दो रास्ते

अमित राय

दो रास्ते
(88)
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सारांश

शाम के 5 बज गये थे और बनारस से लखनऊ जाने वाली ट्रैन प्लेटफार्म पर लग गयी थी और मैं भारी मन से बैठे भी गया था लेकिन मेरा ध्यान तो उस चेहरे की तरफ था जिसको स्टेशन की भीड़ मै एक झलक भर देखी थी | मुझे पक्का यकीन था की वो स्वाति ही थी हा वो स्वाति ही थी कई रातो की नींद और महीनो का चैन जिसके लिये गवाया हो उसको कैसे भूल सकते है, जिसके लिये ना मन होते भी कॉलेज जाने का मन करे सिर्फ और सिर्फ उसकी एक झलक पाने के लिए सिर्फ उसको देखने के लिए, और मैं स्वाति को तो किसी भी भीड़ किसी भी अंन्धेरे मै पहचान सकता हूँ.
Deepika Bugalia
nice
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shubham singh
aap thoda aur behtar kariye apne sbdo me bhawnaye bhariye....
Manshi Chaudhary
so nice
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Amit Gupta
अच्छी कहानी
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Nisar Shaikh
behtreen
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