पात्र परिचय

आनंद.......... पांच छह वर्षीय एक बच्चा

रमेश बाबू.............पिता

लता........... मां

अतिरिक्त बच्चा

अतिरिक्त बच्चा

पुलिस इंस्पेक्टर

प्रिंसीपल मैडम

काउंसलर मैडम

मि. शर्मा सर.....चाचा नेहरू की भूमिका में

पांच फूल के रूप में बच्चे

सूरजमुखी

गुलाब

गेंदा

चांदनी

डहेलिया

सूत्रधार - ये जो फूल सदा मुस्काते थे, हंसते औ खिलखिलाते थे।

पर क्या हुआ इनके रंगों को, क्यों अब ये मुरझाते हैं।।

कहां खो गए इनके सुंदर रंग, कहां खो गई मासूमियत।

मिलके दूर करें मुरझाहटें, प्यार से सींच फिर खिलाते हैं।।


प्रस्तुत है लघुनाटिका जिसमें फूलों को बच्चों के रूप में प्रस्तुत कर इनका मानवीकरण किया गया है। अनेक सामाजिक बुराइयों के गर्त में फंसे बच्चों की पीड़ा को फूलों की बदरंगीनी और कुम्हलाहट के रूप में प्रस्तुत किया गया है और सामाजिक संवेदनशीलता के अंतर्गत सामूहिक प्रयासों के द्वारा उनकी पीड़ा और परेशानी को दूर करने के साथ पुनर्जीवित करने और पुनर्वास का संदेश देते हुए उन्हें फिर से सजाया, संवारा और महकाया गया है।

प्रथम दृश्य........ खिड़की के पार्क दिखता हुआ

प्रातः काल, घर के एक कमरे में आनंद के पिता रमेश बाबू लैपटॉप पर काम कर रहे हैं, मां लता बैठी सब्जी काट रही हैं

तभी आनंद अंदर आता है........

आनंद - (मनुहार करते हुए) पापा! चलो, हम लोग बाहर पार्क में चलते हैं। वहां हम दोनों खेलेंगे और खूब सारी मस्ती करेंगे। चलो न पापा!


रमेश बाबू - अभी नहीं बेटा! अभी तो मैं ऑफिस के काम में व्यस्त हूं। तुम अपनी मम्मी के साथ खेलो।

आनंद - नहीं पापा! आज मैं आपके ही जाऊंगा। कितने दिनों से आप मेरे साथ बाहर नहीं गए हैं! (मां के प्रति) मम्मा! बोलो न पापा को!

लता - चले जाओ न उसके साथ! वैसे भी आज रविवार है। आपके ऑफिस की छुट्टी है। सुबह सुबह खुली हवा में घूमना और सुबह का उगता सूरज देखना तन और मन दोनों के लिए ही अच्छा होता है। और फिर, काम तो बाद में भी किया जा सकता है। चले जाओ न, प्लीज़!

रमेश बाबू - ठीक है, तुम इतना ज़ोर दे रही हो तो ले जाता हूं इसे पार्क में।

(आनंद के प्रति) चलो बेटा!

दोनों चले जाते हैं.......

द्वितीय दृश्य........ हरे भरे पार्क में सूर्योदय का दृश्य।

आनंद - पापा! देखो, कितना अच्छा लग रहा है यहां! और यह गुनगुनी सी धूप और भी अच्छी लग रही है।

रमेश बाबू - हां, बेटा! यही धूप तो हमारे शरीर को विटामिन डी देती है। हमें चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ बनाती है।

आनंद - (पीछे देखते हुए) पापा! देखो, इधर देखो, क्या हुआ इन फूलों को? इनके रंग कैसे उड़े-उड़े से हो गए हैं! क्या माली काका इनकी देखभाल नहीं करते?

रमेश बाबू - हां, मुझे भी ये फूल बड़े मुरझाए-मुरझाए से लग रहे हैं। बेटा! मैं काफी लंबे समय बाद यहां आया हूं। चलो, फूलों से ही पूछते हैं।

(पार्क में मुरझाए और कुम्हलाए से खड़े फूल आगे आकर एक साथ गाते हैं।)

सभी फूल -

हम बच्चे दिल के सच्चे हैं

हम चाहें आशा के मोती।

हमें चाहिए लाड़ प्यार बस

नहीं चाहिए आंखें रोतीं।।

हमने भोगे हैं काले दिन

देखीं काली रातें होतीं।

कब चमकेगा भाग्य का सूरज

कब आएंगीं रातें सोतीं।।........

( गाना गाकर सभी फूल यथास्थान पीछे चले जाते हैं।)

रमेश बाबू - हैलो, सूरजमुखी! क्या हुआ है तुम्हें? क्यों ऐसे बेरंग और बदरंग हो गए हो?

सूरजमुखी - (सुबकते हुए) क्या करूं, अंकल! मेरे मम्मी-पापा जॉब के लिए घर से बाहर जाते हैं और मैं स्कूल में पढ़ने जाता हूं। स्कूल में तो....... पढ़ाई, पढ़ाई, बस पढ़ाई! फिर मैं घर में अकेला रह जाता हूं। मुझे न बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। घर में अकेलापन बहुत बुरा लगता है। और, और....... आज तो मुझे बुखार भी है।

रमेश बाबू - तुम ठीक से खाते-पीते हो भी या नहीं?

आनंद - तुम्हारी मम्मी टिफिन बनाकर तो देती हैं? नहीं खाते क्या?

सूरजमुखी - अच्छा ही नहीं लगता। घर वापस जाकर खाना डस्टबिन में डाल देता हूं। रात में मम्मी-पापा आते हैं तब तक मैं सो जाता हूं।

रमेश बाबू - यह तो गलत है, बेटा! ठीक से खाए-पीए बिना आप कैसे बड़े होंगे? स्ट्रौंग नहीं बनना क्या?

(सूरजमुखी मुंह लटकाए खड़ा रहता है।)

आनंद - (गुलाब के फूल को देखते हुए) पापा! इधर देखो। यह गुलाब भी सूख रहा है।

रमेश बाबू - हां देख रहा हूं। (गुलाब से) क्या हुआ तुम्हें, गुलाब बेटा?

गुलाब - (रोते हुए) अंकल........!

रमेश बाबू - (सिर पर हाथ फेरते हुए) रोओ मत, बेटा! बताओ तुम्हें क्या परेशानी है?

गुलाब - अंकल! मेरे मां-बाप तो बहुत पहले ही मर गए थे। वो....... वो सामने वाली चाय-नाश्ते की दुकान है न, मैं वहीं कप-प्लेट धोता हूं। पर.......

रमेश बाबू - पर क्या? बताओ। डरो मत। हम तुम्हारी सहायता करेंगे।

गुलाब - वो-वो, अंकल! मेरे मालिक हैं न, वो मुझे ठीक से खाना भी नहीं देते। बहुत डांटते हैं। मारते भी हैं। (आसमान की ओर इशारा करते हुए) मैं तो न, अब अपने मां-बाप के पास जाना चाहता हूं। (फिर से रोने लगता है।)

रमेश बाबू - बेटा रोओ मत। मैंने कहा न, हम कुछ करते हैं।

आनंद - (आगे बढ़ते हुए) पापा-पापा! इसे देखो। यह गेंदा, क्या कर रहा है?

(विक्षिप्त गेंदा अपनी पंखुड़ियां तोड़ते हुए कुछ-कुछ बुदबुदा रहा है। तभी एक बच्चा अपने दो दोस्त के साथ दौड़ता आता है। गेंदे के फूल पर कंकड़ फेंकता है। दोनों दोस्त ताली बजाते हैं और उसे चिढ़ाते हैं।)

पहला लड़का- (गेंदे को छेड़ते हुए) पागल, पागल, हे, हे, हे, हे, पागल।

दूसरा लड़का - अरे- देखो, इसके कपड़े। इसके बाल देखो। इसकी खाल देखो।

(दोनों लड़के गेंदे को गोल-गोल घुमाते हुए चिल्लाकर कोरस में गाते हैं)

इसके बाल देखो, इसकी खाल देखो, इसकी चाल देखो।

इसके बाल देखो, इसकी खाल देखो, इसकी चाल देखो।।

गेंदा - (उनसे दूर छिटककर चीखते हुए) ओ खंभे! देख-देख,

इन सबको, ये कैसे पगला गए हैं। देख रहा है न, तू! सच्ची में, ये सब पागल हैं। और मुझे पागल कहते हैं। मैं, न........ मैं, न, पुलिस अंकल से करूंगा इनकी शिकायत। तब पड़ेंगे इन पर डंडे। (हंसता है) आया समझ में? पागलो! मेरी तुमसे कट्टी। पुलिस अंकल, पुलिस अंकल।

पुलिस इंस्पेक्टर - (वहाँ पहुँचकर) अरे, अरे, तुम सब ये क्या कर रहे हो? क्यों इस मासूम को सता रहे हो? चलो भागो यहाँ से।

गेंदा - (जोर से बोलता है ) देखा, आया न मजा। डाँट पड़ी पुलिस अंकल से।

रमेश बाबू - देखा, आनंद! कितना गलत कर रहे थे ये लड़के। अरे, भगवान ने हमें भी बनाया है और इसे भी। बेचारा पता नहीं किन परिस्थितियों का मारा होगा। कौन जाने इसके माँ-बाप हैं भी कि नहीं।

आनंद - हाँ पापा, मुझे भी इस पर तरस आ रहा था। लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं! ( फिर आगे बढ़कर ) पापा, पापा इसे देखो यह तो चांदनी है ना।

रमेश बाबू - हाँ इसे मधुयामिनी भी कहते हैं। पर यह भी मुरझा गई है।

आनंद - पापा इससे भी पूछिए कि क्या हुआ इसे।

रमेश बाबू - बेटी चांदनी, क्या हुआ। तुम इतनी कुम्हलाई सी क्यों हो?

चांदनी - (सुबकते हुए ) कुछ नहीं अंकल, कुछ नहीं, क्या करेंगे आप मेरे बारे में जानकर।

रमेश बाबू - नहीं बेटी, ( धीरज दिलाते हुए) बताओ ना हमें कुछ।

चांदनी - अंकल जब मैं छोटी थी ना, तब अपने गाँव में सहेलिओं के साथ खेलती थी। एक बार कुछ लोगों ने चाकलेट खिलाने के बहाने मेरा अपहरण कर लिया और मुझे बेहोश करके यहाँ शहर में ले आए। फिर मुझे भिखारियों के बड़े मास्टर के हाथों बेच दिया।

रमेश बाबू - फिर .........

चांदनी - बड़े मास्टर ने मुझे इतना मारा कि मेरी एक आँख ही खराब हो गई। तभी से मुझसे भीख मंगवाते हैं। पैसे कम मिलने पर पिटाई करते हैं।

रमेश बाबू - तुम्हारे साथ तो बड़ा ही अत्याचार हुआ है। मैं कुछ करता हूँ। ठीक है तुम परेशान न हो।

आनंद - ( आगे बढ़ते हुए) पापा, अरे पापा, ये तो डहेलिया है ना, यह भी तो मुरझा गया है।

रमेश बाबू - अरे बेटा डहेलिया। बताओ तुम इतने मायूस क्यों हो?

डहेलिया - ( रोते हुए) अंकल, मेरी माँ अपनी माँ नहीं हैं। मेरी माँ तो बहुत साल पहले ही मर गईं थीं। अब मेरी सौतेली माँ मुझे बहुत मारती है। ढेर सारा काम करवाती है। मुझे पढ़ना लिखना पसंद है लेकिन वह मुझे स्कूल पढ़ने जाने नहीं देती है। मेरी किताबें फाड़कर चूल्हे में जला देती है।

आनंद - तुम्हारे पाप उसको कुछ नहीं कहते क्या?

डहेलिया - वह जब भी मेरा पक्ष लेते हैं तो उनसे झगड़ा करती है। अब तो पापा भी उससे डरते हैं। मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? समझ में नहीं आता।

मैं तो बड़ा होकर पढ़लिखकर अपने जैसे दुखी और परेशान बच्चों के लिए हॉस्टल वाला स्कूल बनवाना चाहता हूँ। पर लगता है मेरी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। ( रोता है)

रमेश बाबू - तुम रोओ मत। ईश्वर तुम्हारे इस नेक इरादे को पूरा करने में जरूर मदद करेगा। ( सांत्वना देता है।)

आनंद - पापा! क्यों न हम इन सबको मेरे स्कूल में ले चलें। प्रिंसीपल सर बहुत ही अच्छे हैं। जरूर कोई न कोई उपाय बताएंगे।

रमेश बाबू - हाँ आनंद, तुम सही कह रहे हो।

( फूलों के प्रति) देखो तुम आज शाम चार बजे तैयार रहना। हम लोग आनंद के स्कूल चलेंगे। ठीक है।

( सभी फूल मायूसी से गर्दन हिलाकर हाँ करते हैं।)

तीसरा दृश्य

स्कूल ऑफिस में प्रिंसीपल, काउंसलर मैडम, आनंद, रमेश बाबू और सभी फूल उपस्थित हैं। प्रिंसीपल, काउंसलर मैडम, आनंद, रमेश बाबू बातें कर रहे हैं।

( सभी फूल बच्चों से।) पता है आज कौन सा दिन है?

( सभी फूल सिर झुकाए बैठे हैं।)

आनंद - सर, रविवार।

प्रिंसीपल - बच्चो! आज 14 नवंबर यानी हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिवस है।

क्यों आनंद भूल गए। कल ही तो हमने बाल दिवस मनाया था अपने स्कूल में।

आनंद - सॉरी सर! आज रविवार की छुट्टी के कारण भूल गया था।

प्रिंसीपल - पता है, पं. नेहरू को बच्चों और फूलों वो भी गुलाब के फूलों से बड़ा प्यार था। वे बच्चों को पत्र भेजते थे, उपहार भेजते थे। एक बार तो उन्होंने जापान के बच्चों के लिए सफेद हाथी भेजा था। ( सभी बच्चे आश्चर्य से सुनते हैं।)

वे अपना जन्मदिन बच्चों के साथ मनाते थे। इसीलिए इस दिन को बालदिवस कहा जाता है और मनाया जाता है।

आज उन्हें सभी केवल फोटो में ही देख सकते हैं।

( आनंद से) याद है आनंद, कल चाचा नेहरू कौन से सर बने थे, हमारे स्कूल के प्रोग्राम में?

आनंद - हाँ सर, वो शर्मा सरजी।

प्रिंसीपल - ( फोन पर शर्मा सर से) अरे सर! आप जल्दी से कल वाले चाचा नेहरू के गैट-अप में मेरे ऑफिस में आ जाइए। बहुत जरूरी है।

काउंसलर मैडम - बच्चो! तुम लोग फूलों जैसे नाजुक, मासूम और बहुत ही प्यारे हो। जो बच्चे समझदार माता पिता के साथ परिवारों में रहते हैं वे ही सुरक्षित और अनमोल बचपन का आनंद ले पाते हैं। वर्ना समाज में इतनी बुराइयाँ पनपी हुई हैं कि कभी भी आप जैसे मासूमों को अपने जाल में फंसा लेती हैं और शिकार बना लेती हैं।

हमें समाज में जिम्मेदार और समझदार लोगों के साथ मिलकर आप जैसे दुखी और शोषित बच्चों के लिए कुछ व्यवस्था करनी चाहिए।

हमारे स्कूल में ऐसे ही बच्चों के लिए अलग से हॉस्टल है जहाँ उन्हें पढ़ा लिखा कर योग्य नागरिक बनाने का प्रयास किया जाता है।

प्रिंसीपल - तो फूलों जैसे प्यारे बच्चो! क्या आप वहाँ रहना चाहेंगे।

( बच्चे एक दूसरे की शक्लें देखते हैं। सहमे हुए दिखते हैं।)

काउंसलर - डरो नहीं। तुम्हें कोई परेशान करने वहाँ नहीं आएगा। हम कानूनी प्रक्रिया पूरी करके ही आपको वहाँ भर्ती करेंगे। बोलो।

( सभी बच्चे खुशी से चहकते हुए एक साथ कहते हैं) हाँ।

आनंद सभी के साथ ताली बजाने आगे बढता है। कहता है - दे ताली।

( तभी शर्मा सर - चाचा नेहरू का प्रवेश होता है।)

चाचा नेहरू - मुझे पता था, प्यारे प्यारे बच्चे मुझे यहाँ मिलेंगे। मैं आप सभी के लिए उपहार लाया हूँ। ( चाचा नेहरू उपहार देकर बच्चों के सिर पर हाथ फिराते हैं। सभी फूल फिर से चमकीले हो जाते हैं और उनके रंग निखर कर खुशी में मिल जाते हैं।)

रमेश बाबू - ( खुशी के आंसू पोंछकर प्रिंसीपल, काउंसलर और चाचा नेहरू के प्रति) धन्यवाद प्रिंसीपल साहब, धन्यवाद काउंसलर मैडम और शर्मा सर आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद। आज हमने मिलजुलकर इन फूलों को फिर से नया रंग देकर महका दिया।

( सभी फूल नए कलेवर में नृत्य करते हुए झूमते हैं।)

सभी ( कोरस) -

अब ये फूल न मुरझाएं, मीठे गीत तराने गाएं

हम शामिल इनकी खुशियों में, फिर से इन्हें खिलाएं।


इनका बचपन सम्हलाएं, इनका जीवन महकाएं

हम शामिल इनकी खुशियों में, फिर से इन्हें खिलाएं।




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