सरसराती हवा और तेज़ बारिश में जहाँ सब अपने अपने घरों में घुस गए थे.. मैं इसी बगीचे में बैठ के तुम्हारे आने का इंतेज़ार कर रही थी.. उस शाम तुम ने मिलने का वादा किया था..उस वक़्त मौसम अपने पूरे मिजाज़ में था और मैं भी। पता नहीं ये मेरी ज़िद्द थी या जुनून जो मैं वहाँ से उठने का नाम ही नही ले रही थी। शायद यकीन था तुम पे कि तुम ज़रूर आओगे..
बिजली की कड़कड़ाहट और पत्तों की सरसराहट से मेरे मन में एक अजीब सा डर समा रहा था। ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि ये बिजली,ये पत्ते कुदरत का कोई पैगाम ले कर आये हैं.. कोई पैगाम.. शायद किसी तबाही का..जैसे जैसे बिजली कड़क रही थी उस पीपल के नीचे बैठी मैं खुद में ही सिमटी जा रही थी.. धूल उड़ उड़ के आँखों में भर रही थी।
मन के किसी कोने में अब भी एक उम्मीद थी, कि शायद तुम आओ और आकर मुझे थाम लो और तुम्हारे सीने पे अपना सर छुपा कर मैं राहत की साँस ले सकूँ.. पर रात बहुत हो चुकी थी और तुम अब तक नही आये थे..

तभी लगा जैसे कोई मुझे पुकार रहा है.. मैंने पलट कर देखा.. तो सामने तुम थे.. तुम्हारी आंखो में एक अजीब सा नशा दिख रहा था.. डर से मेरी मुट्ठी बंध गयी..तुम मेरी ओर बढ़ रहे थे। मैं जहाँ की तहाँ खड़ी रह गयी थी।
तुम लड़खड़ाये और धड़ाम! मैंने तुम्हें गिरते हुए देखा, उसी पेड़ के नीचे जहां तुम्हारे साथ बैठ के कुछ हसीं पल बिताने के सपने लिए मैं उस रात बगीचे में आई थी.. दूसरे ही क्षण ऐसा लगा कि मैंने अपने शरीर पर नियंत्रण खो दिया है और फिर... चारों तरफ अंधेरा..

हड़बड़ा के उठी तो देखा कि साढ़े पांच बज रहे थे.. सुबह हो चुकी थी.. मैं पसीने से तर थी। पर मन को सुकूँ मिला की एक बुरा सपना ही था.. लेकिन तभी जैसे किसी ने कानो में आ के कहा हो "सुबह का सपना सच होता है!"
मैं भीतर तक कांप गयी.. झट से फोन निकला और तुम्हारा नंबर लगाया-
"द नम्बर यू आर ट्राइंग टू रीच इज़ करेंटली स्विच्ड ऑफ।"
मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। पर फिर लगा कि था तो सपना ही।मगर दोपहर तक मेरे धैर्य ने जवाब दे दिया। तुम्हारा फोन अब तक बंद था। रह रह के रात का सपना दिल-ओ-दिमाग पर घूमता रहा। मैं बार बार ईश्वर से तुम्हारी सकुशलता की प्रार्थना कर रही थी। तभी फोन की घण्टी बजी। स्क्रीन पर तुम्हारा नाम देख मैं उछल पड़ी।
"हैलो!कहाँ हो। मैं कब से फोन मिला रही हूँ" मैंने हाँफते हुए कहा था। उस समय ऐसा लग रहा था कि सारे वाग्यंत्र निकल कर बाहर आ जायेंगे।
उस वक़्त डर और ख़ुशी ने एक साथ मेरे हृदय में प्रवेश किया था। मैं खुश थी कि तुमसे बात हो पायी। पर धड़कनों में उफान मचा हुआ था।
"हॉस्पिटल में हूँ। कल रात को चक्कर आ गया था। दोस्तों ने भर्ती कराया। डॉक्टर्स ने ऑपरेशन कहा है।"

इतना सुनते ही मैं अपने कमरे से बाहर निकल गयी.. जब रुकी तो हॉस्पिटल के मेल वार्ड में थी..
तुम लेटे हुए थे.. एकदम हताश.. बगल में ग्लूकोज़ की बोतल टंगी थी जिसकी नली तुम्हारी कलाई से जोड़ दी गयी थी.. तुम्हें देख कर बस इतना ही कह पायी-
"मुझे रात में ही पता चल गया था"
और फिर ना मेरे आंसू रुके ना तुम्हारे...

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.