सुबह-सुबह ही किसी ने दरवाजा खटखटाया, इस शोरगुल से मेरी ऑख खुली तब तक पत्नी ने ऑखे तरेरते हुये कहा ’’जाओ फोकट वाले आये हैं, साहित्यकार लगते है उनसे बाहर ही मिल लो, सुबह-सुबह चाय पर चर्चा मैं अपने घर में नही होने दूॅगी‘‘। पत्नी की इस असहनशीलता पर मेरी सहिष्णुता को धक्का लगा मगर मैनें धर्म निरपेक्ष रवैया अपनाते हुये ’’साइलेंस इज गोल्डन‘‘ की नीति का अनुसरण किया और चुप रहना बेहतर समझा। वरना सबेरे-सबेरे मेरे घर के सामाजिक न्याय की एैसी की तैसी हो जाती। मुझे पता था कि ये हमारा विवाह बंधन है, कोई महागठबंधन नहीं जो कि अवसर आने पर बनाया या तोड़ा जा सके। खैर मैं इससे आगे कुछ सोच पाता तब तक दरवाजे पर फिर बहुत तेज दस्तक हुयी, मानो पड़ोसी मुल्क ने परमाणु परीक्षण किया हो। मैनें लपककर दरवाजा खोला तो सामने प्रगतिशील कवि दरबारी लालजी खडे़ थे। उनके साथ और एक सज्जन थे जो कि अकाल पीड़ित प्रांत के विस्थापित लग रहे थे। मगर उनके मुॅह में दबा हुआ सिगार उनके कपड़ों से मेल नहीं खा रहा था। दरबारीलाल ने खींसे निपोरते हुये कहा ‘‘आप कामरेड सुदर्शन जी है, आप त्याग-तपस्या की मिसाल है, आप फलां-फलां......‘‘? मैने उनको देखा उनके सिगार पर नजरें गड़ायी तो वो मेरी मनोदशा को भॉपते हुये बोले ’’भई, ये क्यूबा से आया हुआ हवाना सिगार है। हम पूंजीपति व्यवस्था के घोर विरोधी हैं। इधर की सरकारें अमेरिका की पिट्ठू हैं, हम पूंजीपति व्यवस्था का स्थाई प्रतिरोध दिखाने के लिये से सिगार पीते रहेते है‘‘ तब तक हमारा बेटा सोनू चिल्लाया ’’पापा, बिग टी0वी0 का रिचार्ज खत्म हो गया है। टी0वी0 बन्द है‘‘। सुदर्शन जी चहकते हुये बोले ’’अरे आप के यहॉ भी बिग टी0वी0 है। पूॅजीपति व्यवस्था का प्रतीक। हमने तो डिश टी0वी0 लगवाया है जो कि स्वदेशी है। मैं चक्कर में पड़ गया। ये सुबह-सवेरे स्वदेशी-विदेशी, बुर्जुआ-सर्वहारा की चर्चा का अखाड़ा मेरा घर क्यों बन गया। मैने डरते-डरते उनसे पूछा ‘‘कामरेड आप चाय पीते है’’? उन्होने कहा ‘‘हॉ ठीक है, मैं चाय पी लूंगा। चाय भारत में चीन से आया है। जो कि पूंजीपति अमरीका का विरोधी है’’। दरबारी लाल जी तब तक मोर्चा संभाल चुके थे, उन्होने कहा ’’देखिये खाने-पीने की चीज में विचारधारा का क्या मेल और क्या बेमेल। हमें देखिये हमें कोई प्यार से खिलाये तो सत्तू से लेकर पिज्जा तक खाते हैं। ठर्रा से लेकर स्काच तक पी लेते है। खाना-पीना अपनी जगह विचारधारा अपनी जगह। आप परेशान न हों। आप जो कुछ खिलायेंगे, हम खा लेंगे। मैंने मन ही मन कुढ़ते हुये कहा कि दरबारीलाल तुम अपनी पार्टी की तरह हो जो कि आलू की तरह है जो हर सब्जी के साथ मिल जाता है और फिर उस सब्जी का नाम आलू के साथ ही पड़ जाता है जैसे आलू-मटर या आलू-टमाटर। मैं सोचने लगा कि पत्नी फिलहाल तो चुप है मगर इन सबके जाते ही कहीं स्वाभिमान रैली न शुरू कर दे। मुझ पर स्त्री विरोधी होने का आरोप लगाये और सामाजिक परिवर्तन की मांग करते हुये धिक्कार रैली या थू-थू रैली जैसा कोई कार्यक्रम शुरू न कर दे। पत्नी मुझे पुरूष होने के नाते शोषक घोषित कर दे और अपना बदला ले। पति पत्नी की नोंक झोंक को मेरे घर में अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई का रूप न दे दिया जाये। मैं ये सब सोच ही रहा था कि सुदर्शन जी ने कहा ’’कामरेड, सुना है आपको कोई सरकारी साहित्यिक अवार्ड मिल चुका है‘‘। मैने मन ही मन कुढ़ते हुये कहा ‘‘कि ऐसी हमारी किस्मत कहॉ कि कोई सरकारी साहित्यिक पुरस्कार हमें मिल जाये। अब तो सरकारी पत्रिकाओं में हमारी रचनायें भी नहीं छपती। हम तो अभिसप्त हैं उन्ही मानदेय रहित पत्रिकाओं के जो कि लेखकीय प्रति भी नहीं भेजती। अपनी रचनाओं वाले अंक दुर्भाग्य से हमें खरीदकर रखने पड़ते हैं। वाकई इसे ही कहते है घर फॅॅूक तमाशा देखना‘‘। मैं यह सब सोच ही रहा थी कि दरबारी लाल ने मुझे झंझोड़ा ’’क्यो सोच रहे हैं मानव जी, से घाटे का सौदा नहीं है। आपका नाम भी हो जायेगा आप फिर से महत्वपूर्ण हो जायेंगे। कुछ पैसा आपको अभी दे दिया जायेगा आगे भी आपकी कमाई होती रहेगी। मैं चौंक पड़ा ’’कैसी कमाई‘‘? दरबारीलाल मुस्कराते हुये बोले ’’देखिये, आपको टी0वी0 चैनल वगैरह में भी बुलाया जा सकता है। आपकी यात्रायें भी प्रायोजित की जा सकती हैं। नकद मानदेय के अलावा आपको शाल-लोई भी मिलेगी। स्कूलों-कालेजों में आपको विरोध का प्रतिबिम्ब मानते हुये असहिष्णुता या सहनशीलता पर भाषण देने के लिये बुलाया जा सकता है। टोले-मोहल्ले में आपकी इज्जत और धाक दोनों बढ़ जायेगी। भाभीजी एवं बच्चों का भी महत्व बढ़ जायेगा। जरा सोचिये तो, पुरस्कार लौटाने के कितने लाभ हैं। आप जहॉ नौकरी करते हैं वहॉ भी आपका रूवाब गालिब हो जायेगा और आपके अधिकारी भी आपसे डरेंगे‘‘। मुझे उनको टोकना पड़ा ’’वो कैसे‘‘? दरबारीलाल मुस्कराते हुये बोले ’’ आप भी कमाल करते है। हमारे देश में चुप रहने वालो को घास नहीं डाली जाती। बक-बक और बिना वजह विरोध करने वालों को कितनी इज्जत मिलती है, उनको कितना भाव दिया जाता है भले हो वो बेभाव हों। आप देखिये, पुरस्कार वैसे तो अपना महत्व खो चुके हैं। लोग अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेताओं तक के नाम नहीं जानते, मगर छोटे से छोटा पुरस्कार भी अगर वापस कर दिया जाये तो लोग उसे हाथों हाथ लपक लेते हैं। अब देखिये, वो भी साहित्य की राजनीति पर चर्चा करते फिर रहे है जिन्होने साहित्य न कभी पढ़ा न लिखा’’। मैने उनसे कहा ’’दरबारीलाल जी‘‘ पुरस्कार तो संजोने के लिये होते है। लोगो का प्यार एवं सम्मान है ये पुरस्कार। क्या पुरस्कार लौटान से उनका अपमान नही होगा जिन्होनें इनको दिया है। कामरेड सुदर्शन झल्लाते हुये बोले ’’कैसी बातें करते हैं आप मानव जी, आप तो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव की तरह हवा-हवाई बातें करते हैं। भई, हम आपके पास एक उम्दा प्रस्ताव लेकर आये हैं। दूसरा कोई होता तो तत्काल लपक लेता, मगर आप तो......? अरे भाई आप पुरस्कार लौटाओगे भी तो पुरस्कार प्राप्त करने वालों की सूची से आपका नाम कटेगा नहीं और लौटाने वालों में आपका नाम सभी बढ़-चढ़कर लेगे। भई, ये हीरो का नहीं एंटी हीरो का जमाना हैं। फिर हम आपको नगदी भी तो दे रहे है और आप सिर्फ इस पुरस्कार के बारे में क्यो सोचते है। इसे लौटाने पर मिलने वाले पुरस्कारों की जो संभावना बन रही है। उसके बारे में तो सोचिये साहब‘‘। ’’ऐसा क्या‘‘ मैं चौंक पड़ा। दरबारीलाल ने बात को आगे बढ़ाया ’’हॉ क्यो नहीं, और फिर कुछ महीनो बाद जब सब हो-हल्ला शांत हो जाये तो आप अपना पुरस्कार वापस मांग सकते हैं। और सबसे खास बात आपको पुरस्कार की राशि नही लौटानी है सिर्फ उसका प्रतीक चिन्ह लौटाना है। मैं फिर गड़बड़ा गया, छूटते ही बोला ’’वो चिन्ह ही तो मेरा गर्व है। मेरी सहित्यिक साधना का प्रतिफल है। जो मेरे घर-परिवार की शान है। मुझसे ये न होगा‘‘। सुदर्शन जी ओेर दरबारीलाल के चेहरे फक्क हो गये। तब तक उधर से पर्दे में कुछ हलचल हुई। ये इस बात का इशारा था कि श्रीमतीजी ने तत्काल मुझे याद किया है। मैंने उस सबको नजर अंदाज किया मानो पर्दे का हिलना और उनका मुझको तलब करना मैनें जाना ही न हो। तब तक हमारे सुपुत्र सोनू आये और बोले ’’पापा, आपको मम्मी ने तुरंत बुलाया है। मैं घर में जाने को उद्धत हुआ तो मेहमान भी चलने को हुये। सोनू ने उन दोनों सज्जनों को रूकने का इशारा किया और तपाक से बोला ’’अंकल आप लोग अभी मत जाइये, मम्मी, पाप से बात कर ले तभी जाइयेगा, ऐसा मम्मी ने बोला है‘‘। मैं घर के भीतर दाखिल होते हुये अपने प्रिय कवि की पंक्तियां गुनगुना रहा था कि ’’इस पार प्रिये तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा‘‘ अब आप ये अंदाजा लगाइये कि परदे के उस पार सोनू की मम्मी का बर्ताव मेरे प्रति कैसा होगा और परदे के इस पार दरबारीलाल और उसके सुदर्शन जी मेरे पुरस्कार को वापस करवा पाने को लेकर कितने आश्वस्त होंगे दोनों के बीच में बस परदा है परदा।
समाप्त

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