बिन्दिया-बलिदानी

हिमालय की फूलों से लदी वादियाँ, ऐसा लगता है मानों स्वयं प्रकृति ही सोलहो श्रंगार किये, अपने प्रियतम् हिमालय संग रास रचाने आई हो। आम्र-मंजिरयों की भीनी महक, पक्षियों का कोमल कलरव एवं फूलों की अलौकिक खुशबू से स्यात् समीर में साँस लेने मात्र से शारीरिक संवेदनाओं से परे एक आत्मिकता युक्त स्वार्गिक सन्तुष्टि की अनुभूति होती है।

सारी दुनिया की विलासिता भरी जिन्दगी से परे हिमालय की इन्ही खूबसूरत वादियों के बीच एक नन्हा-सा गाँव था -कुन्दनपुर। आधुनिकता से कोसों दूर उस गाँव के लोग पुरानी परंपराओं का निर्वहन करते थे। वह परंपरा अच्छी थी या बुरी,इससे उन्हे कोई सरोकार ना था। उन्हे तो भरोसा था माँ जगदम्बा पर। सदियों से लोग मानते आ रहे थे कि जब माँ जगदम्बा प्रसन्न होती हैं तो घर खुशियों से भरा रहता है किन्तु दुर्भाग्यवश जब कभी माँ नाराज़ होती हैं, तो सारे गाँव पर भारी मुसीबत आती है।


इसी कुन्दनपुर गाँव में रहती थी वो। बड़े प्यार से राघव ने अपनी इकलौती बेटी का नाम रखा था-बिन्दिया। नटखट,चंचल और ना जाने क्या-क्या थी वो। अपने स्वभाव की वजह से सबकी चहेती थी बिन्दिया। गाँव की पाठशाला में पढ़कर अब सयानी हो चली थी वो। राघव थोड़े आधुनिक किस्म के व्यक्ति थे। बचपन से डॉक्टर बनने का ख्वाब संजोय थे पर गाँव-समाज ने उन्हे बनने ही ना दिया। वही सपना अब वो अपनी बेटी की आँखों से देखना चाहते थे। राघव जी ने बिन्दिया को शहर भेजने का निर्णय लिया।

पूरे गाँव में राघव का घोर विरोध हुआ। लोगों ने समाज के नियमों का हवाला देकर उन्हे रोकने की भरसक कोशिश की पर राघव अपने निर्णय पर अटल रहे। परिणाम भयानक हुआ, बिन्दिया के माता -पिता को मानसिक यातनाँए झेलनी पड़ीं। उन्हे समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। लोग उन्हे उपेक्षा से देखते थे। इन सब के बावजूद राघव के चेहरे में द्वेष की एक रेखा तक नहीं आई। उन्हे लोगों की सोंच पर तरस आता था, जो आगे बढ़ना ही नहीं चाहते थे।

पाँच साल बीत गये थे इस घटना को। बिन्दिया के जाने से जैसे ग्रहण सा लग गया था सभी की खुशियों को। वो हँसता-खेलता सुकुमार सा गाँव जाने किस महामारी की चपेट में आ गया था। हर हफ्ते -महीने में कोई ना कोई हमेशा के लिए चला जाता था। बिन्दिया कहीं विचलित ना हो जाए , इसलिए राघव ने चिट्ठी में कभी इस का जिक्र नहीं किया। आज फिर उसकी चिट्ठी आई थी। उसना सपना साकार हो गया था। बिन्दिया डॉक्टर बन गई थी। दो दिन बाद वह घर आ रही थी।

आज पूरे पाँच साल बाद बिन्दिया अपनी माँ से मिल रही थी। खुशी में सब खोए-खोए से थे।पर एक टीस थी बिन्दिया के दिल में।उसका हँसता-खेलता कुंदनपुर श्मशान सा लग रहा था। बिन्दिया मन ही मन रो रही थी।उसने निश्चय किया, वो कल ही सभी डॉक्टर्स को बुला कर पूरे गाँव का इलाज शुरू कर देगी। आधी रात तक यही सोंचते-सोंचते पता नहीं कब वह सो गई।

बाहर शोर-शराबा सुनकर बिन्दिया की नींद खुल गई। आँगन में देखा तो सुबह हो चुकी थी । वह दरवाजे की तरफ बढ़ी। बाहर का नज़ारा देखकर उसके पाँव ठिठक गये। बाहर लोगों की भीड़ थी, जिनके हाथों में डण्डे और चापड़ थे। कुछ लोगों ने उसके माता-पिता को पकड़ रखा था। "इसी पापी नें पुरखों के नियमों को तोड़कर माँ जगदम्बा को नाराज़ किया है, अब हर महीने किसी ना किसी की बलि तो वे लेंगी ही"। "जब तक यह जीवित है , हममे से कोई भी सुरक्षित नहीं है।"-यह कहते हुए एक युवक बिन्दिया को नीचे खींच लाया। बिन्दिया अभी भी हतप्रभ थी, पूरा गाँव समवेत स्वर में 'बली -बली ' चिल्ला रहा था। बिन्दिया के माँ-बाप लोगों के पैरों में लेटे बिन्दिया के जीवन की भीख माँग रहे थे, और लोग तिरस्कार से उन्हे लुढ़का दे रहे थे। कुछ लोगों ने बिन्दिया को मिट्टी को तेल से सरोबार कर दिया। बिन्दिया सहमी हुई थी। ये सारे वही लोग थे, जिनकी गोद में बिन्दिया बड़ी हुई थी। जिन हाथों ने उसे बचपन में जमीन से उठा कर सीने से लगाया था, वही हाथ उसे आज आग के हवाले करने जा रहे हैं। बिन्दिया उद्विग्न हो उठी थी। अचानक हर तरफ सन्नटा सा छा गया। देखते ही देखते माचिस की एक तीली ने बिन्दिया को आग का गोला बना दिया। बेटी को बचाने के लिए बिन्दिया की माँ उससे लिपट गई। लोगों ने राघव को पकड़ लिया था। थोड़ी देर तड़पने के बाद वो दोनों राघव को छोड़ कर हमेशा-हमेशा के लिए दूर चली गईं।

महीनों हो चले थे राघव को अन्न जल छोड़े हुए। सिर्फ हड्डी का एक ढाँचा बन कर रह गया था वह। जैसे जीने का तमन्ना ही खो चुका हो वो, और जीता भी तो किसके लिए जीता । भूले-बिसरे कभी कोई तरस खा कर दरवाजे पर दो-चार रोटियाँ रख जाता तो भी अगले दिन वह ज्यों की त्यों रखी रहती। चिट्ठयों से घर का दरवाजा अटा पड़ा था। ये सब बिन्दिया के अपने थे,कुछ दोस्त, कुछ वो जिनका चहेती थी बिन्दिया। सब में बस एक ही प्रश्न था- "कब आ रही है तू ?"

गन्दे और फटे कपड़ों वाला वह पागल, बच्चों का प्रिय मनोरंजन था। हर दिन छोटे पत्थरों से उस पागल के सिर पर निशानेबाजी का अभ्यास बच्चे तब तक करते जब तक कि वहाँ से गुज़रने वाला कोई व्यक्ति उन्हे डपट नही देता। दोपहर की कड़ी धूप भी उन्हे विचलित न कर पाती थी। राघव की आँखों में अब आँसू नहीं होते थे, होती थी तो बस एक लम्बी उदासी और बेबसी। रात के सन्नाटे में उसके सिसकियाँ साफ सुनाई देती थी।

उस रात भीषण बारिश हुई। बिजली की कड़कड़ाहट आकाश के क्रोध की बानगी दे रही थी। डरे सहमें लोग सारी रात बारिश के थमने की प्रार्थना करते रहे । बारिश थमने तक उजाला हो गया था । चारो तरफ बस पानी ही पानी था। सबको बस अपनी फिकर थी। कोई अपने खेतों की तरफ भागा जा रहा था, तो कोई अपना टूटा हुआ छप्पर बाँध रहा था। बस एक कुत्ता था, जो बार-बार राघव के निश्चल शरीर को सूंघ रहा था। उस निर्जीव चेहरे पर मौत का भय नहीं,मिलन की खुशी थी। हो भी क्यों ना, इतने दिन बाद जो जा रहा था अपनी बिन्दिया से मिलनें...!




महेन्द्र सिंह


सितम्बर 11,2011

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