फोन में मैसेज टोन की आवाज सुनी तो आँख खुली तो देखा सोशल मीडिया पर किसी मान्या का 'गुड मॉर्निंग' का मैसेज पड़ा हुआ था। अरिहंत ने सोचा होगी कोई सोशल मीडिया फ्रेंड या मेरी फैन। अरिहंत के लिए इस तरह के गुड मॉर्निंग, हाय, गुड नाईट टाइप के सन्देश कोई नई बात नही थे अरिहंत सोशल मीडिया का एक उभरता हुआ लेखक जिसके मित्र और प्रशंसक बढ़ते जा रहे थे एक कम आयु के जिंदादिल इंसान थे। आँख मलते हुए उस गुड मॉर्निंग का रिप्लाई किया और फिर सो गए। थोड़ी देर बाद जब उठे तो देखा उसी फैन मान्या के और मैसेज पड़े हुए हैं। उनको बिना पढ़े ही रिप्लाई में एक मुस्कुराता हुआ इमोजी लगाकर फ्रेश होने चले गए।

दोपहर को फ्री होने पर जब सोशल मीडिया पर ऑनलाइन हुए तो फिर अन्य लोगों के साथ मान्या का भी हाय का मैसेज पड़ा हुआ था। उत्सुकतावश सबसे पहले मान्या के ही मैसेज खोले जिनमे उसने पिछली कहानियों की तारीफों के साथ आगे की कहानियों के लिए टॉपिक दिए हुए थे।

अरिहंत को ये थोड़ा इंटरेस्टिंग कैरेक्टर लगा इसलिये एक नज़र प्रोफाइल पर डाली।

नाम- मान्या अग्रहरि

आयु- 37 वर्ष

पद- बैंक मैनेजर

हालांकि शक्ल से मान्या 25 से अधिक नही लग रही थी पर फिर भी एक महिला अपनी आयु क्यों बढ़ाकर लिखेगी और साथ ही साथ उसके पति और बेटियों के चित्र भी थे जो उसकी आयु को लेकर अरिहंत के मस्तिष्क में चल रहे द्वंद्व को परास्त कर रहे थे।

भोला सा बेदाग़ चेहरा, भरे हुए गाल, नशीली निगाहें, गुलाबी होंठ मान्या के व्यक्तित्व को निखार रहे थे।

अरिहंत ने औपचारिकतावश थैंक्स का रिप्लाई किया पर अगले ही पल मान्या का मैसेज आ गया, "सर आपकी पिछली कहानी 'हम और वो' जिसमे आपने पति-पत्नी और दूसरी पत्नी की कथा लिखी थी, वो मुझे बहुत पसंद आयी। आप ने एक स्त्री का दर्द बहुत अच्छे से उकेरा था उसमें। जितना दर्द पत्नी का उतना ही दर्द दूसरी पत्नी का भी। दोनों को बैलेंस रखने में पूरी ईमानदारी दिखाई आपने। इस कहानी से पहले तो मैंने इस विषय पर सोचा ही नही था'।

अरिहंत ने फिर से थैंक का एक संक्षिप्त रिप्लाई छोड़ा। पर मान्या अभी भी मैसेज भेज रही थी, 'सर उस कहानी में पहली पत्नी के स्थान पर मैं खुद को देख रही थी। मैं भी ऐसी ही जिंदगी जी रही हूँ। प्लीज मेरा मार्गदर्शन करें'। इस संदेश में दर्द था करुणा थी। अरिहंत परेशान हो गए।

परेशान होने की वजह भी वाजिब थी। उनकी काल्पनिक कथा किसी के वास्तविक जीवन का हिस्सा थी।

उन्होंने मान्या को सन्देश भेजा और कहा आप चिंता न करे ईश्वर पर विश्वास रखे सब ठीक हो जाएगा। उस कथा में ये भी दिया हुआ है कि किस तरह से इस प्रकार की समस्याओं का सामना किया जाए। आप पालन करें। सच्चे लोगो की मदद तो भगवान भी करता हैं भगवान पर भरोसा रखें सब सही हो जाएगा।

पर अरिहंत जानते थे कि ऐसे मामले जल्दी ठीक नही होते।

फिर उन्होंने कुछ सावधानी व बचाव के तरीके समझाने की असफल कोशिश की परंतु सब बेकार क्योंकि कहानी के तरीके असल जिंदगी में काम नही आते। कहानी के किरदार आपके कहने पर चलते हैं और असल जिंदगी की कोई भी चाल आप के हिसाब से नही होती। करुणावश अरिहंत ने अपना मोबाइल नम्बर मान्या को दे दिया।

धीरे-धीरे जो बात गुड मॉर्निंग और गुड नाईट से शुरू हुई थी वो पर्सनल बातों तक पहुँच गयी। बातों-बातों में मान्या ने बताया कि 22 वर्ष की आयु में ही बैंक में नौकरी लगने के बाद एक बड़े निजी विद्यालय के शिक्षक से उसका विवाह हो गया जबकि उस शिक्षक के अपने ही विद्यालय की एक अन्य शिक्षिका के साथ पहले से प्रेम-प्रसंग चल रहा था।

कहना तो ये भी है कुछ लोगो का कि उन्होंने चोरी-छुपे प्रेम-विवाह पहले ही कर लिया था पर जातिगत कारणों से उसे सार्वजनिक नही किया था

जब ये बात मान्या को पता चली तो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। पति ने भी बेशर्मी दिखाते हुए सब सच-सच स्वीकार लिया और कहा खामोशी से अपना मुंह बंद रखो वरना इतना बदनाम कर दूंगा कि पूरे खानदान को आत्महत्या करनी पड़ेगी। बोल दूंगा कि इनकी लड़की तो पहले से ही....

नहीं-नहीं कहते हुए मान्या रोती हुई कमरे में चली गयी।

मान्या जानती थी कि कोर्ट-कचहरी में एक पुरुष पर ये सब साबित करना बहुत मुश्किल होता है पर एक स्त्री पर लगाया गया एक लांछन उसके पूरे परिवार का वजूद मिटा सकता है।

पर ये बात उसे सहन नही हो रही थी पर फिर भी परिवार और समाज का मुंह देखकर इतने सालों से वो घुटन में जी रही थी। पर इस कहानी ने उसकी सोच को एक नयी दिशा दी थी। इसलिये इस कहानी के बाद मान्या को अरिहंत से एक विशेष लगाव हो गया था वो अरिहंत में अपना मसीहा ढूंढने लगी थी।

अरिहंत के शब्दों में जादू था। एक कहानीकार शब्दों के खेल से जो रोमांच कहानी में पैदा करता है उन्ही शब्दों से वो मान्या को जोश दिलाने लगे कि हाँ मान्या तुम ऐसा कर सकती हो। यही ठीक है मान्या बस ऐसे ही चलने दो। एक लेखक के लिए बहुत ही आसान होता है अपने शब्दों के जादू से मुग्ध कर देना। अरिहन्त तो अपने शब्दों के जादू से मान्या की ख़ुशी वापस दिलाने की कोशिश ही कर रहा था पर वास्तव में इसका कुछ और भी असर हो रहा था।

अरिहंत के शब्दों के जादू से मानो मान्या की किस्मत खुल गयी। जिन होंठों ने वर्षों से मुस्कान नही देखी थी उन्होने खिलखिला कर हंसना शुरू कर दिया। जिन गालों पर उदासी के काले धब्बे छा गए थे अब उनमे प्यार की लाली छाने लगी थी, मान्या की आँखों के नीचे के काले घेरे कब गायब होकर खुशियों की चमक में बदल गए ये मान्या भी न जान सकी पर सभी ने ये नया परिवर्तन अवश्य देखा। पर किसी ने टोका नही क्योंकि मान्या को कभी किसी ने कोई गलत आचरण करते न तो कभी देखा था न कभी सुना था। इसलिये सब के लिए ये अचंभा अवश्य था पर इसके पीछे कौन था ये कोई नही जानता था।

हालांकि अरिहंत और मान्या अब तक मिले भी नही थे और मिलने का कोई कारण भी न था दोनों अलग-अलग शहरों में अपने काम में व्यस्त रहते थे परंतु मात्र फोन पर की हुई बेहिसाब बातों-बातों में उनके बीच कब प्रेम का अंकुर फूट गया उन्हें खुद पता न चला।

अरिहंत मान्या के दर्द को समझते-समझते और उसे उस दर्द से दूर करते-करते कब उस दर्द का हिस्सा बन गया ये अरिहंत को पता ही न चला। अब अरिहंत को वो दर्द अपने अंदर महसूस हो रहा था। अगर अरिहंत मान्या के लिए एक मसीहा की तरह था तो मान्या भी अरिहंत की जिंदगी की जरुरत बनती जा रही थी।

अरिहंत एक 26 वर्षीय युवा जिसकी पिछले वर्ष ही शादी हुई है और पिता बनने में कुछ ही महीने बाकी हैं।

जबकि मान्या 37 वर्ष की स्त्री जिसकी 2 बड़ी बेटियां भी है।

इनका प्रेम प्रसंग आरम्भ हो चुका था।

सुनने में ही अटपटा लगता है ना!

पर प्रेम किसी भी दीवार, किसी भी बंदिश या रोक-टोक को नही मानता।

प्रेम उम्र के बंधन को भी नही मानता।

प्रेम किसी भी सीमा को नही मानता।

परंतु एक चौदह वर्षों से विवाहित दो पुत्रियों की माँ से एक नवविवाहित नवयुवक का प्रेम!

एक नयी कथा जन्म लेने वाली थी या एक नया इतिहास बनने वाला था।

सोशल मीडिया से अरिहन्त को बहुत कुछ मिला। मान-सम्मान, पहचान, नए लोगों से नए रिश्ते आदि बहुत मिला अरिहन्त को पर वो कभी न मिला जो जीवन यापन के लिए सबसे आवश्यक होता है।

"धन"

धन अरिहन्त की सबसे बड़ी समस्या थी।

अरिहन्त की कथाओं के सैकड़ों लाइक भी मिलकर अरिहन्त के लिए एक वक़्त की रोटी का जुगाड़ नही कर सकते थे।

अरिहन्त की पत्नी मौली जो धन के अभाव के कारण होने वाले शिशु के बारे में चिंतित रहती थी का प्रतिदिन अरिहन्त से झगड़ा होता था।

घर में एक शिशु आना मात्र एक सदस्य का बढ़ना नही, भावी परिवार बढ़ने का प्रथम सोपान है। अभी जो खर्च चल रहा था वो शिशु आने के बाद दुगना हो जाता। ऐसा नही था कि अरिहन्त कोई प्रयास नही करता था पर अरिहन्त को सफलता नही मिलती थी। इस कारण मौली और अरिहन्त में प्रतिदिन किसी न किसी बात पर झगड़ा होता रहता।

इस प्रतिदिन के झगड़े से आहत अरिहन्त को मान्या का दुःख अपना लगा और वो मान्या की ख़ुशी में अपनी खुशी ढूंढते-ढूंढते कब उसकी चाहत में गिरफ्तार हो गया उसे पता नही चला

यही हाल मान्या का भी था, वो विवाहित होने के साथ ही 2 बच्चों की माँ भी थी। न तो ये उसे शोभा देता था और न ही उसकी ये उम्र थी ऐसा करने की। पर अरिहन्त के शब्द जादू करते थे मान्या पर। जितनी देर वो अरिहन्त से बात करती उतनी देर वो खुद को किसी और दुनिया में महसूस करती।

यदि अरिहन्त खुद को 18 वर्षीय युवा समझने लगा था तो मान्या भी किसी षोडशी की भांति ही व्यवहार करती।

मान्या का साथ पाकर अरिहन्त की कलम की चमक और अधिक बढ़ गयी, इंसान जब प्रेम में होता है तो खुश रहता है। ख़ुश होकर लिखी गयी रचना अधिक प्रभावी हो जाती है।

कुछ प्रकाशक भी अब अरिहन्त के लेखन में रूचि दिखाकर संपर्क करने लगे थे। अरिहन्त की पुस्तक छपने वाली थी।

अभी तक न तो अरिहन्त ने और न ही मान्या ने अपने दिल की बात एक दूसरे से कही थी फिर भी दोनों मन ही मन एक दूसरे की भावनाओं को समझते थे।

मान्या के चेहरे की चमक भी अब देखते ही बनती थी।

दोनों में आपसी संपर्क में मान्या के लिये कोई अधिक समस्या नहीं थी, बैंक पहुँच कर ऑनलाइन चैट और समय मिलने पर फोन पर बात। बैंक मैनेजर होने के नाते उसके पास समय और धन की कमी नही थी पर समस्या अरिहन्त के लिए अधिक थी, एक तो धन की कमी ऊपर से समय का अभाव। अरिहन्त के काम पर इसका असर पड़ने लगा जिससे जो धनोपार्जन होता भी था उस पर फर्क पड़ा। जिससे घर में झगड़े और बढ़ने लगे। अरिहन्त के स्वभाव में चिड़चिड़ापन झलकने लगा जिसकी शिकार हुई मौली।

मौली की उपेक्षा होने लगी और इसी बीच मान्या की घटना घटित हुई जिसके कारण मान्या और अरिहन्त और करीब आये।

ये मनुष्य का स्वभाव है वो अपनी समस्या का हल दूसरे में ढूंढता है। वो ये भूल जाता है कि उसकी समस्या और उसके नजरिये से ही समाधान मिलेगा।

दूसरा व्यक्ति समस्या को अपने नजरिये से देखेगा जिससे उचित समाधान नही मिलेगा वरन हम और समस्या ग्रस्त हो जाएंगे।

अरिहन्त सोचता कि वो सब कुछ छोड़कर मान्या के पास जाकर उसके अंकपाश में समा जाए, वहीँ मान्या भी यही सोचती कि काश अरिहन्त उसके साथ होता तो उसे कोई समस्या न होती। अरिहन्त मान्या की भावनाओं को समझता, सम्मान देता और उचित समाधान देता था वहीँ मान्या का पति शशांक इसके ठीक उलट था।

उसके लिये पत्नी का अर्थ मात्र घर की अवैतनिक नौकरानी।

मान्या अंदर ही अंदर घुट रही थी और अरिहन्त भी रोज रोज के झगड़ों से आहत था। एक रोज दोनों टूट गए और प्रणय निवेदन कर बैठे।

पर समस्या अभी भी वही थी।

यदि मान्या अपनी दो बेटियों को नही छोड़ सकती थी तो अरिहन्त को भी भावी शिशु का मोह अपने ओर खींच रहा था।

इस अन्तर्द्वन्द्व में दोनों का मस्तिष्क सुचारू रूप से काम नही कर रहा था।

और बेचैन दिमाग गलती कर बैठता है।

अरिहंत और मान्या इसी प्रकार एक बड़ी समस्या में फंसने वाले थे।

मान्या अपने बैंक के फोन और कंप्यूटर का प्रयोग करती थी अरिहन्त से संपर्क करने के लिए पर अरिहन्त के पास ऐसी कोई सुविधा न थी।

उसे अपने व्यक्तिगत मोबाइल का ही उपयोग करना होता था।

एक रोज मौली ने अरिहन्त के फोन पर मान्या को भेजे हुए सन्देश पढ़ लिये।

जैसा कि तय था कि कोई भी पत्नी अपने पति के जीवन में दुःख-गरीबी या हर समस्या का सामना कर साथ दे सकती है पर दूसरी औरत कभी नहीं।

काफी झगड़े और मान-मुनौव्वत के बाद भी मौली अरिहन्त को छोड़ कर चली गयी। अरिहन्त भी मौली से परेशान अधिक था और उस पर वैसे भी मान्या की मोहब्बत हावी थी इसलिए अरिहन्त ने उस हद तक प्रयास भी नही किया कि मौली को रोका जा सके।

मौली के साथ अरिहन्त की भावी खुशियां भी उसके घर से विदा ले चुकी थी।

आने वाले शिशु की किलकारी जिसे सुनने को अरिहन्त के कान तरस रहे थे वो शायद अब कानों में अगूंजी रह जायेगी।

कुछ दिन शांत रहने के उपरांत अरिहन्त ने मान्या से मिलकर समस्या का हल खोजने का निर्णय लिया और चल पड़ा मान्या के शहर एक अन्जान पते की तलाश में।

सोशल मीडिया पर हुआ प्रेम जो फोन पर परवान चढ़ा आज साकार होने वाला था।

अरिहन्त ने सोचा कि वो पीलीभीत पहुंचकर मान्या को सरप्राइज देगा।

रायबरेली से पीलीभीत तक पहुँचते-पहुँचते अँधेरा छा गया था।

स्टेशन पर उतर कर अरिहन्त ने मान्या को फोन किया और खुद के पीलीभीत में होने की जानकारी दी।

मान्या एक पल को ख़ुशी से चौंकी पर जब अरिहन्त ने पूरी कहानी मान्या को सुनाई तो मान्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

वो बोली, "मैं मानती हूँ कि मैं आप से बहुत प्रेम करती हूँ आपका मान-सम्मान करती हूँ पर आपके लिए मैं अपने पति और अपनी बेटियों को नही छोड़ सकती। आपकी कलम में जादू है, अपनी बातों से किसी को भी मोह लेना आपको बखूबी आता है। जिस तरह मैं आपके आकर्षण में फंस गयी उस तरह कोई और भी फंस सकती है। आज आप ने मेरे लिये अपनी पत्नी और होने वाले बच्चे को छोड़ दिया क्या पता कल किसी और के लिये आप मुझे भी छोड़ दें। आप समझदार हैं पर इतना भी नही समझते कि प्रेम का अर्थ मात्र 'पाना' ही नही होता, बहुत कुछ 'खोकर' भी प्रेम किया जा सकता है पर आपका प्रेम पाने के लिए मैं अपने पति और बेटियों को नही खो सकती। हाँ ये मेरी गलती है कि आपके प्रेम में अंधी होकर मैंने आपसे बहुत वादे कर लिए थे।

पर अब मुझे भी समझ आ गया है कि जो इंसान अपनी पत्नी के लिये वफादार न रह सका वो मेरे लिए क्या होगा? मैं आपका साथ नही दे सकती। प्लीज मुझे अब परेशान मत कीजियेगा। आप अपने घर लौट जाइये प्लीज।"

"पर मान्या एक बार मुझसे मिल तो लो", अरिहन्त ने झिझकते हुए कहा।

"देखिये जिद न कीजिये। आप वैसे भी गलत समय पर आये हैं। मेरे पति घर आने वाले हैं। अब फोन करने या घर आने की कोशिश न कीजियेगा, मैं फोन ऑफ कर रही हूँ।"

इतना कहकर मान्या ने फोन ऑफ कर दिया।

वैसे भी अरिहन्त को मान्या के बारे में मोबाइल नम्बर के अलावा कुछ भी नही पता था, एक अन्जान शहर में किसी एक व्यक्ति को ढूंढना आसान भी नही था और वो भी वो व्यक्ति जिसने स्पष्ट रूप से मिलने को मना कर दिया।

अब अरिहन्त के पास कुछ नही बचा था।

एक पत्नी थी जिसका भरोसा टूट चुका था और अब वो वापस नही आनी थी।

एक वो महिला जिसके लिए उसने सब कुछ छोड़ा अब वो भी अरिहन्त का साथ छोड़ चुकी थी।

थके क़दमों से अरिहन्त पास की शराब की दूकान पर गया।

मान्या के स्विच ऑफ फोन पर फोन लगाता रहा और शराब पीता रहा।

*******

थका-हारा अरिहन्त चला जा रहा है शारदा नदी के किनारे किनारे। अब उसकी कोई मंजिल नही है।

मन में द्वंद्व अभी भी चल रहा है।

नदी भी उसके साथ-साथ अपने वेग से बह रही है।

अरिहन्त के क़दमों की चाल नदी की चाल से बेहद कम थी पर मन का वेग नदी के वेग से बहुत अधिक था।

कोई रास्ता आगे न सूझ रहा था। क्या करूँ? कहाँ जाऊं? उसे कुछ न सूझ रहा था। फोन में अभी भी मान्या का नम्बर डायल हो रहा था जो अभी भी स्विच ऑफ बता रहा था।

दूर शहर में बच्चे आने वाली दिवाली की खुशियां रौशनी और धमाकों से मना रहे थे। यहाँ भी दिल जल रहा था और दिमाग में रह रह के धमाके हो रहे थे।

क्यों-क्यों-क्यों?

आखिर मान्या ने क्यों मना किया?

एक बार मिल तो लेती मुझसे।

एक बार मुझसे प्यार से बात तो की होती।

एक बार झूठी ही सही मुझे दिलासा तो दी होती।

एक बार कहा तो होता परेशान मत हो, मैं हूँ तुम्हारे साथ।

काश! ये सब न हुआ होता।

फोन की बैटरी के साथ अरिहन्त की उम्मीदें भी समाप्त हो रही थीं।

अरिहन्त ने मान्या के लिए अंतिम सन्देश भेजा...

"सुनो!

मैंने कहा था ना तुमसे...

खुशियां बांटने पर खुशियों को नज़र लग जाती है।

देखो ना...

लग गयी नज़र।

दो दिन पहले हम साथ थें, कितना खुश थे। हाथों में हाथ भले न था पर एक दूजे के दिलों में रहते थे।

नज़रों के सामने भले न थें पर दिलों में दूरियां बिल्कुल भी न थी।

खुली आँखों से दीदार को तरसते थें पर बंद आँखों में तुम ही बसते थे।

सब कुछ कितना सुहावना था। दिन भर बात तुम्हारी और रात भर ख़याल तुम्हारा। जीने के लिए इतना ही सहारा काफी था। फिर हुई गलती मुझसे, बहुत अधिक खुश होकर अपनी खुशियां बाँट दी मैंने।

और मेरी नहीं-नही हमारी खुशियों को नज़र लग गयी।

हो गए हम फिर से दूर,

फिर से अजनबी।

सारे फासले मिट गए थे दरमियां जो थे हमारे बस एक कदम की ही दूरी बची थी पर वो एक कदम पार हो न सका।

उस एक कदम की दूरी अब ताउम्र बनी रहेगी हमारे बीच में।

वो एक कदम...

जिसे पार करने में शायद एक पल ही लगता पर वो ही पल भारी पड़ गया हम पर।

उस एक पल में सारी खुशियां छिन गयी हमसे।

बस एक कदम की दूरी....

और सब खत्म हो गया।

हमेशा मेरे और मेरी खुशियों के बीच एक ही कदम का फासला रह जाता है और उसी एक कदम की दूरी से मेरी सारी खुशियां वापस लौट जाती हैं।

जानती हो क्यों?

क्योंकि मैं एक कदम नीचे से सोचता हूँ। लोग सोचने के लिये दिमाग का इस्तेमाल करते हैं

और मैं दिल से सोचता हूँ।

दिमाग और दिल के बीच एक फुट (कदम) की दूरी होती है और वही दूरी मेरे और मेरी खुशियों के बीच हमेशा रह जाती है। मैंने जिक्र किया था तुमसे इस 'एक कदम के फासले' के बारे में पर तुम मना करती रही और कहती रही कि न अब ऐसा न होगा मैं हूँ तुम्हारे साथ तुम्हारे हर कदम पर तुम्हारी हमकदम बनकर...

पर तुम ऐसा न कर सकी।

तुम लौट गयी बिना किसी अवरोध के।

तुम चाहती तो लड़ सकती थी मेरे लिए...

खड़ी हो सकती थी साथ मेरे..

पर वापसी का रास्ता आसान लगा तुम्हे।

एक बार भी न सोचा मेरे बारे में...

एक बार भी न सोचा उन कसमों-वादों के बारे में..

तुम हार जाती जमाने से लड़ने में तो भी अफ़सोस कम होता

पर तुमने तो जमाने से लड़ने को ही मना कर दिया।

छोड़ दिया साथ मेरा उस सफर में जिसकी हमसफ़र सिर्फ तुम थी।

पर मैं आज भी उन्ही राहों पर चल रहा हूँ जिन राहों पर चलने और मिलने का वादा किया था हमने।

बन रहे हैं मेरे कदमो के निशाँ मेरे पीछे-पीछे...

पर दूर-दूर तक न तो तुम हो और न ही तुम्हारी परछाईं।

पर हाँ साथ में हैं जो मेरे वो..

यादें हैं तुम्हारी...

सीने में दफ़न।

हाँ वादे हैं तुम्हारे...

जिन्हें तुम पूरा न कर सकी।

कुछ कसमें है तुम्हारी...

जो दिल ही दिल में टूटती हुई महसूस हो रही हैं।

जानता हूँ आगे का सफर अब अकेले ही पूरा करना है।

मैं लौट नही सकता यहाँ से अब...

आ गया हूँ दूर...

बहुत दूर...

रास्ता नही है पीछे जाने का,

और आगे भी घना अँधेरा है।

काला घना अँधेरा।

कोई रास्ता नही मेरे पास

इस अँधेरे रास्ते में आगे बढ़ने के सिवा...

तुम पर भरोसा करने की शायद यही सजा है मेरी।

खुद को मिटा दिया था तुम्हारी ही चाहत में..

अब खुद बर्बाद भी हो जाऊँगा..

इन्ही राहों पर आगे बढ़ते-बढ़ते।

कोई नही साथ मेरे...

मेरी उम्मीद के सिवा...

हाँ उम्मीद बस एक उम्मीद है बाकी...

कि इस सफर में कभी न कभी, कहीं न कहीं तुम मिलोगी जरूर मिलोगी।

बढ़ा जा रहा हूँ इसी उम्मीद के सहारे मुस्कुराते हुए इस घने काले अँधेरे में भी...

आखिर उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है।"

पर अन्दर ही अन्दर से टूटे अरिहन्त के कदम भी आगे बढ़ने में उसका साथ न दे रहे थे...

मान्या की चाहत उसे वापस खींच रही थी पर मान्या की गलती की सजा वो खुद को देना चाहता था।

विफल प्रेम में अक्सर खुद के जीवन को ही दांव पर लगाया जाता है। ये प्रेम की पराकाष्ठा होती है। जब अपना सबकुछ हारने के बाद मनुष्य को अपने जीवन से भी मोह नही रह जाता। अंत में वो अपने जीवन को भी दांव पर लगाकर हारना ही चाहता है।

अरिहन्त भी इसी मानसिक द्वन्द्व से गुज़र रहा था।

******

अगले दिन के समाचारपत्रों में स्थानीय समाचार में था...

उभरते हुए युवा लेखक अरिहन्त की अत्यधिक नशे में नदी में गिरने से मौत, आत्महत्या की आशंका।

पर ये एक हत्या थी। ये हत्या 'प्रेम में विफलता' ने की थी।

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