गहराते स्मृति-दंश

कमलानाथ

गहराते स्मृति-दंश
(2)
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सारांश

                                                    गहराते स्मृति-दंश                                                             कमलानाथ कहानी से - "चाचाजी को शायद डायबीटीज़ की शिकायत थी। मुझे लगा वे कितने निर्भर थे चाचीजी पर। वे ही उनकी सेहत का ध्यान रखती थीं, क्या खाना है, कब क्या नहीं खाना, वगैरह, सभी के लिए। चाचाजी भी बेहद खयाल रखते थे चाचीजी का। उनकी ज़रा भी तबियत ख़राब होती थी तो उनके लाख मना करने पर भी या तो वे घर से काम करते थे या दफ़्तर से छुट्टी ही ले लेते थे। उनको ज़रा भी घर का काम नहीं करने देते थे, यहाँ तक कि खुद ही कई बार खाना बनाने की ज़िद करते थे।....." "...जब चाचाजी दफ़्तर से लौटे, वे वहीँ कुर्सी पर लुढ़की हुई थीं और जो किताब वे पढ़ रही थीं, ज़मीन पर गिरी हुई थी।" "......काफ़ी देर बाद वे मुझे अंदर वाली बैठक में ले गये। कोई हिन्दी फ़िल्मी गाना बज रहा था – “फिर वही शाम, वही ग़म.... ।” टेबल लैम्प के पास एक एल्बम खुला हुआ पड़ा था। शायद वे इसी में खोये हुए थे और उन्होंने घंटी की आवाज़ भी तब नहीं सुनी थी। एल्बम का एक पन्ना पलटते हुए अचानक उनकी आँखों में एक क्षण के लिए चमक आई और उनके मुँह से पहले की तरह निकल पड़ा – “देखो नितिन, ये जिनेवा की फ़ोटो हमारी तब की है जब हम यूरोप में....” और वे फिर से फफक पड़े।"
Dinesh
बड़ी मार्मिक कहानी! यह कहानी नए नए अमरीका गए लोगों की मानसिकता बहुत अच्छी तरह बयान करती है. लेखक ने बड़े सहज तरीके से अंतर्मन के भावों को अभिव्यक्त किया है. किसी व्यक्ति का हमेशा साथ रहने वाले से बिछोह होने पर क्या स्थिति हो जाती है, उसका बड़ा मार्मिक विश्लेषण!
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