आई लव बारिश


मुझे बचपन से बारिश मे भीगने का बहुत शौक था। बारिश की बूंदें सिर्फ मेरे तन को ही नहीं मेरे मन को भी भिगो देती।मुझसे टकराती ठंडी हवा मुझ सी ही तो थीं, बारिश में भीगी हुई। लेकिन मेरा ये शौक कभी पूरा नही हो पाया। मैं जैसे ही बारिश मे उछलकूद शुरू करती ..एक गरजती हुई आवाज आती,

"सुरभि ! ये क्या पानी मे उछलकूद कर रही हो, जाओ जाकर किचन मे मां का हाथ बटाओ।" 

मै बुरा सा मुंह बनाती और सिर दर्द का बहाना बना कर अपने कमरे मे आ जाती। दादी नही रही, तब ये उत्तरदायित्व बड़ी मां निभाती।..मै जैसे ही पानी मे भीगना शुरू करती ..बड़ी मां चिल्लाती ,

" सुरभि ! ये क्या लड़को की तरह पानी मे उछल रही हो, ससुराल मे भी यही हाल रहा तो देखना एक दिन सास से मार खाओगी।"

मैं ये सुनकर डर जाती, और जोर से अपनी आंखे बंद कर लेती। मेरे दिमाग ने  सास की एक तस्वीर बना ली थी...हाथ मे डंडा लिये मुझे मारने के लिये आती एक तेज तर्रार औरत …..

     धीरे धीरे दिन बीतने लगे।  मेरी शादी के लिये रिश्तें आने शुरू हो गये। एक दिन निखिल अपनी मां के साथ मुझे देखने आये। मैं कनखियों से निखिल की मां को देख रही थी। वो एक गंभीर महिला थीं और वो बहुत ही नपेतुले शब्दों मे बात कर रही थीं।  अभी तक मेरे मन से सास नाम का डर दूर नही हुआ था।

      अगले दिन बड़ी मां के पास निखिल की मां का फोन आया। वो मेरी और निखिल की शादी के लिये तैयार थी। मां बहुत खुश थीं। खुशी उनके चेहरे से टपक रही थी और मेरी  हालत उस बकरे जैसी थी ,जिसे हलाल करने के लिये कसाई के पास ले जाते हैं।

मैने शादी न करने के कई बहाने बनाये ,लेकिन मेरी किसी ने नही सुनी। मां ने मुझे समझाया, "बेटा ,निखिल से शादी करके तू बहुत खुश रहेगी ,देखना वहां तेरी हर इच्छायें पूरी होंगी।"

"क्या मै वहां बारिश मे भीग सकूंगी।" मैने बड़ी मासूमियत से पूछा। मां खिलखिला कर हंस पड़ीं।

      और मै एक दिन ब्याह कर निखिल के घर आ गयी। सास नाम से मुझे अभी भी डर लगता था। सभी रिश्तेदार जा चुके थे। सारी रस्मे बहुत ही शांतिपूर्ण ढंग से निभायी गयी थीं। निखिल के पिता की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी। घर पर हम तीन लोग ही थे। एक अजीब सी खामोशी घर में थी । बस मेरे पैरों की पायल और हाथों की चूडियां, घर मे किसी के होने का एहसास कराती थी। एक उदासी निखिल और उनकी मां के चेहरे पर हर समय छायी रहती थी। मैनें निखिल से पूछा भी, लेकिन वो टाल गये।

      उस दिन मेरा मन बहुत उदास था। सुबह ही निखिल आफिस के काम से बाहर गये थे। उन्हें दूसरे दिन वापस आना था। सासू मां अपने कमरे मे थी , उन्होने खाना भी नही खाया था। शायद उनकी कुछ तबियत ढीली थी।

      दोपहर तक आसमान पर बादल छा गये। मेरा मन झूम उठा। थोड़ी देर मे जोरों की बारिश शुरू हो गयी। अब अपने आप को रोकना मुश्किल था। मेरा मन बारिश मे भीगने के लिये मचलने लगा। मैने सासू मां के कमरे में  झांक कर देखा, वो सो रही थी। मैं दबे पांव छत पर चल दी। उस दिन मैं बारिश में भीग जाना चाहती थी। बारिश की बूंदों में खुद भी बूंद  बन जाना चाहती थी। मैनें अपनी दोनो हथेली फैला दी और बारिश की बूंदो को अपनी मुठ्ठी  मे बंद करने लगी। आज मुझे रोकने वाला कोई नही था, न दादी ,न बड़ी मां और सासूमां सो रही थीं। अभी मुझे बारिश में भीगते हुए पांच मिनट भी नही हुए थे कि, बादल की गड़गड़ाहट और बारिश के शोर को मात करती हुई एक कड़क आवाज मेरे कानों मे पड़ी..

" सुरभि , ये क्या कर रही हो ,पानी मे भीगोगी तो बीमार हो जाओगी। जाओ नीचे जाकर कपड़े  बदलो।" 

      मैनें एक बार फिर बुरा सा मुंह बनाया और कपडे बदल कर कमरे मे आ गयी। तब तक सासू मां चाय बना लायी। मैनें गुस्से में चाय पीने के लिये मना कर दिया। सासूमां चाय मेज पर रख कर चली गयीं। उस दिन एक बार फिर मेरी बारिश मे भीगने की इच्छा अधूरी रह गयी। मेरे सिर मे दर्द हो रहा था। मैनें दवा खाई और लेट गयी।थोड़ी देर में ही मुझे नींद आ गयी। मैनें सपने में एक लड़की को देखा,  छत पर हाथ फैलाये खड़ी एक लड़की, गोल गोल बूंद सी घूमती एक लड़की। और वो लड़की हूबहू मेरे जैसी थी।
शाम को अचानक मेरी आंख खुली। सासू मां निखिल को फोन पर वापस आने के लिये कह रही थी। मैं घबरा गयी। मैनें  पूछा,

"आप  निखिल को वापस क्यों बुला रही है"

"तुम्हें बुखार है।"

"अरे मांजी!  हल्का सा है ,दवा खाऊंगी तो ठीक हो जायेगा। आप बिना वजह निखिल को मत परेशान कीजिये।"

सासू मां कुछ नही बोली। रात तक निखिल आ गये। सुबह भी मेरा बुखार नही उतरा था। निखिल मुझे डॉक्टर के पास ले गये। वहां डॉक्टर ने मेरे कुछ टेस्ट कराये और शाम तक बता दिया कि मुझे निमोनिया हुआ है। घर पर और भी उदासी का माहौल हो गया। 

    अगले दिन मेरी आंख देर से खुली। निखिल ने चाय बनायी। मैनें सासू मां के बारे मे पूछा, तो निखिल ने बताया कि घर में पंडित जी आये है और मां पूजा करा रही हैं। मैनें आश्चर्य से कहा..

" यहाँ मेरी तबियत खराब है और मांजी को पूजा की पड़ी है।"

"चुप रहो, मांजी तुम्हारे लिये पूजा करा रही हैं।" निखिल ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

"मेरे लिये? मुझे क्या हुआ है? बस निमोनिया ही तो है।"

"आज निमोनिया हुआ है ,कल डबल निमोनिया होगा और फ़िर ....ये कह कर निखिल की आंख में आंसू आ गये।

" निखिल, फिर क्या?..आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।"

" सुरभि! हमने तुम्हें कभी नही बताया कि मेरी एक छोटी बहन थी ..श्रुति। पिताजी के जाने के बाद वो ही हमारे मुस्कुराने की वजह थी। हमारी जिन्दगी थी। हम उसके लिये ही जीते थे। लेकिन एक  दिन कालेज से आते समय वो बारिश मे खूब भीगी। उसको पहले निमोनिया हुआ, फ़िर डबल निमोनिया और फ़िर वो हमें  छोड़ कर भगवान के पास चली गयी। मां श्रुति को खो चुकी हैं, लेकिन अब सुरभि को नही खोना चाहती, इसलिये वो महामृतुंजय का जाप करा रही हैं ...सुबह से बिना कुछ खाये पिये, ताकि तुम ठीक हो जाओ।"

ये कहते कहते निखिल की आवाज भर्रा गयी। मैं एकटक निखिल को देख रही थी। मेरे दिमाग में निखिल के एक एक शब्द हथोड़े की तरह पड़ रहे थे। मुझे अचानक अपनी मां की बहुत याद आने लगी। मैं सोचने लगी कि क्या सास ऐसी भी होती हैं? एक माँ की तरह? ...मैं झटपट पूजा के कमरे की ओर भागी, और जा कर सासूमां से लिपट गयी। मेरे मुंह से बस इतना निकला ..."मां मुझे माफ़ कर दो…

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