शेष जो था ......

अमरपाल सिंह 'आयुष्कर'

शेष जो था ......
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पाठक संख्या − 384
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vivek singh
अमरपाल जी की ये रचना सिर्फ एक कहानी भर नहीं है....प्रीतिका से अलग होने की पीड़ा और श्यामली के रूप में मिलने वाली आशा बीच झूल रहे शिवेन के मन की पीड़ा के दर्शन इस कहानी में होते हैं।दरअसल इसे केवल एक कहानी मानकर पढ़ना अपनेआप में एक भारी भूल होगी...ये किसी एक शिवेन/प्रीतिका/श्यामली की कहानी नहीं है....आज के इस उपभोक्तावादी सामाजिक व्यवस्था में सामाजिक सबंधो के निरंतर बदल रहे मायनों को लेखक ने जिन तीन पात्रों के माध्यम से समझाया है वो अदभुत् है।आज रिश्ते जिस तरीके से अवसरवादी हो रहे हैं उसे अपनी कहानी के माध्यम से बता कर अमरपाल जी ने समाज को आईना दिखने का प्रयास किया है......इस कहानी के माध्यम से अमरपाल जी ने हमे आगाह भी किया है की कही हम अपने रिश्तों में से जीवन तो नहीं ख़त्म करते जा रहे हैँ।आशा करता हूँ की इसी प्रकार से अच्छी रचनाये हमें पढ़ने को मिलती रहेंगी।अमरपाल जी को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाये।
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Aprajita
Amazing... heart touching..... dil se dil tak...
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ajai mittal
behtareen kahani bahut dino baad padhi. nape tule sampoorn shabd evam bhavnaon ka poorn bakhan.
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गिरधर गोपाल मिश्रा
Maar hi daloge kya?? Itne behtareen shabd khoz k kahan se laate ho... Inspired me back...
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Tripti Sharma
Bahut sunder lekh amar sir.....aapki abhivyakti ka jawab nahin.. Bhawnaon ko shabdon mein piro diya aapne.. So happy for uuu
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Yashasvi Singh
This is really amazing 👏
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Kumar Awkash
ये कहानी अपनी आत्मा और वजूद की तलाश करती है।। बधाई।।।।।
jayant jayant
मुझे नहीं पता था की जया मैडम इतने टैलेंटेड इंसान की धर्मपत्नी हैं । बहुत सुन्दर लेख
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Rajeev Nayan
Jiwan ke wastwikta ko spars krte huwe likha gaya story hai...ise pdha jana chahiye.
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Rajeev Nayan
Real life story....sabdon ko chun chun kr piroya gaya hai ...kthank ka nam bhi sandar hai.Puri kahani ko pdha jana chhiye.
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