भूत-प्रेतों की रहस्यमयी दुनिया

भादों का महीना। काली अँधियारी रात। कभी-कभी रह-रहकर हवा का तेज झोंका आता था और आकाश में रह-रहकर बिजली भी कौंध जाती थी। रमेसर काका अपने घर से दूर घोठे पर मड़ई में लेटे हुए थे। रमेसर काका का घोठा गाँव से थोड़ी दूर एक गढ़ही (तालाब) के किनारे था। गढ़ही बहुत बड़ी नहीं थी पर बरसात में लबालब भर जाती थी और इसमें इतने घाँस-फूँस उग आते थे कि डरावनी लगने लगती थी। इसी गढ़ही के किनारे आम के लगभग 5-7 मोटे-मोटे पेड़ थे, दिन में जिनके नीचे चरवाहे गोटी या चिक्का, कबड्डी खेला करते थे और मजदूर या गाँव का कोई व्यक्ति जो खेत घूमने या खाद आदि डालने गया होता था आराम फरमाता था।

धीरे-धीरे रात ढल रही थी पर हवा का तेज झोंका अब आँधी का रूप ले चला था। आम के पेड़ों के डालियों की टकराहट की डरावनी आवाज उस भयंकर रात में रमेसर काका की मड़ई में बँधी भैंस को भी डरा रही थी और भैंस डरी-सहमी हुई रमेसर काका की बँसखटिया से चिपक कर खड़ीं हो गई थी। रमेसर काका अचानक सोए-सोए ही हट-हट की रट लगाने लगे थे पर भैंस अपनी जगह से बिना टस-मस हुए सिहरी हुई हटने का नाम नहीं ले रही थी। रमेसर काका उठकर बैठ गए और बैठे-बैठे ही भैंस के पेट पर हाथ फेरने लगे। भैंस भी अपनापन पाकर रमेसर काका से और सटकर खड़ी हो गई। रमेसर काका को लगा कि शायद भैंस को मच्छर लग रहे हैं इसलिए बैठ नहीं रही है और बार-बार पूँछ से शरीर को झाड़ रही है। वे खड़े हो गए और मड़ई के दरवाजे पर रखे धुँहरहे (मवेशियों को मच्छर आदि से बचाने के लिए जलाई हुई आग जिसमें से धुँआ निकलकर फैलता है और मच्छर आदि भग जाते हैं) पर थोड़ा घांस-फूंस रखकर मुँह से फूंकने लगे।

रमेसर काका फूँक मार-मारकर आग तेज करने लगे और धुंआ भी बढ़ने लगा। बार-बार फूँक मारने से अचानक एक बार घांस-फूँस जलने लगी और मड़ई में थोड़ा प्रकाश फैल गया। उस प्रकाश में अचानक रमेसर काका की नजर उनकी बंसखटिया पर पड़ी। अरे उनको तो बँसखटिया पर एक औरत दिखाई दी। उसे देखते ही उनके पूरे शरीर में बिजली कौंध गई और इसके साथ ही आकाश में भी बिजली कड़की और एक तेज प्रकाश हुआ। रमेसर काका डरनेवालों में से तो नहीं थे पर पता नहीं क्यों उनको आज थोड़ा डर का आभास हुआ। पर उन्होंने हिम्मत करके आग को और तेज किया और उसपर सूखा पुआल रखकर पूरा अँजोर (प्रकाश) कर दिया। अब उस पुआल के अँजोर में वह महिला साफ नजर आ रही थी, अब रमेसर काका उस अंजोर में उस औरत को अच्छी तरह से देख सकते थे।

रमेसर काका ने धुँहरहे के पास बैठे-बैठे ही जोर की हाँक लगाकर पूछा, ''कौन है? कौन है वहाँ?" पर उधर से कुछ भी प्रतिक्रिया न पाकर वे सन्न रह गए। उनकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि अब क्या करना है। वे मन ही मन कुछ बुदबुदाए और उठकर खड़े हो गए। उनके पैर न आगे अपनी खाट की ओर ही बढ़ रहे थे और ना ही मड़ई के बाहर ही। अचानक खाट पर बैठी महिला अट्टहास करने लगी। उसकी तेज, भयंकर, डरावनी हँसी ने उस अंधेरी काली रात को और भी भयावह बना दिया। रमेसर काका पर अब सजग हो चुके थे। उन्होंने अब सोच लिया था कि डरना नहीं है क्योंकि अगर डरा तो मरा। रमेसर काका अब तनकर खड़े हो गए थे। उन्होंने मड़ई के कोने में रखी लाठी को अपने हाथ में ले लिया था। वे फिर से बोल पड़े, "कौन हो तुम? तुमको क्या लगता है, मैं तुमसे डर रहा हूँ??? कदापि नहीं।' और इतना कहते ही रमेसर काका भी हा-हा-हा करने लगे। पर सच्चाई यह थी कि रमेसर काका अंदर से पूरी तरह डरे हुए थे। रमेसर काका का वह रूप देखकर वह महिला और उग्र हो गई और अपनी जगह पर खड़ी होकर तड़पी, "तूँ... डरता नहीं.........हैSSSSSSSS न। बताती हूँ मैं तुझे।" रमेसर काका को पता नहीं क्यों अब कुछ और बल मिला और डर और भी कम हुआ। वे बोल पड़े, "बता, क्या करेगी तूँ मेरा? जल्दी यहाँ से निकल नहीं तो इस लाठी से मार-मारकर तेरा सिर फोड़ दूँगा।" इतना कहते ही रमेसर काका ने अपनी लाठी तान ली।

महिला चिल्लाई, "तूँ मुझे मेरे ही घर से निकालेगा? अरे मेरा बचपन बीता है इस मड़ई में। यह मेरा घर है मेरा। मैं बरसों से यहीं रहते आ रहीं हूं। पर पहले तो किसी ने कभी नहीं भगाया। यहाँ तक कि भइया (कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में पिताजी को भइया भी कहते हैं) ने भी।" अब पता नहीं क्यों रमेसर काका का गुस्सा और डर दोनों शांत हो रहे थे। उनको अब लग रहा था कि उनके सामने जो महिला खड़ी है उसको वे जानते हैं, उसकी आवाज पहचानते हैं।

रमेसर काका अब लाठी पर अपने शरीर को टिका दिए थे और दिमाग पर जोर डालकर यह सोचने की कोशिश करने लगे कि यह कौन है? और अगर पहचान की है तो यह चुड़ैल के रूप में भयंकर, विकराल चेहरेवाली क्यों है?ओह तो यह बलेसरा बहिन (बहन) है क्या? अचानक उनके दिमाग में कौंधा। नहीं-नहीं बलेसरा बहिन नहीं हो सकती। उसे तो मरे हुए पच्चीसो साल हो गए। अब रमेसर काका अपने अतीत में जा चुके थे। उनको सबकुछ याद आ रहा था। उस समय उनकी बलेसरा बहिन 12-14 साल की थीं और उम्र में उनसे 3-4 साल बड़ी थी। चारा काटने से लेकर गोबर-गोहथार करने में दोनों भा-बहिन साथ-साथ लगे रहते थे। एक दिन दोपहर का समय था और इसी गड़ही पर इन्हीं आमों के पेड़ों पर गाँव के कुछ बच्चे ओल्हा-पाती खेल रहे थे। बलेसरा बहिन बंदरों की भांति इस डाली से उस डाली उछल-कूद कर रही थी। नीचे चोर बना लड़का पेड़ों पर चढ़े लड़के-लड़कियों को छूने की कोशिश कर रहा था। अचानक कोई कुछच समझे इससे पहले ही बलेसरा बहिन जिस डाली पर बैठी थी वह टूट चुकी थी और बलेसरा बहिन औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ी थीं। सभी बच्चों को थकुआ मार गया था और जबतक बड़ें लोग आकर बलेसरा बहिन को उठाते तबतक उसकी इहलीला समाप्त हो चुकी थी।

रमेसर काका अभी यही सब सोच रहे थे तबतक उन्हें उस औरत के रोने की आवाज सुनाई दी। बिलकुल बलेसरा बहिन की तरह। अब रमेसर काका को पूरा यकीं हो गया था कि यह बलेसरा बहिन ही है। रमेसरा काका अब ये भूल चुके थे कि उनकी बहन मर चुकी है वे दौड़कर खाट के पास गए और बलेसरा बहिन को अंकवार में पकड़कर रोने लगे थे। उन्हें कुछ भी सूझ-बूझ नहीं थी। सुबह हो गई थी और वे अभी भी रोए जा रहे थे। तभी उधर कुछ लोग कुछ काम से आए और उन्हें रमेसर काका के रोने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने मड़ई में झाँक कर देखा तो रमेसर काका एक महिला को अँकवार में पकड़कर रो रहे थे। उस महिला को देखते ही ये सभी लोग सन्न रह गए क्योंकि वह वास्तव में बलेसरा ही थीं जो बहुत समय पहले भगवान को प्यारी हो गई थीं। धीरे-धीरे यह बात पूरे गाँव में आग की तरह फैल गई और उस गड़ही पर भीड़ लग गई। गाँव के बुजुर्ग पंडीजी ने कहा कि दरअसल बलेसरा जब मरी तो वह बच्ची नहीं थी, उसकी अंतिम क्रिया करनी चाहिए थी पर उसे बच्ची समझकर केवल दफना दिया गया था और अंतिम क्रिया नहीं किया गया था। उसकी आत्मा भी भटक रही है।

लोग अभी आपस में बात कर ही रहे थे तभी रमेसर काका बलेसरा बहिन के साथ मड़ई से बाहर निकले। बलेसरा गाँव के लोगों को एकत्र देखकर फूट-फूटकर रोने लगी थी। सब लोग उसे समझा रहे थे पर दूर से ही। रमेसर काका के अलावा किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह बलेसरा के पास जाए। बलेसरा अचानक बोल पड़ी, ""हाँ यह सही है कि मैं मर चुकी हूँ। पर मुझसे डरने की आवश्यकता नहीं है। मैं इसी गाँव की बेटी हूँ पर आजतक भटक रही हूं। मेरी सुध कोई नहीं ले रहा है। मैं इस गड़ही पर रहकर अन्य भूत-प्रेतों से अपने गाँव के लोगों की रक्षा करती हूँ। मैं नहीं चाहती हूँ कि इस गड़ही पर, इन आम के पेड़ों पर अगर कोई गाँव का व्यक्ति ओल्हा-पाती खेले तो उसे किसी भूत का कोपभाजन बनना पड़े। इतना कहने के बाद बलेसरा रोने लगी और रोते-रोते बोली, "मुझे एक प्रेत ने ओल्हा-पाती खेलते समय धक्का दे दिया था।"

आगे बलेसरा ने जो कुछ बताया उससे लोगों के रोएं खड़े हो गए। बलेसरा ने क्या-क्या बताया इसे जानने के लिए इस कहानी की अगली कड़ी का आपको इंतजार करना पड़ेगा। आखिर वो प्रेत कौन था जिसने बलेसरा को धक्का दिया था। अरे नहीं-नहीं आपलोगों को अब इंतजार नहीं कराऊँगा। इ कहानी की दूसरी और अंतिम कड़ी का आनंद उठाइए।

आइए आपको बलेसरा के अतीत में ले चलता हूँ। पूर्व कहानी (इस कहानी के पूर्वार्ध) से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि बलेसरा का घोठा (उसके पिताजी का) गाँव से बाहर एक गढ़ही (तालाब) के किनारे था। बलेसरा बचपन में अपना अधिक समय इसी घोठे पर गुजारती थी।

बलेसरा अभी 10-12 साल की थी तभी से अपने घर का सारा काम संभाल ली थी। अपने माँ के कामों में हाथ बँटाने के साथ ही साथ खेती-बारी का काम और गोबर-गोहथार। जाड़े के दिनों में जब सूर्यदेव घने कुहरे को चीरकर कँपकपाते हुए अपना दर्शन देते थे तो बलेसरा तरई (चट्टाई) निकालकर मड़ई के बाहर बिछा देती थी और उसी पर बैठकर घमावन (धूप लेना ...घमावन घाम से बना है जिसका मतलब धूप होता है) लेती थी और उसकी माँ उसके बालों में कंघी आदि करती थी, अगर इसे गँवई भाषा में कहें तो बलेसरा अपने माँ से ढील (जूँ) हेरवाती थी। इस तरई पर बैठकर वह अपने माँ से स्वेटर बुनना, डलिया, कुरुई, दौरा आदि बिनना (बुनना) भी सिखती थी। लोगों की सुनें तो बलेसरा बहुत ही गुणी होने के साथ ही साथ बहुत खूबसूरत भी थी। कहा जाता है कि एक भेड़ियार जो लगभग 20-22 साल का गबड़ू जवान था वह अक्सर अपनी भेंड़ों को लेकर इसी गढ़ई की ओर से निकलता था। वह किस गाँव का था इसका पता किसी को भी नहीं था पर जब भी वह अपनी भेड़ों को लेकर इस गढ़ई की ओर आता था तो 1-2 घंटे इसी गढ़ई पर आराम करता था।

बार-बार इस गढ़ई पर आने के कारण बलेसरा के भइया (पिताजी) से उसका थोड़ा परिचय भी हो गया था और वह बलेसरा के भइया (पिताजी) को काका कहकर पुकारता था। बलेसरा के भइया (पिताजी) उससे 2-3 कंबल भी खरीदे थे। सुनने में आता है कि वह बलेसरा के भइया से इन कंबलों का पैसा नहीं लिया था और कहा था कि काका इधर बराबर आता ही हूँ और आपके घर पर पानी-ओनी पीता हूँ, कभी-कभी आपके वहां से सत्तू-भुजा आदि भी खाने को मिल जाता है, इसलिए आपसे इन कंबलों का पैसा नहीं लूँगा पर हाँ अगर आप अब आगे कोई कंबल खरीदेंगे तो जरूर पैसा लूँगा।

आपको लग रहा होगा कि इस भूतही कहानी से इस भेड़िहार का क्या संबंध? और साथ ही यह कहानी तो किसी और दिशा में बढ़ रही है। पर ऐसी बात नहीं है। दरअसल हुआ यह कि एक दिन उस भेड़िहार ने बलेसरा के भइया (पिताजी) से कहा कि काका हम आपकी छवड़ी (लड़की) से बेयाह (विवाह) करना चाहते हैं। यह बात सुनते ही बलेसरा के भइया (पिताजी) दौड़कर मड़ई में से लउर (लाठी) निकाल लाए और गुस्से में उस भेड़िहार को 2-3लउर जमा दिए और उसे वहाँ से भागने के लिए कहे और साथ ही यह भी कहे कि फिर कभी िस गढ़ई पर अपनी सूरत मत दिखाना।

इस बात को बीते कई महीने हो गए थे पर एक दिन अचानक वह भेड़िहार फिर से उस गढ़ई पर प्रकट हुआ। इस बार उसने अपनी भेड़ों को बलेसरा की मढ़ई से दूर ही रखा और गढ़ई के दूसरे किनारे पर एक छोटी मड़ई डाल कर रहने लगा। बलेसरा के भइया (पिताजी) को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वह भेड़िहार प्रतिदिन सुबह में अपनी भेड़ों को लेकर निकल जाता पर साम को उसी गड़ही पर वापस आकर रात बिताता। एक दिन मौका देखकर उसने फिर से बलेसरा के भइया को कहा कि वह बलेसरा का विवाह उससे कर दें पर बलेसरा के भइया इस बार भी तैयार नहीं हुए और फिर से उसको मारने पर ऊतारू हो गए पर वह भेड़िहार डरा नहीं और सिर्फ इतना ही कहकर चला गया कि जैसी आपकी मर्जी।

कहा जाता है कि उसी दिन रात को वह भेड़िहार फिर से अपनी भेड़ों के साथ उस गढ़ही पर आया और शराब के नशे में पता नहीं क्या-क्या बोला। उसने यहाँ तक कहा कि आज की रात उसके जीवन की आखरी रात है पर बलेसरा के भइया ने उसकी बातों को अनसुनी कर दी और सोंचे की सुबह गाँव के कुछ बड़े-बुजुर्गों के सामने इसे मारकर यहाँ से भगा दूँगा। सुबह हुई उस भेड़िहार की भेड़े उठकर चरने के लिए इधर-उधर जाने लगीं पर भेड़िहार का कुछ भी अता-पता नहीं था। सूर्यदेव के सिर पर आ जाने के बाद भी वह भेड़िहार अपनी मढ़ई से बाहर नहीं निकला। इधर बलेसरा के भइया गाँव में जाकर 8-10 लोगों को पंचायत करने के लिए एकट्ठा कर के उस गढ़ही पर ले आए।

जब एक आदमी ने उस भेड़िहार के मढ़ई में जाकर उसको हाँक लगाई तो उसने कोई उत्तर नहीं दिया। अब वह आदमी उस सोए भेड़िहार के पास जाकर उसको जगाने की कोशिश की पर यह क्या उस भेड़िहार के प्राण-पखेरू तो उड़ गए थे। यह बात गाँव -जवार में आग की तरह फैल गई कि उस भेड़िहार ने जहर खाकर आत्म हत्या कर ली है। पुलिस आई और उसकी लास को पोस्टमार्टम के लिए ले गई। खैर यह बात आई-गई हो गई।

इस घटना के लगभग 1 साल बाद एक दिन जब बलेसरा गाँव के ही कुछ बकरी-गाय आदि के चरवाहों के साथ ओल्हापाती खेल रही थी तो वही डाल टूट गई जिसपर वह बैठी थी और उसकी भी इहलीला समाप्त हो गई।

गाँव के लोगों को यह मात्र एक दुर्घटना लगी थी और उनको लगा था कि पेड़ पर से गिरकर बलेसरा की मौत हो गई। उसको उसी गढ़ही पर एक कोने में दफना दिया गया क्योंकि उसके घर वालों को लगा था कि बलेसरा अभी11-12 साल की बच्ची ही तो है।

पर आज जब बलेसरा ने बताया कि उसे ओल्हापाती खेलते समय किसी ने धक्का दिया था और वह धक्का देनेवाला व्यक्ति कोई और नहीं वही भेड़िहार था। बलेसरा ने सुबकते हुए आगे कहा कि जब से वह भेड़िहार मरा उसके लगभग 1 महीने बाद से ही उसे लगने लगा था कि कोई साया उसका पीछा कर रही है पर उसने यह बात किसी से नहीं बताई। वहीं कहीं भी जाती थी तो उसे आभास होता था कि कहीं कोई तो ऐसा है जिसे मैं देख नहीं पा रही हूँ। बलेसरा ने बताया कि एकदिन वह मढ़ई में अकेले थी। उसदिन उसके माता-पिता ऊँख छिलने (गन्ना छिलने) गन्ने के खेत में गए थे और बलेसरा मढ़ई में खाना बना रही थी। तभी वह भेड़िहार प्रकट हुआ और बलेसरा कुछ समझे इसके पहले ही फूट-फूटकर रोने लगा। बलेसरा की तो चिख निकल गई पर उस भेड़िहार ने उसे न डरने के लिए कहा और कहा कि वह उससे शादी कर ले। पर बलेसरा ने मना कर दिया। इसके बाद वह भेड़िहार गायब हो गया और इस घटना के 4-5 दिन बाद ही उसने बलेसरा को पेड़ से धक्का देकर मार डाला।

बलेसरा आगे रो-रोकर कहने लगी कि उस भेड़िहार ने मुझपर कब्जा कर लिया है। मैं उसकी गुलाम हूँ, वह जो बोलता है वह मुझे करना पड़ता है और कभी-कभी वह कोई गल्ती करने पर हमें मारता भी है। उसने आगे कहा कि इस भूतही दुनिया में जो सबसे ताकतवर है उसकी ही चलती है। यहाँ भी पुरुष वर्ग महिलाओं पर हाबी है। उसने कहा कि कभी-कभी उस भेड़िहार के कई सारे दोस्त मिलकर मुझे मारते हैं और हमेशा सताते रहते हैं।

उसने कहा कि हम भूत-प्रेतों का भी एक क्षेत्र होता है जिसमें हमलोग विचरण करते हैं। हम दूसरे भूत-प्रेतों के क्षेत्र में जाना पसंद नहीं करते। उसने यहाँ तक कहा कि हमारा भी शोषण किया जाता है। हमें एक नौकरानी की तरह रहना पड़ता है। जब जिस बड़े भूत कि मर्जी हुई उसके हुकुम की तालिम करनी पड़ती है।

उसने कहा कि हम भूत भी कई प्रकार के होते हैं, कुछ अच्छे भूत भी हैं, वे किसी का नुकसान नही करते बस

अपने ही धुन में रहते हैं। उसने कहा कि हम भूत-प्रेत में भी हर जातियों के भूत हैं। कोई मुसलमान तो कोई हिंदू तो कोई और। और हम लोग विशेषकर अपनी जाति के पूजा-पाठ करनेवाले लोगों से दूर रहना ही पसंद करते हैं। हमें धार्मिक, स्वच्छ स्थानों पर जाने में डर लगता है, ऐसा लगता है कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमें जलाकर राख कर देगी। इसके बाद बलेसरा और फूट-फूटकर रोने लगी। उसने वहाँ खड़े लोगों से गुहार लगाई कि मैं इस गढ़ई पर रहते हुए भूत-प्रेतों से इस गाँव की रक्षा करने की भी कोशिश करती हूँ। आखिर कबतक मैं ऐसे ही भटकती रहूँगी और उस भेड़िहार का अत्याचार सहती रहूँगी। उसकी बात सुनकर गाँव के पंडीजी आगे आए और बोले कि बेटी आज ही तेरा उद्धार करने के लिए हम लोग कुछ करेंगे और उसे इस भूतही दुनिया से छुटकारा दिलाकर तुझे इस प्रेतात्मा से मुक्ति दिला देंगे।

इसके बाद बलेसरा अचानक गायब हो गई और पंडीजी ने उसी दिन बाजार से धार्मिक अनुष्ठान के लिए कुछ सामान मँगाए और दूसरे दिन सुबह कुछ पूजा-पाठ किए। कहा जाता है कि अब बलेसरा को मुक्ति मिल गई है।

जय-जय बजरंग बली।

-पं. प्रभाकर पांडेय गोपालपुरिया


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