सुरेश अपना कॉस्ट्यूम चेक कर रहा था. दर्जी ने कपड़े बहुत ढीले ढाले बनाए थे. अगर स्टेज पर धोती खुल गयी तो! नामुराद टेलर!! सुरेश मन ही मन उसे गलियाँ देता है. फिर खूब सारे पिन लगाकर धोती को अटकाता है. अब बस यही उम्मीद है कि कहीं वो स्टेज पर अति उत्साहित ना हो जाए और उसके कपड़े उसे धोखा न दे दे.

इतने में रमन रूम मे आता है

“हुए नहीं तैयार अभी तक. लास्ट मिनट रिहर्सल कर ले थोड़ी”

“हां तैयार हूँ. बस ये नामुराद धोती, जाने कौन से साइज़ की बना दी. जितना टाइट करो ढीली की ढीली रहती है”

“लो, और मेरी कॉस्ट्यूम इतनी टाइट बना दी कि बड़ी मुश्किल से मुंह घुसाया है. अब पता नही निकालूँगा कैसे”


सुरेश ने रमन को गौर से देखा. कॉस्ट्यूम बहुत टाइट थी. पर जॅंच रही थी

“इस कॉस्ट्यूम मे सौ फीसदी रावण लग रहे हो”

रमन को समझ नही आया की इसे अपनी प्रशंसा समझे या नहीं

“तुम भी राम लग रहे हो, बस ये धोती संभाल के, कहीं ये धोती तुम्हारा राम नाम सत्य ना करा दे!”

दोनो हंसकर निकल जाते है

वहां सुरेखा रिहर्सल हॉल मे दोनो का वेट कर रही थी

“कहाँ रह गये थे तुम दोनो? टाइम का कुछ अंदाज़ा है?”

“मेरी कोई ग़लती नही” रमन ने चुटकी ली. “ये तो सुरेश की ही धोती….”

“अरे चुप करो क्या बोल रहे हो”- सुरेश ने उसे बीच मे ही रोक दिया

“क्यूँ क्या हुआ?”

“अरे कुछ तो लिहाज करो किसके सामने बोल रहे हो”

“सुरेखा…. इससे कैसा लिहाज. अरे एक कॉलेज मे 3 साल पढ़े फिर साथ थियेटर किया. “वी आर लाइक फॅमिली”

रमन सही कह रहा था. पर सुरेश की फैमिली की परिभाषा मे सिर्फ़ सुरेश और सुरेखा आते थे, रमन शायद नहीं . जाने कितने सालो से सुरेश ये सपना सजाए बैठा था, पर कभी हिम्मत नही हुई बोलने की. आज उसे उम्मीद थी की शो के बाद वो अपने दिल की बात कह देगा. उसे अंदर ही अंदर डर लग रहा था, चेहरे पे शिकन साफ थी. पर उसे शो की टेंशन कहकर छुपाया जा सकता था.

“ओ भाई कहाँ खो गये?” रमन की आवाज़ सुनकर सुरेश होश में आया. “चलो रिहर्सल करे”

उसे ये नाटक करने मे बहुत आनंद की अनुभूति हो रही थी. यहाँ उसे सुरेखा को अपनी पत्नी कहने का झूठा गौरव भी था और रावण को हराने से ज़्यादा उसे रमन को हराने की खुशी थी. रमन उसका दुश्मन नही था पर मन ही मन वो रमन से ईर्षा करता था और सुरेखा के लिए दोनो के बीच एक छुपी सी प्रतिद्वन्दिता थी. तो रमन को हराकर सुरेखा को जीत लेना. इस जीत के मायने ही कुछ और है. एक ही भूमि पर एक साथ दो युद्ध लडें जा रहे थे. एक शारीरिक और एक मानसिक.


रिहर्सल्स मे आज उसको एक अजीब सी खुशी मिल रही थी. उसकी आँखों मे चमक थी. ये चमक तभी जाती थी जब उसे अपनी धोती याद आती थी और फिर वो थोडा सजग हो जाता था.

मंच सज चुका था. सभी किरदार अपने कैरेक्टर मे थे. सिवाय सुरेश के. उसको बहुत सी चिंताए थी. एक तो ये की आज उसने सुरेखा को इतना याद किया है की उसको डर लग रहा था की कही स्टेज पर वो सीता की जगह सुरेखा ना बोल दे. और दूसरा यही की धोती ना खुल जाए!

पर दोनो मे से कुछ नही हुआ. नाटक शुरू हो गया. राम बनके जब उसने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई तो घूर कर रमन को देखा जो अन्य राजाओ के साथ आसन पर बैठा था, सुरेश मानो अपने विजय की स्वीकृति माँग रहा हो. वनवास के दृश्‍य मे सीता के पाँव के काँटे निकालते हुए उसकी आँखो से आँसू बहने लगे. और सुरेखा ने एक पल को सुरेश की और अचरज से देखा. जाने उसे क्यूँ लग रहा था की सुरेश स्क्रिप्ट से बाहर जाकर अभिनय कर रहा था. हमेशा थियेटर मे सुरेश और रमन की एक्टिंग मे तुलना होती रही पर आज सुरेखा मान गयी की सुरेश रमन से बेहतर अभिनय करता था. एक पल को मानो वो सुरेश की एक्टिंग पर मोहित हो गयी. सुरेश ने ये भाव पढ़ लिया सुरेखा के चेहरे पर और उसकी आँखों मे चमक आ गयी और होंठों पर एक मंद मुस्कान.

रावण सीता को धोखा दे कर अगवा कर लेता है. और सुरेश बैकस्टेज ये सीन देखकर खौले जा रहा था. उसका मन था स्टेज पर आकर रमन रूपी रावण का अंत कर दे, पर किसी तरह उसने खुद पे काबू किया

यहाँ पर दिन का शो समाप्त हुआ और अगले दिन बाकी के प्रसंग का वादा हुआ

सुरेश को खुशी थी की प्ले अच्छा हुआ और उससे ज़्यादा इस बात की उसकी धोती नही खुली. स्पॉन्सेर्स ने बैकस्टेज आकर अभिनेताओ की भूरी भूरी प्रशंसा की. पर वो सारी प्रशंसा एक तरफ और सुरेखा के शब्द एक तरफ “सुरेश यू वर अमेज़िंग!!” उसके कानो मे अभी तक गूँज रहे थे

नया दिन हुआ नया सीन भी. आज का दिन उसके जीवन का सबसे यादगार दिन होगा हर लिहाज से. उसने अपनी एक्टिंग मे कभी इतनी जान नही लगाई थी. पर आज हर संकट उसे अपने जीवन का संकट नज़र आता था.


“हे सागर देवता हमारे और हमारी सेना को आगे जाने हेतु मार्ग प्रशस्त करे अन्यथा मैं बाण चलाकर इस सागर को मरूभूमि बना दूँगा.” मन ही मन वो कल्पना कर रहा था कि समाज उसके और सुरेखा के बीच मे खड़ा है और वो कह रहा है कि हट जाओ मेरे रास्ते से. कोई कास्ट क्लास रीजन रिलिजन की दीवार हमे जुदा नही कर सकती और अगर आज ये मुझे सुरेखा से नहीं मिला सकी तो भाड़ मे जाए ये समाज!

रावण के संवाद आज उसे अपने उपर ताने लग रहे थे. “धिक्कार है हे राम तुम पर और तुम्हारे भाई पर. नारी को पौरुष की सीमओं मे बाँध दिया तुमने. नारी का सम्मान तो तुमने कभी किया ही नही ना शुपनखा ना ताडका ना सीता. तुम सीता को इसलिए नही बचाना चाहते कि सीता तुमको प्रिय है अपितु केवल इसलिए की तुम्हारे पौरुष को कोई हानि ना हो.”


अचानक स्टेज पर शांति छा गयी. सुरेश को होश आया. क्या रावण ने असल मे ऐसा कुछ बोला या ये उसका भ्रम था? जो भी था सच था.

युद्ध हुआ और रावण के हर सर को काटते हुए सुरेश को अपनी जीत नज़दीक दिखने लगी. और नाभि मे तीर लगते ही सुरेश अंदर ही अंदर ख़ुशी से चीखा . आज उसकी जीत हुई.


सीता आई तो सही, पर उसे राम को अग्नि परीक्षा देनी होगी. सुरेश कहने को उतावला हो रहा था कि नही चाहिए अग्नि परीक्षा, तुम जैसे भी मिलो बस मिल जाओ. और दोनो के अयोध्या आकर साथ- साथ आसन पर विराजमान होते ही नाटक का अंत हुआ. परदा गिरते ही सुरेश बाथरूम की और भागा. ये धोती उससे अब और ना संभाली जाती थी

जब कपड़े बदल वो वॉशरूम से लौटा तो रमन और सुरेखा को बधाई देने वालो का ताँता लगा था. “अरे हमने भी अच्छी एक्टिंग की हम भी तारीफ के हक़दार है” सुरेश चहकते हुए बोला. पर जो जवाब मिला उसकी सुरेश को कतई आशा नहीं थी.


“नही वो बात नही सुरेश.. . ये मेरे और रमन की शादी की बधाई है. हमने कल रात को मंदिर मे शादी कर ली. सब इतनी जल्दी में हुआ की किसी को कुछ बता न सके” सुरेखा ने सुरेश को लड्डू देते हुए कहा.

सुरेश के सर पर पहाड़ टूट गया. रह रह के वरमाला का दृश्य याद आता था. स्टेज पे राम जीता था पर ज़िंदगी के नाटक मे रावण जीत गया. लड्डू मुंह में गया लेकिन गले से नीचे न उतरा, लड्डू मीठा था पर दिल कड़वा कर गया.

आज विचित्र रामलीला खेली गयी. राम को अपनी कला की महानता और अपने सामर्थ्य पे अभिमान था. सीता ने स्वतन्त्र होकर अपना निर्णय लिया. रावण को अपनाया और राम के मद को चूर किया. और इस तरह इस नयी रामलीला का दुखद अंत हुआ.

ये राम न तो मर्यादा पुरषोत्तम था न निर्दयी निष्ठुर जीवन साथी. ये राम तो बस अपनी सोच में जकड़ा हुआ इंसान था, न निकला जाता था न चला जाता था. महामानव पूजे जाते है, दानव पूजे जाते है, और इंसान ,वो कही बीच में खड़े रह जाते है.




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