बात तब की है जब मैं कक्षा 10 में था। विद्यालय में नए सत्र की शुरूआत थी। नए विद्यार्थियों के साथ-साथ नए अध्यापकों का भी आगमन हुआ ।उन्हीं अध्यापकों में थे श्री महेंद्र कुमार जी।वे हमारे गणित के अध्यापक थे। और हमारी क्लास के कक्षाध्यापक बनाये गये।वे व्यवहार के बहुत सौम्य व बहुत कम डांट-फटकार करने वाले अध्यापकों में से थे। उनका कद लंबा आसमान छूता हुआ सा प्रतीत होता व रंग सांवला से थोड़ा ज्यादा सांवला , उम्र 38 से 40 के बीच होगी पर आंखों पर बुजुर्गों वाला चश्मा व डील-डौल पीसा की झुकी मीनार जैसा वे सुस्ती हमेशा अपने साथ लिए ही चलते थे। उनके सौम्य व्यवहार से मेरे मन में बहुत जल्द ही उनके प्रति सम्मान के अंकुर फूट पड़े।
थोड़े ही समय बाद क्लास वालों ने उनके अध्यापन से असंतुष्ट होकर स्कूल मैनेजमेंट से गणित के अध्यापक को बदलने की मांग कर दी । थोड़े समय बाद बदल भी दिए गए ।बावजूद इसके उनके प्रति सम्मान में मेरे मन में रत्ती भर भी कमी नहीं आई ।
महेंद्र सर अब कक्षा आठ के क्लास टीचर थे। जिसमें मेरे दोस्त हितेश का छोटा भाई रमेश भी पढ़ता था।रमेश की छवि छात्रों में वैसी ही थी जैसे जेल में सैकड़ों छोटे-मोटे चोरों के बीच में महान घोटालेबाज नेताओं की होती है।उसके रंग की तुलना तवे से की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, व एकदम अकड़ी हुई चाल में चलता ,हर वक्त 2 3 सिंखिया पहलवान से साथी हमेशा उसके साथ रहा ही करते थे।
कुछ समय बाद अर्धवार्षिक परीक्षा के वक्त मैं मेरे मित्र हितेश के घर पढ़ने गया। अगले दिन गणित का पेपर था तो तैयारी हो ना हो चिंता सबके माथे पर थी। पर रमेश पूर्णतः बेफिक्र होकर बाहर बैठा था। मैंने आश्चर्य से पूछा "क्या बात है भाई सिलेबस पूरा तैयार हो गया बड़ी मौज से बैठा है"
उसने इतराते हुए जवाब दिया" अरे मुझे तो टेंशन ही नहीं है कोई, महेंद्र सर से मेरी मस्त सेटिंग हो रखी है",
मैंने आश्चर्य से कहा,"क्या...... सेटिंग..... !सेटिंग कैसे भाई"
वह मुस्कुराते हुए बड़े गर्व से बोला "अरे वो अभी सविता मैडम का् आशिक़ हो रखा है, तो मैंने उस झंडू से सेटिंग कर ली, कि आप मुझे एग्जाम में आने वाले क्वेश्चन दे दो मैं आपको मैडम के नंबर ला दूंगा, हीहीही..... और वो चूतिया मान भी गया"
वो एक कुटिल सी मुस्कान लेकर आगे बढ़ गया ।पर मेरे मन में अब भी ये सवाल है की इन दोनों गुरु शिष्य या या डील करने वाले व्यापारियों में ज्यादा घृणित व्यक्तित्व कौन है। महेंद्र सर के प्रति सम्मान क्षणभर भी बाकी न रह सका और रहता भी कैसे।

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