तरुणी का स्वतंत्र राग

ललित मिश्रा

तरुणी का स्वतंत्र राग
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सारांश

नहीं तरुणी, रुको नहीं, गाओ पुनः तुम स्वतन्त्र राग । हाँ हूँ जननी भ्रममात्र यह अहम् बाकी है, मानव ने एक माँ के दूध की यही क़ीमत आंकी है ।
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