रेत को
भला कभी
मुठ्ठी में बंद
किया जा सका है
तो
फिर इंसान
दुःख दर्द को
अपने में समेटे
उसे क्यों पालते हैं
दु:ख दर्द भी तो
स्थायी नहीं होता
आगे बढने का
नाम है जिन्दगी....
थम कर क्या कोई
उभर पायेगा
दर्द से
मौसम भी तो
बदलता है
अनेक रुपो के साथ
फिर
जीवन युद्द में
उन क्षणों को
भला क्यों हम
स्वीकार करने से
असमर्थ होते हैं
वक्त के साथ
जीने का नाम ही तो
है जिन्दगी
आओं पहचाने
वक्त को
स्वीकार करे
वर्तमान को
आगे बढ़ाये
जिन्दगी को
खुशियों के दामन
भरकर
थामे उन हाथों को
जो
नही है कुछ
पर
मायने जरूर रखती है
उनकी खुशियाँ।

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