज़ है  ,.,.,., छन् छन् छन् छन् ,.,.,.,.,.,]
[इसी बीच ऊँठ की आवाज़ से सिद्धार्थ का ध्यान भंग होता है ,.,.,. अभी इस पल वो वापस से होश में है.,.,.,.
पर ये आवाज़ अभी भी छन् छन् छन् छन् ,.,.,..... सिद्धार्थ पीछे मुड़कर देखता है तो पाता है ,. के एक राजस्थानी लड़की नंगे पाँव एक ऊँठनी को लेकर न जाने कबसे उसके ऊँठ के पीछे पीछे चली आ रही है .,.,.,.,., और ये छन् छन् की आवाज़ उसी ऊँठनी के पैरों में बन्धे घुंघरुओं से आ रही है ,.,.,.,]
सिद्धार्थ – ऊँठ चलाने वाले से – क्यूँ काका हमारे पीछे ये लड़की कब से चली आ रही है इस ऊँठनी को लेके .,.,. ??
ऊँट चलाने वाला – हा हा साहब लागे है थारो दिमाग गरमी माँ फिर गयो से ,.,.,.,. म्हारे पीछे कोई ऊँठ ने लाडकी न सै,.,.,., ने पर सामने राजमहल ज़रूर सै,.,.,.,.,
[ सिद्धार्थ चौंक कर पीछे देखता है तो उसे सिर्फ पैरों के निशाँ नज़र आते हैं ,.,. पर कोई भी नहीं होता वहां सिवाए वीराँ रेगिस्तान के ,.,.,]
सिद्धार्थ – {चौंक कर} अरे ये लड़की तो थी अभी ,.,., और ये महल कहाँ से आ गया अचानक अभी तो कुछ देर पहले हमारे सामने रेत और बस रेत थी ,.,.,.,,.
[ सिद्धार्थ अब भूख ,पसीने और प्यास से बेहाल हो चूका है उसका मन बेहद बेचैन हो उठा है ,.,., उसका ऊँठ महल के द्वार के भीतर आ चूका है,., ऊँठ के बैठते ही सिद्धार्थ चक्कर खाकर नीचे गिर जाता है  उसके सर पर गहरी चोट आती है ,.,.,. और बेहोशी सी हालत में कहने लगता है ]
सिद्धार्थ – {सूखे हुवे गले से } पर वो थी वो थी ,.,.,.,कल रात भी ,....और अभी आज भी ,.,.,.,
ऊँठ वाला – कौण सा कौण ,.,.,.,.,???           
सिद्धार्थ- [आखरी शब्द ] कहानी,....,. कहानी .,............. [फिर वो बेहोश हो जाता है ]

{K} [ महल के नौकर दौड़ कर आते हैं ,, सिद्धार्थ को उठाकर महल में बने एक कमरे में ले जाया जाता है उसके सर की चोट की मरहम पट्टी की जाती है ,, जहाँ कुछ देर के बाद उसकी आँखें खुलती हैं,,  ]
अपूर्व- [चुटकी भरे अंदाज़ में ] कैसे हो मेरे भाई चोट तो बड़ी गहरी लगवा ली तुमने ,.,.,.,.,
सिद्धार्थ - [कराहते हुवे धीरे से ] गनीमत हूँ के जिंदा पहुँच गया तेरे पास मेरे यार ,., वर्ना.,.,
अपूर्व – वर्ना .,.,.,.???
सिद्धार्थ – वर्ना मौत तो दिख ही गयी थी तेरी उस भूतिया हवेली में ,.,.,.,,.
अपूर्व – ऐसा नहीं कहते यार शुभ शुभ बोलो ,.,. अब तुम मेरे पास आ गए हो यहाँ कोई तकलीफ नहीं होगी तुम्हे ,.
सिद्धार्थ – हाँ वो तो है ,.,. तू कैसा है मेरे यार ,.
अपूर्व – कैसा रहूँगा यार बस नाटक किये जा रहा हूँ ,.,. एक सीरियस राजकुमार के किरदार को निभाने के लिए ,., वर्ना तो तू जानता ही है ,.,. कितनी मस्तियाँ किया करते थे हम कॉलेज के दिनों में ,.,.,.,
सिद्धार्थ – हाँ यार कितने बेफिक्र थे न हम उन दिनों ,.,. हमेशा मौज में रहा करते थे ,.,.,
अपूर्व – पर तू नहीं बदला ,.,. अब भी वैसा का वैसा ,.,.,
सिद्धार्थ – कैसा ????
अपूर्व – वैसा ही बेफिक्र,.,., तुझे तो इतनी भी फिक्र नहीं के मुझे एक कॉल कर दे पहुँचने के बाद ,,, चल पहुँचने पर न  ... पर हवेली से आज तूने कॉल किया ,.,. कल क्यूँ नहीं किया .,.,. और हाँ तू पहुंचा कैसे मेरे भाई और वो भी  सीधे हवेली ,.,. रास्ता किससे पूछा ?????
सिद्धार्थ – [परेशानहोकार] बस बस रुक जा यार तेरे इन सब सवालों का जवाब उस हवेली में ही छुपा हुआ है ,.,.
अपूर्व – क्या ???
सिद्धार्थ – {गंभीरता से } हाँ उस हवेली की कहानी अब हम दोनों को ही मिलकर सुलझानी पड़ेगी ,.,. कल सुबह हम हवेली चलेंगे..
अपूर्व – {चौंककर} क्या बात है भाई ,., अभी तक तो तुम कह रहे थे के एक पल अब उस हवेली में नहीं रुकोगे तुम और अब वापस वहां जाने की बातें कर रहे हो ,.,.,,
सिद्धार्थ— ये बातें हम बाद में करेंगे अब मुझे आराम करने दे भाई ,.,.
अपूर्व – ठीक है ,., तू आराम कर रात कर खाने पे आ जाना मैं करीब 8 बजे तुझे लेने आऊंगा ,.,.
सिद्धार्थ – ठीक है मेरे यार ,.,. मिलते हैं रात के खाने पे ,.,.,.,.,.,.,
,.,.,.,.,.


{L} [ सिद्धार्थ आराम करने लगता है और उसकी आँख लग जाती है ,.,. और वो गहरी नींद में चला जाता है .,.,,रात के खाने पर वो नहीं जा पाता उसकी आँख रात करीब..,., १२ बजे खुलती है ,.,. ]
सिद्धार्थ – [ दर्द में ] आह ,., कोई है कोई है ????
महल की एक दासी – जी मालिक कहिये क्या मदद कर सकती हूँ आपकी ,.,.,,,.,
[सिद्धार्थ के सामने अभी जो दासी आई है,., उसने हुबहू वैसे ही सफ़ेद कपडे पहने हुवे हैं ,.,. जैसे कपडे उस सफ़ेद साये के थे,, वो चौंक उठता है  ]
सिद्धार्थ- [ चौंक कर ] तुम कौन हो ???
दासी – दासी हूँ मालिक ,,.,. कविता नाम है मेरा ,.,.,.,,
सिद्धार्थ—अच्छा अच्छा ,.,. इतनी रात हो गयी मुझे पता भी नहीं चला ,.,., क्या तुम मुझे पानी और कुछ खाने को ला दोगी यहीं ,.. ?
दासी – जी मालिक जैसा आप कहें ,.,,.,.
सिद्धार्थ – मुझे इस दासी से ही उस हवेली की कहानी पूछनी चाहिए ,.. शायद इससे कुछ पता चले मुझे के आखिर उस हवेली की कहानी क्या है ????
दासी – लीजिये मालिक खाना खा लीजिये ,.,. अरे रे आप उठने की तकलीफ मत कीजिये ,., मैं आपके लिए टेबल लगा देती हूँ ,.,. आप यहीं बिस्तर पे बैठे बैठे खा लीजिये ,.,.
[ सिद्धार्थ खाना खता है ,. वो दासी वहीँ उसके बैड के किनारे नीचे बैठ जाती है ,. खाना खाकर सिद्धार्थ दासी से पूछता है ]
सिद्धार्थ  - कविता क्या तुम उस हवेली के बार में जानती हो ???
दासी – [ चौंक कर ] हवेली ,,. वो भूतिया हवेली साहब ???
सिद्धार्थ – हाँ वही हवेली जिसके कारण मेरा ये हाल हुआ है ,.
दासी – जी साहब जानती हूँ ,.,. पर उस हवेली की कहानी लम्बी है समय लगेगा बताने में ,.,.
सिद्धार्थ – ठीक है तो चलो हम कहीं बैठ जाते हैं ,.,. इस कमरे में मुझे घुटन भी हो रही है .,., कहीं खुले में बैठ कर आराम से बात करते हैं ,.,., अगर तुम्हे अपने घर न जाना हो तो ,.,,
दासी – जी साहब आइये मैं आपको इस महल की सबे खुली हुई और खूबसूरत जगह ले चलती हूँ आपको वहां बहुत अच्छा लगेगा ,.,.,.
सिद्धार्थ – ठीक है चलो ,.
[ दासी उसे कमरे से महल के ऊपर बने एक झरोखे के पास ले जाती है .,.,. जहाँ  कुछ मोर चहलकदमी कर रहे हैं,, ठण्डी हवा चल रही है  ,., और वहां एक झूला भी लगा है,,., सिद्धार्थ उस झूले पर बैठ जाता है ,, दासी किनारे बनी फूलों की क्यारी पे बैठ जाती है ,.,.]
सिद्धार्थ – [ बैठते हुए ] अन्हं .... तो बताओ क्या कहानी है उस हवेली की ????
दासी –- साहब ये कहानी करीब १०० साल पुरानी है,, जब कुंवर सा के दादा जी राजा वीर सिंह जी जिंदा थे ,.,. उनके पिताजी ने उस हवेली को बनवाया था ,, अंग्रेजों की छावनी थी उस हवेली में ,.,., और राजा साहब हर रोज़ वहां जाया करते थे ,.,., वहन हवेली में जो अंग्रेज़ अधिकारी रहा करता था ,., उसे कहानियाँ सुनने का बड़ा सौख था  ,,.,. , और साहब हम बंजारे हैं ,., हमारा काम सदियों से घूम-घूम कर नाच गा के लोगों को कहानियाँ सुनाने का रहा है ,.,., उस अंग्रेज़ अधिकारी ने हमारी एक कुंवारी बंजारन को ज़बरदस्ती उस हवेली में कैद रख लिया था ,. जो उसे कहानियाँ सुनाया करती ,., और जो कभी उसकी कहानियाँ ख़त्म हो जाती या वो कुछ भूल जाती तो ,. वो ज़ालिम अंग्रेज़ उसे शराब के नशे में मारा करता था ,., खूब सताया करता था ,.,.,., एक दिन इन सब से तंग आ कर ,. उसने हवेली की छत से खुदखुशी कर ली ,.,  पर आखिर में बंजारों ने ठीक एक महीने बाद उस अंग्रेज़ को भी हवेली में घुस कर मार दिया ,.,., लोग कहते हैं उसी बंजारन की आत्मा है उस हवेली में ,.,.,.,.,., जो अपनी कहानी सुनाया करती है वहाँ आने जाने वाले हर मुसाफिर को ,. और उस अंग्रेज़ की आत्मा आज भी उसे सताया करती है ,.,,.
सिद्धार्थ – ओह तो,., ये बात है ,.,.तब तो वो साया उस बंजारन की आत्मा थी ,., जिसके बारे में तुम बता रही हो ,.,,     
दासी -- हाँ साहब,,, क्या करें बड़ी दर्द भरी कहानी है उस बंजारन की ,.,.,,
सिद्धार्थ – ठीक है .,., तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया जो तुमने मुझे ये सब बता दिया ,.,., वरना तो मैं यही सोच सोच कर पागल हो जाता के आखिर उस हवेली की कहानी क्या है ..... अब तुम जाओ मैं यहीं कुछ देर अकेला बैठना चाहता हूँ ,.,.,
दासी – ठेक है साहब ,.,. जो हुकुम ,.
सिद्धार्थ – [ अपने आपसे ] अब आगे की कहानी अपूर्व ही बताएगा मुझे ,.,.,., मेरे दोस्त बहुत कुछ छुपाने लगा है तू आज कल मुझसे ,.,,  
      
{M} [ सुबह हो चुकी है ,., सिद्धार्थ उस झूले पर ही सोया हुआ है ,., उसकी आँखें खुलती हैं ,.,. कबूतरों ,., चिड़ियों और मोरों की आवाज़ आ रही है ,.,., झरोखे के कल-कल आवाज़ आ रही है ,.,., अपूर्व पास ही सोफे पे बैठा चाय पीते हुवे ,., पेपर पढ़ रहा है ., और सिर्र्था के उठने का इंतज़ार कर रहा है  ]
अपूर्व – उठजाओ भाई रात के मुसाफिर यहाँ कैसे पहुँच गए ,.,.,.,., और कल रात डिनर पर भी नहीं आये तुम ,.,,

सिद्धार्थ – भाई कल रात देर से उठा मैं तो नहीं आ पाया ..,.,माफ़ी चाहूँगा ,.,. और यहाँ तो मुझे वो दासी .,. क्या नाम था उसका .,. हाँ कविता ले कर आई थी कल रात ,.,.,
[इतना सुनकर अपूर्व के होश उड़ जाते हैं ,., उसके हाँथ से चाय का कप छूट जाता है ,.,., वो दौड़कर सिद्धार्थ के पास झूले पे बैठ जाता है और कहता है ]
अपूर्व – [चौंक कर] क्या कह रहा है यार तुझे कल वो दासी दिखी थी ,., कविता ,.,., 
सिद्धार्थ – हाँ भाई ,., उसी ने कल मुझे खाना खिलाया पानी पिलाया और यहाँ लेकर आई ,.., उसने मुझे हवेली की कहानी भी सुनाई ,.,.,.,.
अपूर्व – [ खुश होते हुवे ] गज़ब हो गया मेरे दोस्त गज़ब हो गया ,.,. जिस आत्मा से मैं  इतने दिनों से संपर्क करने की कोशिश कर रहा था ,., वो कल खुद तुझसे मिलने आई थी ,.,., तुझे पता है वो कौन है ,.,. ?
सिद्धार्थ – [ असमंजस में ] हाँ हाँ  ,.,. वो एक दासी है तेरे महल की ,.,.,
अपूर्व –  अरे मेरे भाई वो कोई दासी नहीं उसी बंजारन की आत्मा थी ,., जो उस हवेली में रहती है ,.,.,. और वो तुझसे कुछ कहना चाहती है ,.,.,.,.,,., और क्या कहा उसने तुझसे ????
सिद्धार्थ – कुछ नहीं बस कहानी सुनाई और मैंने उसे जाने को कहा तो वो चली गयी ,.,..,
अपूर्व – { आश्चर्य से } कौन सी कहानिओ सुनाई उसने तुझे ???
सिद्धार्थ – यही के उस बंजारन ने ताल में कूदकर जान दे दी ,, फिर बंजारे लोगों ने उस अंग्रेज़ को मार दिया,.,. पर वो कह रही थी के उस अंग्रेज़ की आत्मा आज भी उस बंजारन की आत्मा को सताती है ,.,.,.,
अपूर – तो पूरी कहानी अब सुन मेरे यार ,,... जब उस बंजारन ने खुदखुशी की थी ,., उस रात ही उस सनकी अंग्रेज़ ने उसकी आत्मा को कैद करने के लिए एक तांत्रिक को बुलवाया था ,., उस तांत्रिक ने उस लड़की के खून को एक पेन की स्याही में मिलाकर मन्त्रों से सिद्ध कर ,,,, उस अंग्रेज़ की दिया और कहा ,., इससे कोई कहानी लिखो पर उसे अधूरी ही छोड़ देना ,., जब तक वो कहानी अधूरी रहेगी... उस लड़की की आत्मा उस हवेली में ही उसकी गुलाम रहेगी ,., और उसे कहानियाँ सुनती रहेगी ,.,. अगले दिन लोगों ने उस अंग्रेज़ को ही मार दिया ,.,., पर किसी को इस अधूरी कहानी के बारे में पता नहीं ,.,. बस मेरे परदादा जी को उस तांत्रिक ने ये बात बताई थी ,., उन्होंने भी उस अधूरी कहानी को पूरा करने के बहुत कोशिश की पर ,.,. उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा .,.,.,.आज तक वो हवेली बदनाम है जिसके डर से हम लोग भी नहीं रह पाते वहां ,.,. 

सिद्धार्थ – ऐसा है तो भाई हमनें अभी हवेली को निकलना चाहिए ,.,., उस कहानी को पूरा मैं करूँगा और बेचारी बंजारन की आत्मा को मैं उस अंग्रेज़ की बुरी आत्मा से आज़ादी दिलाऊंगा .,.,.,
अपूर्व – तेरा बहुत एहसान होगा मेरे दोस्त ,.,.,,और तू लेखक भी है तू ही उस कहानी को पूरी कर सकता हैऊ ,.,.,. चल अभी निकल चलते हैं अगर तेरी चोट ठीक हो तो ,.,.,
सिद्धार्थ- चल मेरे भाई ,.,, अभी सुबह है शाम से पहले मैं उसक कहानी को पूरी कर दूंगा ,.,., आज ही उस हवेली की भयानक और दर्दनाक कहानी को ख़तम होना होगा  .,., और उस बेचारी बंजारन की आत्मा को मुक्त होना होगा ,.,.,
   [ दोनों उसी पल अपूर्व की कारमें स्वर होकर हवेली को निकल पड़ते हैं ] [हवेली पहुचने पर भीमसिंग [नौकर]  मिलता है ,.]
अपूर्व – [नौकर से] – भीमसिंग ,.,.हवेली के सारे खिड़की और डरवाज़े खोल दो ,.,.,., और ध्यान रखो ,, आज इस हवेली में हमारे  अलावा और कोई न आ पाए ,.,., हवेली के मंदिर के पुजारी को भी बुला लाओ ,.,.,., उससे कहना आज मंदिर में दिन भर पूजा होनी चाहिए ,., हमारा सामना आज आत्मा से है बहुत भयानक आत्मा ,., हमें उनकी मदद की ज़रूरत होगी ,.,.,.
नौकर – जैसा आप कहें अन्नदाता ........
[ नौकर झट दौड़ कर हवेली के सरे डरवाज़े और खिड़कियाँ खोलने लगता है ,.,.,.,.,. पर जैसे ही वो नीचे तहखाने का डरवाज़ा खोलने को जाता है .,.,. कोई अनजान सा काला साया उसे उठाकर नीचे पटक देता है ,.,.,., और एक लम्बी चीख़ के साथ वो बेहोश हो जाता है  ] आ आ आआआआआआअ,.,., “चींख”.,.,.,
सिद्धार्थ – लगता है भीमसिंग को उस अंग्रेज़ की आत्मा ने मार दिया है ,.,., अपूर्व ,., अब हमें अकेले ही कुछ करना होगा ,.,, तो जा पुजारी को लेकर आ ,. मैं ,.,,., उस किताब को ढूंढता हूँ वो ज़रूर उस कमरे में ही है ,.,., जहाँ मैं रुका था ..
अपूर्व .,.,- ठीक है मेरे दोस्त ,.,. मैं अभि आया तुम बस अपना ख्याल रखना ,.,.,.,,
[सिद्धार्थ हवेली की ओर दौड़ने लगता है,,..,. और अपूर्व पुजारी के घर की ओर दौड़ा जा रहा है ]
{सिद्धार्थ जैसे ही हवेली के हाल से सीढ़ी पर चढ़ता है ,., उसे उस लड़की का सफ़ेद साया साफ़ दीखता है जैसे वो उसे बुला रही हो और केह रही हो ,.. यहाँ आओ यहाँ  है यो किताब जहाँ मेरी अधूरी कैद है ,.,., वो उसी कमरे की तारफ इशारा कर रही है ,.,., जहाँ सिद्धार्थ रुका था ,.,.,.,}
सिद्धार्थ – [रुक कर हांफते हुवे] एक मिनट .... पर उस दिन मुझे इस कमरे से आवाजें आ रही थीं ,.,. और वो साया मुझे उस कमरे में क्यूँ बुला रहा है ,.,., उस दिन मेरे आने पे इसी कमरे में ही मुझे कुछ अजीब सा महसूस हुआ यहीं से रौशनी भी आई थी फिर ये बंद हो गया था ,.,., ज़रूर कुछ गड़बड़ है ,.,.,मुझे उस कमरे के बजाये पहले इस कमरे में जाना चाहिए ,.,.,.,.,
[ सिद्धार्थ उस कमरे में दाखिल होता है ,.,. वहां चमगादड़ों का बसेरा है ,. ची ची ची ची .,., मकड़ी के जालों का भण्डार है ,.,., और एक छोटी सी तिजोरी राखी हुई है ,. जिसे कई काले और लाल धागों से बाँध कर रखा गया है .,  ]    
सिद्धार्थ – [ अपने आपसे ] लगता है .,., इसी तिजोरी में अन्दर वो किताब है जिसमें वो अधूरी कहानी लिखी हुई है ,.,,
[अचानक डरवाज़ा बंद हुआ अपने आप] सिद्धार्थ -[डरी हुई सी आवाज़ में ] कविता तुम हो .,. क्या ये तुम हो ????
अंग्रेज़ की आत्मा – [डरावनी आवाज़ में ] हा हा हा हा हा हा हा  ,.,. हा हाहा हा हा हाहा .,.,.,. कविता .,. कविता .,., तू उसे ढूढने आया है ,., जो खुद तेरी मौत बनकर तुझे यहाँ तक बुला लायी ,., राइटर ,.,., और अब तो कहानियाँ तो लिखेगा और सुनाएगा भी ,., पर सिर्फ मेरे लिए ,., क्यूंकि मैं तुझे भी मारकर इस हवेली में अपना गुलाम बना लूँगा ,.,. हा हा हा हा हा हा हा हा,.,.,
[ इसी बीच मदिर की घंटियों की आवाज़ आनी शुरू हो जाती है,.,., जिसे सुनकर वो भयानक आत्मा परेशानहोकर जोर से चिल्लाती हुई कहीं गायब हो जाती है,.,]
सिद्धार्थ – [ डरता हुआ ] लगता है अपूर्व ने पूजा चालू करवा दी है ,., थैंक गॉड ,.,बाल बाल बचा मैं ,.,. चलो अब देखता हूँ इस तिजोरी में है क्या ,.,.,.,,
[ तिजोरी में उसे कई किताबें और पुराने ज़माने की फ़ोटोज़ मिलती हैं ,.,., जिनमे से कई फ़ोटोज़ उस अंग्रेज़ अधिकारी की भी होती हैं ]
सिद्धार्थ – [अपने आपसे ] अब इनमें से कौन सी किताब होगी .,. जिसमें वो अधूरी कहानी होगी ,.,.,,,,,. {तभी एक फ़ोटो पर उसका ध्यान पड़ता है ,. जिसमें वो अंग्रेज़ एक किताब पकड़ कर खड़ा है ,., गौर से देखने पर उसे उस किताब के ऊपर “माय लास्ट स्टोरी” ,. जिसका मतलब होता है “मेरी आखरी कहानी”  ,.,. लिखा हुआ दिखाई देता है ,.,.,वो झट से उस किताब को ढूँढने लगता है ,., उसे वो उसे मिल जाती है .,, किताब खोलने पर उसे वो अधूरी कहानी भी नज़र आ जाती है ,., अब बस उसे उस पेन की तलाश है जिससे उस अधूरी कहानी को लिखा गया था }

   {इस बीच अपूर्व उस कमरे में आता है जिसमें सिद्धार्थ उस किताब को हांथ में लिए खड़ा है ,.,. मंदिर की घंटियाँ लगातार बज रही हैं ,.,. मंत्रो का उछारण लगातार चल रहा है .,., हवेली की खिड़कियाँ और डरवाजे भदभदा रहे हैं ,.,., हवाएं जोर जोर से चल रही हैं ,.,.}
 
अपूर्व— {हांफते हुवे } भाई मिली तुझे वो किताब ???
सिद्धार्थ – {परेशानहोते हुवे } हाँ मिल तो गयी पर वो पेन नहीं मिली है अभी उसे ढूंढना बाकी है ,.,.,.,.
अपूर्व – शायद वो पेन उसने कहीं और छुपा राखी हो इस कमरे में न हो .,.,.,
सिद्धार्थ – हाँ  कह रहे हो पर ,., उस पेन को इतनी बड़ी हवेली में हम ढूंढेंगे कैसे ,,.,..,.????
अपूर्व – कोशिश तो करनी होगी ,.,.,
सिद्धार्थ- हाँ चलो ढूंढते हैं .,.,,,,.,,,,, तुम उस तरफ ढूंढो मैं इस तरफ ढूंढता हूँ,.,.,..,,,.
[दोनों हवेली के चप्पे चप्पे में उस अभिमंत्रित पेन को ढूँढने लगते है ,., पर उन्हें पेन कहीं नहीं मिलती .,., आखिर में वो लोग थक हार कर .., उस कमरे में बैठ जाते हैं ,. जहाँ उस रात सिद्धार्थ रुका था .,. दिन ढलने लगता है ,.,., सूरज डूबने लगता है ,.,. पर पेन नहीं मिली अभी तक ,., ]
अपूर्व – भाई अगर वो पेन नहीं मिली तो क़यामत हो जाएगी इस किताब को लेकर यहाँ से निकल भी गए तब भी ये कहानी अधूरी ही रहेगी ,., और उस अंग्रेज़ की आत्मा हमरे पीछे इस किताब को लेने महल तक भी आ सकती है .,., जो मैं नहीं चाहता ,.,., ऐसा करते हैं इसे यही खत्म करते हैं ,., छोड़ यार इस हवेली और इसकी आत्माओं को यहीं रहने दे अपने हाल में ,.,., हम चलते हैं ,., ,.,
सिद्धार्थ – नहीं दोस्त मैंने उस बंजारन की आत्मा की तड़प को महसूस किया है ,., चाहे कुछ भी हो जाये मुझे इस कहानी को पूरा करना ही होगा .,., पर वो पेन मिल जाये न तो ,.,.{अचानक उसकी नज़र उस टेबल पर पड़ती है जहाँ वो उस दिन पेन, कागज़ और दावत की शीशी छोड़ गया था }  [ चौंक कर ] अरे ये पेन और कागज़ अभी तक इस टेबल पे ही पड़े हैं ,., भीमसिंग ने इन्हें वापस नहीं रखा ,.,.,,.
अपूर्व – { चौंक कर } पेन ,.,.???
सिद्धार्थ – हाँ पेन .,.,
अपूर्व – [ख़ुशी से उछालते हुवे] अरे भाई पेन ,., यहाँ हमारी नज़रों के सामने ही है ,.,. पूरी हवेली चान मारी क्या एक भी पेन दिखी इसके अलावा ????
सिद्धार्थ – [ ख़ुशी से चिल्लाते हुवे ] क्या बात है राजकुमार साब  कह रहे हो ,.,., मिल गयी पेन ,.,
[सिद्धार्थ जैसे ही पेन उठता है हवाएं और जोर पकड़ लेती हैं ,.,. अचानक मंदिर से घंटियों और मन्त्रों की आवाजें आनी बंद हो जाती हैं सूरज डूब चूका है ,. और सूरज डूबने के बाद पूजा नहीं की जाती है ,.,. भूतिया हंसी गूंजने लगती है ,. हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा ,][अपूर्व  झट से दौड़ कर उस कमरे के डरवाजे को अन्दर से बंद कर लेता है जिसमें वो लोग हैं ]
अपूर्व – भाई चाहे कुछ भी हो जाये मैं इस डरवाजे को मैं बंद रखूँगा जब तक तू वो कहानी पूरी नहीं कर लेता तू ,., लिखना चालू कर ,.,.,
[ सिद्धार्थ लिखना चालू करता है ,. बेहद हल्की रौशनी है कमरे में सूरज अभी अभी डूब गया है ,. तभी एक जोर की आवाज़ के साथ अपूर्व जिस डरवाजे को बंद किये रहता है वो टूट जाता है,., अन्दर आता है भीमसिंग,., पर उसपे अब उस शैतान अंग्रेज़ की आत्मा का कब्ज़ा है ,.,. वो बहुत ही ताकतवर हो चूका है .,., उसकी आँखें भयानक और  लाल हो गयी हैं ,.,.  गुर्राते हुवे वो अन्दर आता है,. और एक तलवार लेकर कहानी लिख रहे सिद्धार्थ की तरफ बढ़ता है ]
अपूर्व- [चिल्लाकर] सिद्धार्थ उठो जल्दी उठो भागो यहाँ से ,.,.,.,.,
सिद्धार्थ --- [ लिखने में मगन ] पर कहानी अभी बाकी ,.,.,.,.,.,.,.., अहह्ह्ह्हह्ह,., है.................
अपूर्व – [बहुत जोर से चिल्लाकर] सिद्धार्थ,.,. नहीं .,.,.,. [बहुत दुःख में ऊपर वाले को देखते और जोर से रोते हुवे] आआ आआ आआ आ आ “सिद्धार्थ” ,.,.
[तलवार सिद्धार्थ के सीने के पार है ,., उसकी साँसे रुक चुकी हैं ,.,. उसके हाँथ थम चुके हैं ,.,,., खून की धार उस कमरे से होती हुई सीढ़ियों पे बह रही है ,..,.,.,]
,..,..................................................और कहानी अभी भी अधूरी है अभी भी बाकी है .,.,.,.,.,..,.,.,.,

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