नया बचपन

बचपन जीवन की
मरुभूमि में मिला बस
अंजुली भर पानी ।
उम्र के हाथों लिखी
सबसे सुंदर कविता।
सबसे सुंदर कविता के हाथों,
लिखी सबसे सुंदर उम्र।
इसके लिए पीछे नही,
लौटा जा सकता।
इसे साथ लेकर आगे भी,
बढ़ ने नही दिया जाता।
स्मृति मैं अटका बूद बूद,
रिस्ता है बचपन।
बचपन कल नही हो सकता,
बचपन को आज ही होना है।
कल तो अपनी पीठ पर,
दो जून रोटी ढोएगा ।
पझियों की तरह उड़ने का सुख,
कल के हिस्से कहाँ।
यह सुख तो बचपन की गठरी में है।
इसकी शुरुआत तो हो चुकी है
बचपन के चेहरे से
मासूमियत और अबोध
शैतानियों वाला भाव गायब है।
ज्ञान तकनीकी का
विस्फोट बचपन की परंपरागत
छवि को बदल रहा है
बचपन एक हमेशा
बदलती रहने वाली
सामाजिक शिल्प कृति है
इसमें बदलाव लाने वाले भी
तमाम आर्थिक सामाजिक
और सांस्कृतिक कारण है
सूचनाओं की आंधी
बचपन को बहा ले जा रही है।
बचपन और मासूमियत के
बाजार से दुनियाभर में
चिंताएं गहरा रही है
मनोरंजन के नए परिदृस्य ने
उन्हें रचनात्मक से अधिक
परिपक्व व हिंसक बनाया है।
हम इन मासूमो की
खुशियां क्यो लूटे, जो
इतनी जल्दी बीत जाती है।
बचपन मे कड़वाहट क्यो भरे
ये दिन न कभी आपके
लिए वापस लौटेंगे,
न उनके लिए।।

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