कमरे में घुसते ही वह तपाक से मुझसे लिपट गयी और ताबड़तोड़ उसने मेरी गालों पर, होठों पर, माथे पर बोसे जड़ दिए। करीब दस -बारह बरस बाद हम मिल रहे थे। मैं उसके शहर में था और एक छोटे से होटल में ठहरा था। बावजूद इसके कि बढ़ती उम्र के निशान उसके चेहरे और बालों से झलक रहे थे, अभी भी वह सुन्दर थी।

मैंने दरवाजा बंद किया, उसे कन्धों से पकड़ कर उसका माथा चूमा और बैड पर बिठा दिया। खुद उसके सामने कुर्सी खींच कर बैठ गया।

"मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम मेरे एक फोन पर दौड़ी चली आओगी ?" मैंने उसके दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर कहा।

वह मुस्करा दी। उसने बैठे बैठे बैड पर पीठ के बल लेटते हुए मुझे अपने ऊपर खींच लिया। वर्षों पहले वाली देहगंघ मुझे उसके बदन से फूटती महसूस हुई और देखते ही देखते मुझे पागल कर गयी। अब मैं होश में नहीं था। मेरी और उसकी सांसों में होड़ लग गयी। हम पसीने पसीने हो गए। जब शांत हुए तो वह सिमट कर बैड के एक कोने में बैठ गयी और मुझे एकटक निहारने लगी।

"तुम तो सीनियर सिटीजन लगते ही नहीं। रिटायर होने के बाद और स्मार्ट हो गये।" उसने एकाएक हँसते हुए कहा और दायां हाथ बढ़ाकर मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने लगी।

मुझे पुराने दिन याद हो आये। वह ऐसे ही किया करती थी।

वह मेरे करीब खिसक आयी। उसने अपने होंठ गोल किये और आँखें फैला लीं। मुझे लगा, वह कुछ कहना चाहती है।

"मुझे कुछ पैसों की ज़रूरत है। बड़ी परेशानी में हूँ।"

"किस परेशानी में हो ?" मैंने उसके चेहरे पर आँखें गड़ा कर पूछा।

"बहुत सारी परेशानियां हैं। एक हो तो बताऊँ।"

"फिर भी।" मेरी नज़र अभी भी उसके चेहरे पर गड़ी थी।

"तुम्हें नहीं मालूम, मैं अपने पति से अलग रहती हूँ, अकेली, अपनी दो बेटियों के साथ। पांच साल से ऊपर हो गए डिवोर्स को।"

"क्यों ?" मैं पूछना चाहता था, पर यह 'क्यों' मेरे मुंह की बजाय मेरी आँखों में लटक गया जिसे उसने आसानी से पढ़ लिया।

"नरक बना कर रख दी थी उसने मेरी ज़िन्दगी ?" और वह ढुसकने लगी। आवाज़ भर्रा गयी।
मैं बैड पर से उठा और कुर्सी पर उसके ठीक सामने बैठ गया।

उसने अपनी नम आँखें रुमाल से पौंछते हुआ खरखराती आवाज़ में कहा, "तुम्हारा फोन आया तो मुझे कुछ उम्मीद बंधी। बड़ी उम्मीद लगाकर...।" आगे के शब्द उसके गले में अटक कर रह गये।

मैं कुर्सी पर से उठा। मुझे लगा, वह अपना मेहनताना...

"तुम भी..." मैंने मुँह बिचकाया और अपने बटुए में से कुछ बड़े नोट निकाल उसकी ओर हिकारत से फ़ेंक दिए।

बैड पर बिखरे नोटों को उसने जलती आँखों से देखा, फिर मेरी ओर एकटक देखने लगी। वह बिना नोटों को छुए बैड से उतरी। खड़ी होकर उसने अपने कपड़े सही किए।

"मैंने तुमसे सिर्फ मदद मांगी थी, पर तुमने मुझे वैश्या समझ लिया ?" बहुत धीमी आवाज़ में वह बोली और इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, वह तेजी से दरवाज़ा खोल बाहर निकल गयी।




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