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संजीव निगम

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manoj uniyal
नमस्कार। बिल्कुल यथार्थ चित्रण किया है आपने। ऐसा ही पात्र मेरे शहर था। एक पागल जिसकी गंदी गालियां सुनने के लिए हमारे सज्जन और सभ्य लोग उसे चिढ़ाया करते थे। मैंने कभी किसी को उसके प्रति सहानुभूति का व्यवहार करते हुए नहीं देखा था। आपकी कहानी पढ़कर अनायास उस पागल की याद आ गई। धन्यवाद।
हमराझ
विचित्र लोग
vasundhra
वाह ...अकलमंद इंशान कूछ ज्यादा ही पागल होते हैं :)
Harshita raj
kisi k bhookh ka bahut acha majak udaya hai aapne
Parul Agrawal
बहुत ही घृणित
Gauri Gupta
समाज का विकृत रूप
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