रेडियो नाटक

अवधि ३० मिनट लगभग

पात्र परिचय
पत्रकार ,पप्पू ..एवं…बदरू…बाल नक्सली;रजनी युवती नक्सली;कमांडर आकाश युवा नक्सली नेता;एक बुजुर्ग सेवा निवृत व्यक्ति;अखबार का हाकर;राजू बुजुर्ग का नाती;शालिनी बुजुर्ग की नातिन;वाद्य यंत्रो के साथ गायक दल
नेपथ्य स्वर हेतु पुरुष व नारी उद्घोषक

दृश्य १

करमा गीत पर मादंर की थाप के साथ

चलो नाचे जाबा रे गोलेंदा जोड़ा………

करमा तिहार आये है

…, नाचे जाबो रे………..।

पहली मैं सुमिरौं सरस्वती माई रे



पाछू गौरी गणेश रे

…….गोलेंदा जोड़ा …।।

गांव के देवी देवता के पइंया लगारे

….

गोड़ लागौ गुरुदेव के रे

….. गोलेंदा जोड़ा ..।।

+=+=+

धीरे धीरे

करमा नृत्य गीत के स्वर मद्धिम होते जाते हैं .

नारी स्वर गूंजता है

मैं, बस्तर की आवाज हूं हजारों-हजार साल का जिन्दा इतिहास । जैव विविधता, लोक संस्कृति ,सघन वनो को समेटे हुये , मेरे आगोश में यहां लोग हजारो हजार साल पुरानी संस्कृति भी जीते हैं तो आज की आधुनिकता भी। पहाड़ी मैना भी मेरा ही अंश है तो प्रकृति की देन , केशकाल की घाटी की वह खूबसूरती भी , जिसे निहारने देश-दुनिया से लोग निरंतर यहां आते हैं, चित्रकूट जलप्रपात …भोले भाले आदिवासी ..मां दंतेश्वरी का आशीर्वाद मेरी पूंजी है .।

सरकार साल दर साल मेरे विकास के लिये करोड़ो का बजट बनाती है .. ..चैक कटते हैं .. कुछ न कुछ मेरी धरती तक भी पहुंचता ही है .. विकास की भाषा में बस्तर की उन्मुक्त शोडषी की मुस्कराती तस्वीर छप जाती है ..इन दिनो मुझे नक्सलवाद से बचाने के लिये भी बढ़ चढ़ कर बजट स्वीकृत हो रहा है ..अर्ध सैन्य बलो और पोलिस की टुकड़ियां जंगल के चप्पे चप्पे पर तैनात की जा रही है . मेरी पहचान केवल आदिवासियो का लोकनृत्य या उनकी घोटुल प्रथा ही नही है … मुझे दुख है कि मेरे वास्तविक दर्द को न तो कोई पहचान रहा है न ही उसका निदान करने का सच्चा प्रयत्न ही हो रहा है . मुझे तब भी उतनी ही पीड़ा होती है जब कोई पुलिस वाला नक्सलवादी घटना में शहीद हो जाता है और उस वक्त भी मैं बेबस होती हूं जब कोई कथित नक्सलवादी मारा जाता है …मरता तो इंसान ही है ना . संहार में नही समग्र विकास में विश्वास है मेरा ..सबको साथ लेकर, सबको समाहित कर सृजन की संस्कृति है मेरी ..
दृश्य परिवर्तन की ध्वनि

युवती- बच्चों आप हैं प्रसिद्ध अखबार सुबह के पत्रकार रवि वर्मा ..इन्हें चीफ ने भेजा है ..आज ये तुम सबसे बातें करेंगे ..

बच्चे एक साथ- लाल सलाम !

पत्रकार- नमस्ते बच्चो नमस्ते . एक बच्चे की ओर मुखातिब होकर ..बेटा क्या नाम है तुम्हारा?

पप्पू - पूरे आत्म विश्वाश से … नाम जान कर क्या करेंगे ? नाम तो कुछ भी हो सकता है- पिंटू, गुड्डू, छोटू, मोटू… नाम में क्या धरा है ? सभी नाम हैं मेरे.

पत्रकार - पर फिर भी ..तुम्हें तुम्हारी मां क्या कहती थी बेटे ..

पप्पू - मां !, भावुक होकर .. मेरा असली नाम पप्पू है ! मां मुझे पप्पू कहती थी .

पत्रकार - तुम क्या करते हो यहां ?

पप्पू - मैं हथियार ढोने, खाना लाने-ले जाने, खबरें पहुंचाने का काम करता हूं . कभी-कभी कार्रवाइयों में भी शामिल होता हूं .हर बार मेरा एक अलग नाम तय किया जाता है

पत्रकार - अच्छा तो पिंटू, गुड्डू, छोटू, मोटू.. ये सारे नाम तुम्हारे ही हैं !

पप्पू - हां , जितने काम उतने नाम .

पत्रकार - अच्छा ! प्यार से एक दूसरे बच्चे से ….और बेटा .तुम यहां कैसे आये ? तुम घर पर क्यो नही रहते ?

बदरू - दूसरा नक्सली बच्चा
मेरे पिता नक्सली संगठन पार्टी यूनिटी में थे , एक पुलिस मुठभेड़ में उनकी मौत के बाद से गांव गांव और जंगलों में घूमता रहा हूं ,मां हैजा से मर चुकी थीं रिश्तेदारो ने भगा दिया . घर में रहता तो भूखों मर जाता. यहां अच्छा खाना मिल रहा है , इज्जत से जीना सीख रहे हैं .आप क्या करोगे मेरे लिये ? स्टोरी बनाकर सनसनी फैलाओगे अपना नाम कमाओगे …

पप्पू - नेता जी ने क्या किया हमारे लिये ? साहूकार ने पटवारी से मिलकर हमारे दद्दा की जमीन हड़प ली ..दद्दा नेता जी के पास गये तो फटकार के भगा दिया ..साहूकार की बैठक जो है नेता जी के यहां … पटवारी की शिकायत बड़े साहब से की तो महिने भर की मेहनत बाद तो मुश्किल से मिले .. बोले ..चुप रहो नही तो बंद करवा दूंगा ..मैं तो बड़ा होकर भून दूंगा सालो को ..अखबार के दफ्तर में गये दद्दा तो भी कुछ नही छपा, तब कमांडर ने ही साथ दिया था हमारा .

पत्रकार - पर फिर भी बेटा जिस उम्र में तुम्हारे हाथों में क़लम और किताब होने चाहिए थे, तुम बच्चों के हाथों में हथियार हैं…यह ठीक नहीं है ! तुम लोग स्कूल जाना चाहते हो?

नक्सली नेता कमांडर आकाश - अरे इन बच्चो से क्या पूछता है भई ..मुझ से पूंछ , सरकार इन ग़रीबों के लिए क्या कर रही है, यह गांवों में जा कर क्यों नहीं देखते ? पिछले सालों में भूखे, गरीबों की संख्या बढ़ी है। राजनीतिक-आर्थिक तंत्र पूरी तरह अमीरों के हवाले हैं। वर्तमान व्यवस्था में बहुसंख्यक लोग हाशिये पर खड़े हैं और उनका तीमारदार कोई नहीं है। हमारा नक्सलवाद देश के एक-तिहाई से अधिक क्षेत्रों में अपनी जड़ें जमा चुका है । समस्या यह है कि सरकार नक्सलियों के दमन की नीति पर चलती रही है , उन समस्याओं पर गौर नही करती जिनके कारण नक्सलवाद का जन्म हुआ ।

पत्रकार - यह ठीक है कि नक्सलवाद को लेकर हमेशा यह दुविधा रही है कि इसे कानून-व्यवस्था की समस्या माना जाए या सामाजिक-आर्थिक समस्या . यह भी सही है कि उल्फा, बोडो आंदोलन की तरह नक्सलवाद कोई पृथकतावादी आंदोलन नहीं है। नक्सली संगठनों को स्थानीय स्तर पर समर्थन भी पृथकतावादी संगठनों की अपेक्षा ज्यादा है। फिर भी आखिर इस समस्या का अंत कैसे होगा ,क्या सोचते हैं आप ?

नक्सली नेता कमांडर आकाश - हँसते हुये.. जिन मुद्दों पर यह आंदोलन शुरू हुआ था, वे आज भी मौजूद हैं इसलिए कोई कारण नहीं कि आंदोलन दमनकारी नीतियो से समाप्त हो जाए। आज देश में लगभग 56 नक्सल गुट मौजूद हैं . समाज से असंतोष और विक्षोभ का नाश नहीं हुआ है। हजारों लोग भूखे, पीड़ित, शोषित और अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, ऐसे में नक्सलवाद समाप्त कैसे होगा ? अर्थव्यवस्था का जब तक असंतुलित विकास होगा, दबे-कुचले लोग व्यवस्था के प्रतिरोध में आवाज उठाएंगे । लेकिन क्या विकास के आंकड़ों को बेलने और खेलने वाले लोग हमारी आवाज़ सुन रहे हैं ?

पत्रकार - पर हम लोकतंत्र में रह रहे हैं .. अपनी बात मनवाने के और भी कई लोकतांत्रिक तरीके हैं बहुत से लोग आज नक्सलवादी गतिविधियो के चलते ही अशिक्षित रह गये हैं, पलायन कर रहे हैं ..या मारे जा रहे हैं, आम आदमी के मानव अधिकारो का हनन नक्सलवादी गतिविधियो के कारण ही हो रहा है । क्या यह सच नही है कि नक्सलवाद कभी आन्दोलन हुआ करता था आज यह विशुद्ध आतंकवाद है। नक्सलवाद अब केवल ‘मनी गेम’ बन कर रह गया है. नक्सलियों के लिए नीति और सिद्धांत जैसे शब्द अब बेमानी हो गए हैं ? नक्सलाइट भ्रांति में फंसी क्रांति है ..क्या नही ?
नक्सली नेता कमांडर आकाश .. ऐ भई ..तू बहुत बोल रहा है.. अपने को ज्ञान नही मांगता ..तुझे चीफ ने भेजा है इसलिये सुन रहा हूं ..चल लड़कों के फोटो वोटो खींच और फूट ले .और सुन ..स्टोरी में कुछ ऐसा वैसा नही होना समझा …. पप्पू ..इन साहब को बस में बिठा कर आने का, क्या समझा

पत्रकार अलग अलग एंगल से कुछ फोटो खींचता है ..कैमरे के क्लिक की आवाजें

दृश्य परिवर्तन ध्वनि ………

नेपथ्य से पुरुष स्वर - गणतंत्र दिवस की परेड में जब हाथी पर सवार वीर बच्चो को गणतंत्र दिवस की परेड में घुमाया जा रहा होगा , तब भी सैकड़ों छोटे-छोटे बच्चे हाथो में हथियार थामे जंगलों में नक्सलवाद की नर्सरी में आतंक का पाठ पढ़ रहे होगे .. आज झारखंड, छत्तीसगढ़ , पश्चिम बंगाल,बिहार के कई ज़िलों में आधे से अधिक नक्सली ऐसे हैं, जिनकी उम्र 16 साल से कम है. शुरुवाती दौर में नक्सली संगठनों द्वारा इन बच्चों का इस्तेमाल केवल सूचना के आदान-प्रदान के लिए किया जाता था. कथित खुली सभा या जन अदालत में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने का काम बच्चे करते थे.लेकिन अब दृश्य बदला हुआ है. नक्सली संगठनों द्वारा इन दिनों बच्चों को हथियार चलाने और बारूदी सुरंग बिछाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.नक्सली दस्ते में शामिल अधिकांश बच्चे दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के हैं.कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके परिवार वाले पुलिस या भूपतियों की सेना के हाथों मारे गए और जिनके पास लौटने के लिए कोई घर ही नहीं है .

.दृश्य परिवर्तन ध्वनि

अखबार का हाकर - आज की ताजा खबर …नक्सली कैम्प से होकर लौटा पत्रकार ..आंखों देखी रपट …छोटे छोटे बच्चे बन रहे हैं नक्सलवसदी ..”सलवा जुडुम एक विफल प्रयोग” आज की ताजा खबर ..

शालिनी - दादा जी मुझे नक्सल समस्या पर कालेज में निबंध लिखना है ..यह अखबार खरीद लीजिये .

बुजुर्ग व्यक्ति- अरे भाई एक अखबार देना , ये लो दो रुपये , का ही है ना !

अखबार का हाकर

हाँ जी पूरे दो रुपये का ही है , ये लीजीये

बुजुर्ग व्यक्ति - शालिनी बेटा , यही तो विडम्बना है . नक्सलवाद पर कालेजों में निबंध लिखवाये जा रहे हैं .. अखबारो में खूब चर्चायें हो रही हैं ..टीवी चैनल्स में बहस की जा रही है ,ब्यूरोक्रेसी नक्सलियो के खिलाफ पुलिस की सारी ताकत झोक रही है पर जिन लोगो को जमीनी कदम उठाकर समस्या मिटा देनी चाहिये वे कुछ नही कर रहे .

शालिनी - अखबार के पन्ने फड़फड़ाने की ध्वनि , जोर से पढ़ती है .
.नक्सलवाद् और आतंकवाद में कोई अंतर नहीं।… नक्सल संगठनों ने बिल्कुल निचले स्तर से अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं। सबसे पहले आदिवासियों को बिचौलियों और तेंदू पत्ता के ठेकेदारों के खिलाफ एकजुट किया गया। जमीनी स्तर पर यह आंदोलन शुरू हुआ, इसलिए सरकार के लिए आज यह एक बड़ी चुनौती बन चुका है । सरकारी व्यवस्था की कमजोरी और पुलिस के पंगु होने का ही नतीजा है कि नक्सलवाद का प्रसार तेजी से हो रहा है।बच्चो की नई पीढ़ी की पीढ़ी नक्सलवादी बनने को विवश है ..

राजू - दादा जी वास्तव में ये नक्सलवाद है क्या ?

बुजुर्ग व्यक्ति - नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के विघटन स्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुआ , जहाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजुमदार और कानू सान्याल ने १९६७ में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये तत्कालीन सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार थीं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और परिणाम स्वरुप कृषितंत्र पर दबदबा हो गया है; और यह सिर्फ़ सशस्त्र क्रांति से ही खत्म किया जा सकता है। “नक्सलवादियों” ने कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से अलग हो गये और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी।

शालिनी - मतलब आजाद भारत में भी आर्थिक आजादी के लिये लड़ाई ..

बुजुर्ग व्यक्ति - हां पर , मजूमदार की मृत्यु के बाद इस आंदोलन की बहुत सी शाखाएँ हो गयीं और आपस में प्रतिद्वंदिता भी करने लगीं।समय के साथ इन गुटो की सैद्धांतिक लड़ाई ने अपना वजूद खो दिया और अब यह विक्षिप्त मानसिकता के लोगों द्वारा संचालित वर्गगत आतंक का रूप धारण कर चुका है ,लगभग वैसे ही जैसे कि विक्षिप्त किस्म के बुद्धिजीवियों द्वारा धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न जातिगत आतंकवाद का प्रसार देश के विभिन्न अंचलों में लगातार बढ रहा है.

राजू - यह तो सामाजिक और राजनैतिक जागरूखता का विषय है !

बुजुर्ग व्यक्ति - हमारे राजनीतिज्ञों को आतंक के कारणो और समाधान की कोई चिंता नहीं। चिंता है वोट की। मनुष्य को और मनुष्यता को सभी धर्मों ने या कथित विकृत नक्सलवाद ने मिलकर मार डाला है। राजनीतिज्ञ व्यक्ति वोट के लिये धर्म का उपयोग करना अच्छी तरह जानता है और कट्टपंथी लोग भी राजनीतिज्ञों का उपयोग करना सीख गए हैं। नक्सलवादी भी निहित स्वार्थो के लिये राजनीति का दुरुपयोग कर रहे हैं . धर्म का विकास लोगों को कबीलो से बाहर निकालकर सभ्य बनाने के लिए हुआ था लेकिन हालात यह है कि इसी धर्म या वर्ग के नाम पर हम असभ्यता की पराकाष्ठा तक पहुंचने को तत्पर है।

शालिनी - और दादा जी , क्या है यह “सलवा जुडुम ”

बुजुर्ग व्यक्ति - सलवा जुडुम नक्सलवादी आतंक के विरोध में बस्तर के आदिवासियो की एकता के आंदोलन का नाम है, ये और बात है कि यह प्रयोग अब तक विफल ही रहा है . नक्सलवाद से तिहाई भारत प्रभावित है लेकिन बस्तर के आदिवासियो को छोड कर किसी और प्रांत के लोग इन नक्सली आतंकवादियों के खिलाफ कहीं भी और किसी भी तरह अब तक लामबंद नहीं हुए .

राजू- दादा जी प्रश्न है कि बस्तर के लोगो ने तो नक्सलवादियों को बुलाया नहीं .फिर ये क्यो और किस तरह यहां आये ? ..

बुजुर्ग व्यक्ति - बिल्कुल ठीक कह रहे हो बेटा , बस्तर की कराह यहाँ के आम आदमी से सुन कर देखो. यहां के सुकारू -बोदी- बुदरू…. अपनी लडाई खुद लडना जानते हैं उन्हे लाल-पीली सोच वाले लोगों की न तो सहानुभुति चाहिये न ही बंदूके। जिस लोकशाही की परिकल्पना हमारा संविधान करता है आज इस अंचल में कहीं भी दृष्टिगोचर नही होती ? दारू पिलाओ , कपडा बाँटो और वोट लो, इसी सच पर आज इस अंचल का जनप्रतिनिधित्व टिका है . कोई राजनीतिज्ञ ऐसा नही दिखता जो जनमानस की आत्मा में बसता हो. नक्सलवादी समस्या के बस्तर में प्रारंभ और लगातार पनपते रहने का कारण सरकारी नीतियों की विफलता और सच्चे जन प्रतिनिधित्व का अभाव है ?

राजू - क्या ऐसे आदर्श जनप्रतिनिधि हो भी सकते हैं दादा जी जो जनता के लिये ही जियें , अपने स्वार्थो के लिये , घर भरने के लिये नहीं ?

बुजुर्ग व्यक्ति - क्यो नही ? महात्मा गांधी क्यो और कैसे बापू बने थे ?अच्छा चलो अब घर लौटे अंधेरा हो रहा है

दृश्य परिवर्तन ध्वनि

रेडियो पर गाने की आवाज

ओय होय होय ओय होय होय

सईयाँ छैड़ देवै, ननद जी चुटकी लेवै
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवै, देवर समझा
ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का आँगन भावे डेरा पिया का होऽऽऽ
सास गारी देवै, देवर समझा लेवै
ससुराल गेंदाफूल
सईयाँ है व्यापारी, चले हैं परदेस,
सुरतिया निहारूँ, जियरा भारी होवे
ससुराल गेंदा फूल

ये आकाशवाणी है अब आप विनोद कश्यप से समाचार सुनिये ….

.”झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम से गोइलकेरा थानाक्षेत्र के सारूगढ़ा घाटी में सारंडा के जंगलों में नक्सलवादियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट किया, जिसमें थानाप्रभारी, सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर समेत 11 जवान शहीद हो गये। दूसरी ओर, छत्तीसगढ के बीजापुर स्थित गंगालूर इलाके के कोरचूली में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के असिस्टेंड कमांडेंट रामपाल सिंह मारे गये जबकि 5 जवान शहीद हो गये। इसके दूसरे ही दिन 11 जून को माओवादियों ने छत्तीसगढ के ही दूसरे हिस्से धमतरी जिले में घात लगाये नक्सलियों ने पुलिस बल के 15 जवान को गोलियों से भून दिया। सुरंगी विस्फोट में १८ निर्दोष ग्रामीणो की मौत हो जाने का समाचार मिला है …..”

राजू - दादा जी ..मेरे दोस्त तो कहते है कि नेता जी चाहते ही हैं कि नक्सली यहां बने रहे ,जिससे वे अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदितो को इनकाउंटर के नाम पर मरवा सकें ..पुनर्वास के नाम पर ढ़ेर सा बजट मिले . वे तो बेरोजगार लड़को से कहते है ..अरे कोई रोजगार न मिले तो नक्सली बन जाओ ..

बुजुर्ग व्यक्ति - यही तो रोना है बेटा जब तक नेतृत्व सक्षम नही होगा और हममें इच्छाशक्ति नही होगी तब तक होती रहेंगी ये बेवजह हत्यायें ..क्यो जनप्रतिनिधि नहीं सुलझाते है मूल समस्या शायद तुम ठीक ही बता रहे हो ..

शालिनी

क्या नक्सलवाद इस शासकीय विफलता के विरोध की क्रांति है ?

बुजुर्ग व्यक्ति “क्रांति वह होती है बेटा ! जो भीतर से पनपती है, क्रांति प्रायोजित नहीं अपितु स्वत:स्फूर्त होती है। क्रांति बाहरी नहीं होती न ही विचारधारा का इश्तेहार ले कर उपजती है । क्रांति एक घटना है जिसकी चिंगारी भीतर ही सुलगती है और फिर ऐसा दावानल हो जाती है जो बदल देती है एक पूरी की पूरी व्यवस्था। क्रांति नारों से नहीं आती, बल्कि क्रांति के दौरान नारे पैदा होते हैं। क्रांति किसी लाल-पीले झंडे की छाया में नहीं होती क्रांति गुजरती है तब उसपर गीत बनते है, रंग भरे जाते हैं और उसे पहचान दी जाती है।

शालिनी

आप सत्य कह रहे हैं , किंतु यह आदिवासी समाज ऐसे ही तो नक्सलियों के प्रभाव में नहीं आया होगा ? आखिर क्या है नक्सलवादी मनोविज्ञान?

बुजुर्ग व्यक्ति

निश्चित ही प्रशासनिक विफलताये भी कारण है नक्सलवाद का …एक कारण यह भी है कि इतना बड़ा भौगोलोक क्षेत्र इन , उन कारणो से उपेक्षित होता गया। फिर भी आतंकवाद को कैसे क्रांति का मुलम्मा चढा कर महिमामंडित किया जा सकता है? आज क्या हालात है ? जो पिस रहा है वह यह गरीब अंचल है और वहाँ के निरीह मुरिया-माडिया ही तो हैं ?

शालिनी

आप क्या यह नहीं मानते कि इन आदिमों को अपनी आवाज उठानी नहीं आती और एक तरह से नक्सली इनकी सहायता ही कर रहे हैं, शोषण के खिलाफ उनके संघर्ष में?

बुजुर्ग

इन आदिवासियों को किसी आयातित सिद्धांतों या कि संघर्षकर्ताओं की आवश्यकता नहीं है, इनके ही भीतर ऐसी आग है जो प्रलयंकारी है . यदि नक्सलवाद स्वाभाविक होता तो किसी बंगाली, किसी तेलुगु ..लाल-आतंकी के कंधे पर चढ कर नहीं बल्कि किसी आदिवासी के वाणों की नोंक से आरंभ होता। इसका जवाब उन कथित बुद्धिजीवियो के पास भी नहीं है जो इन आदिवासियों को दिग्भ्रमित करने वाले नक्सलियों के महिमामंडन में मानवाधिकार की कहानियाँ गढते हैं।

शालिनी

हां , इन दिनो नक्सलवाद के पक्ष विपक्ष में मानव अधिकारो पर बहुत चर्चायें होती है .

आप क्या सोचते है ? आखिर नक्सलवाद की समाप्ति कैसे होगी ?

बुजुर्ग

नेतृत्व विहीन जनता को दिग्भ्रमित कर, फुसला कर ,उन्हें दिवा स्वप्न दिखलाकर नक्सल आतंकवादी बनाया जा रहा है ..यह ठीक नही है , सही नही है …नक्सल प्रभावित क्षेत्रो के लोगो का संघर्ष, क्षेत्र विशेष का संघर्ष है अपने ही देश की सरकार से अपने छोटे मोटे अधिकारो के लिये , थोड़ी सी स्वायत्ता चाहने का संघर्ष है ..उन्हें उनके दिलो पर राज करने वाला उनकी सुनने और मानने वाला जन प्रतिनिधित्व चाहिये .. नक्सलवाद के नाम पर गुमराह कर आतंक फैलाने वाले मकड़जाल से उन्हे , उनका ..उनके लिये , उनके ही द्वारा चलाये जाने वाला सुशासन ही बचा सकता है ..आदिवासियो को उनके जमीनी अधिकार दे दिये जाये ..इसी तरह उन्हें नक्सलवादियो से विमुख कर देश की मूल धारा में मिलाया जा सकता है .. और जब यहां के मूल निवासी ही बाहरी नक्सलवादियों से विमुख हो जायेंगे तो स्वतः ही ये बाहर से आने वाले मुट्ठी भर नक्सली बिना शर्त आत्म समर्पण करने पर विवश हो जायेंगे ..उन्हें भी क्षमा दान दे दिया जाये .. और रोजगार देकर समाज का हिस्सा बना कर उनकी उर्जा का रचनात्मक उपयोग हो ..इसी तरह अंत हो सकेगा नक्सली आंदोलन .

गायक दल

पूरा प्रतिदान मिले मेहनत का ,

ना अब कोई बने नक्सली

फल का सबको सम भाग मिले ,

फिर कोई क्यो बने नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

सब तक पहुंचे किरणें विकास की ,

हो न कोई गुमनाम नक्सली

सब हों शिक्षित , सब को अवसर ,

और न हों बदनाम नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

जंगल के जज्बात पुकारें,

बैठ करो अब बात नक्सली

आतंकी बनने से बेहतर ,

पढ़ें प्रेम का पाठ नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

सब को मानव अधिकार मिलें ,

सच सपनो का संसार मिले

जब सब का ही ध्येय वही है ,

तो फिर क्यो हो घात नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

हिंसा से सुलझें न समस्या,

समझें अब यह बात नक्सली

अप्रासंगिक नक्सलवाद हो ,

खत्म होये अब रात नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

…(

स्वरचित)

पुरुष स्वर

नक्सलवाद विचार और चिंतन शून्य है । यह देश के बहुसंख्यक सर्वहारा जन के अमन

-चैन, समृद्धि और सुख की विरोधी विचारधारा है ।यह एक भटका हुआ आंदोलन है । अतिवाद का एक धूर्त तरीका है । यह अधैर्य की उपज है । जिसके मूल में हिंसा है .यह जन के लुटे हुए सत्व के लिए नहीं अपितु हितनिष्ट ताकतों की राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र है, नक्सलवाद को वस्तुतः जनता के कल्याण से कोई वास्ता नहीं है ।

स्त्री स्वर

नक्सलवाद से जूझती झारखण्ड

,बिहार ,उड़ीसा ,छत्तीसगढ़ ,बंगाल ,आंध्रप्रदेश सरकारों को केंद्र और हमारे जन समर्थन की जरुरत है । विकास के लिए आरक्षित धनराशि का एक बड़ा हिस्सा पुलिस और सैन्य व्यवस्था के नाम पर व्यय हो रहा है जो अनुत्पादक है । इससे तरह-तरह का भ्रष्ट्राचार भी पनप रहा है ।

शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर छिपा कर हम कथित बुद्धिजीवी अब और चुप नही रह सकते ..हमें नक्सलवाद के विरुद्ध खुलकर सामने आना ही होगा .पहले नक्सल प्रभावित पिछड़े लोगो को समाज मे समाहित कर उन्हें नक्सलवादियो से विमुख करना होगा ..और साथ साथ नक्सलवादियो को भी क्षमा दान देकर, देश की मूल धारा में मिलाकर ही नक्सलवाद का अंत किया जा सकता है …

पुरुष स्वर

आइये कामना करे कि देश से जल्दी से जल्दी नक्सलवाद का पूर्ण रूपेण अंत हो

. नक्सली हिंसा के शिकार लोगो को यही हमारी पीढ़ी की सच्ची श्रद्धांजली होगी .



नक्सलवादी”

…. समाप्त

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