वो लड़की

उसे मैं हतप्रभ होकर देखती रही। हाँ वो एक लड़की थी और मैं भी फिर भी मेरी निगाहे उस पर से नही हट रही थी । मैंने उसकी आँखों से दर्द पढ़ लिया था। कलेजा मानो मुह को आ गया था। एक सवाल के साथ मेरी आँखें नम हो गयी। सवाल दिल मे था "ऐसा क्यों" ?? नही रोक पायी मैं खुद को उसके दुख मैं शामिल होने से , नही रोक पाई मैं खुद को रोने से। ........
..
..
ये तब की बात हैं जब मैं एक बार अपनी मम्मी के साथ ऑटो से जा री थी घूमने। खुशनुमा शाम था । ऑटो मैं मदमस्त करने वाला गाना बज रहा था बारिश की बूंदे, ठंडी हवा , काफी था मुझे रोमांचित करने के लिए।
तभी ऑटो रुकी , जगह न होते होवे भी ऑटो वाले ने 1 पे चार का हवाला देते हुवे दो सवारी और ठूस ली। एक लड़की जैसे ही चढ़ी सबकी निगाहे उस पर टिक गयी। औरत , आदमी, बूढ़े, लड़के, और मैं खुद सिर्फ उसकी ओर देख रहे थे। वो सवाली रंग की छरछरे बदन वाली लड़की । सूखे फ़टे ओठ, पुरानी मैली कमीज चहरे पर एक असीम खामोशी , आंखों मैं वीरानी। कुछ अनहोनी बया कर रहे थे।
वो सुंदर नही थी। हैं बिल्कुल भी नही। पर फिर भी सबकी निगाहें उसकी ओर थी। सब उसे घूर रहे थे। सबके दिल मे सवाल उठ रहे होंगे ।पर शहर मे कोई किसी से इतना मतलब भी कहा रखता है। इसलिए किसी ने जहमत नही की कुछ जानने की। मैं बेचैन थी। मेरे अंदर सवालो का सैलाब उमड़ रहा था। मैं पूछना चाहती थी , जानना चाहती थी सब कुछ। अब मदहोश मौसम मुझे अपनी आग़ोश में नही ले पा रहा था। एक अजीब सी शांति छा गयी थी। जो मेरे मन को कचोट रहा था। पर संस्कृति सभ्यता में जकड़ी मैं खामोश बैठी थी।
तभी बगल मैं बैठी एक ऑन्टी ने खामोशी चीरते हुवे उस लड़की के साथ बैठी उस औरत से पूछा ये आपकी बेटी है? उसने बोला हाँ हमार बिटिया हौ। फिर कुछ देर खामोशी छा गयी।
फिर उन्होंने पूछा बड़ी प्यारी बिटिया हैं आपकी , पर खामोश बहूत हैं। डॉक्टर के पास जा री हो। उसकी माँ बोली नाही।
फिर सवालो का सिलसिला शुरू हो गया। हम सब उनकी बातये ध्यान से सुन रहे थे।
अब आंटी ने फिर पूछा दिमागी बीमारी हैं क्या।
तब उसकी माँ भाप चुकी थी शायद सबके मन मे उठ रहे सवालो को।
बिना रुके वो सब कह गयी।
उसने कहना सुरु किया--- का बताई हम ई हमार बिट्टी हो, पहले अइसेन नाही रही , बोलत रही खेलैत रही पूरा घर सर पर लिए राहत रही। फिर हमार भाई के साले ने एकरे साथ बलात्कार कर दिहिन। जानवर की तरह नोचे रहा हमार फूल सी बच्ची का। तभई से ई शांत रहत हैं। ना बोलत हैं ना चालत हैं। कोही का नए पहिचानत बस हमका और अपन बाप को चिह्नत हैं। कुछ खावत भी नही रही । अबे तो 1 साल हो गवा हैं। तनी ठीक हैं खाये पिये लगी हैं। रिस्तेदारी का मलाला बा। कहचेरी ले जाये रे गवाही के लिए । बलात्कारी को पहचवनन के लिए। बड़ी दिक्कत होत हैं गांव से हर महीने पेशी पर आने में। एकरे हालात भी ठीक न ब जैसे तैसे लिए जात हैं।
उसके इतना बोलते ही मेरे अंदर कुछ छन्न से टूटा वो था मानवता ,रिश्तो पर से विश्वास । और फिर शांति छा गयी चारो ओर। इतनी शान्ति की ऑटो की चलने की गड़गड़ाहट भी मुझे नही सुनाई दे रही थी।
वो इतनी छोटी इतनी मासूम थी। ऐसे कैसे कोई कर सकता हैं। वो रिश्तेदार?? हैवानियत की हद्द पर हो गयी। मैंने पहले भी कई बार बलत्कार के किस्से पढ़े थे, सुने थे देखे थे TV पर। पर आज विक्टम को अपनी आंखों से देखा था। उसकी खामोशी उसके दर्द को पढ़ा था। सब को मैंने एक बार देखा और खुद को रोक न पायी और रोने लगी। उसकी हालत पर मैं रो नही रही थी। मैं रो रही थी अपने देश के लोगो को इतना गिरता हुवा देख कर। ऐसी कोंन सी तलब लगती हैं जो लोग अपनी बहन , बेटी तक को खा लेते हैं।
क्या उनका उन पर कोई जोर नही होता क्या वो अपनी घिनोनी सोच पर काबू नही कर पाते।
कैसे वो छड़ भर में रिश्तो को तार तार कर देते हैं। उस लड़की का चेहरा आज भी मेरी आँखों मे हैं। कब बंद होगा ये सब।
लड़कियों को डर किस्से हैं , कुत्ते से, शेर से, या खुद इंसान से।
कब पुरुष जाति ये समझेगी की औरत , लड़की होने से पहले एक इंसान हैं उनकी तरह। वो शरीर खिलौना नही। जिसे जब मन चाहा आया खेल गया।
फिर सोचने पे विवश हो जाती हूँ कि वो लड़की एक साल से कोर्ट के चक्कर लगा री क्यों? क्या कानून बल्तकारी से कमजोर हैं। मर जाने पर कैंडल मार्च ओर जो जिंदा हैं उसे लोग ताने दे दे कर रोज मारते हैं क्यों?
बस इन्ही सवालो मैं ज़िन्दगी उलझी हैं।

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.