जब ख़िलजी ने पद्मावती के सौंदर्य की चर्चा सुनी तो वह मचल उठा । उसने पद्मावती को पाने के लिये चित्तौड़गढ़ में दूत भेजा । जब दूत ने यह बात मेवाड़ नरेश को बताई तो उन्होंने मना कर दिया । जब बात न बनी तो अलाउद्दीन ख़िलजी खुद चित्तौड़गढ़ पहुँच गया। उस समय ख़िलजी दिल्ली सल्तनत का बादशाह था । जब बात बढ़ने लगी तो मेवाड़ नरेश और ख़िलजी के बीच युद्ध के बादल मंडराने लगे थे । यह देख पद्मावती बोली में आपसे ब्याह नहीं कर सकती । ख़िलजी बोला ब्याह न सही कम से कम एक बार मुखड़ा ही दिखा दो।
पद्मावती ने कहा हम भारतीय नारी पराये पुरुष के दर्शन नही करती । आप चाहे तो शीशे में मेरा चेहरा देख सकते हो । ख़िलजी मान गया । पद्मावती ने झरोखे से दूर एक शीशा लगाया जहाँ उसके चहरे का प्रतिबिम्ब शीशे में आ सके । जब ख़िलजी ने पद्मावती का रूप देखा तो अवाक् रह गया । उसने जो सुना था उससे कही ज्यादा उसका रूप सौंदर्य था । वह मन ही मन पद्मावती को पाने की योजना बनाने लगा । उसने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया ।
उसके पास एक विशाल सेना थी फिर भी मेवाड़ वीर शौर्यपूर्वक लड़ते रहे । परन्तु अंततः ख़िलजी को युद्ध में विजय प्राप्त हुई ।
यह सुन पद्मावती ने नारियो की सभा बुलाई और कहा वह आततायी महल की ओर ही आ रहा होंगा , इससे पहले की वह हमारे पवित्र शरीर को दूषित करे मैने फैसला लिया है की मै अग्नि में जलकर भस्म हो जाऊँगी पर जीते जी उस पापी के हाथ नही आऊँगी । अन्य नारियो ने कहा हम भी भारतीय नारी है हमारे खून में भी राजपूत खून है । अगर हम जीवित रही तो आप के न मिलने पर उसके सैनिक हम पर जुल्म करेंगे इसलिए हम सब भी आप के साथ अग्नि कुण्ड में कूद अपने कुल देश की लाज बचाएंगे । सभी ने मिलकर एक कुण्ड में लकड़ी इकट्ठी कर अग्नि प्रज्वलित की और सैकड़ो नारियाँ उस अग्नि कुण्ड में समां गयी।
जब ख़िलजी युद्ध विजय हो उस महल में आया तप सारे महल में सन्नाटा था । वह पद्मावती को न पा सका । युद्ध विजय के बाद भी वह भारतीय नारी के आदर्श और महानता को नहीं जीत पाया ।
वह पागलो की तरह चिल्लाने लगा और बौखला कर पद्मावती को पुकारने लगा । इस युद्ध में वह जीत कर भी हार चूका था ।

" पद्मावती की जौहर अग्नि ।
ख़िलजी को कर गयी छलनी।।"

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