परसों सुबह सवेरे का वक्त रहा होगा |पत्नी ने टी वी देखते हुए कहा कि आज क्या बनाना है |बनाने से उनकी मुराद सब्जी इत्यादि से ही थी |मूर्ख बनाने से तो हरगिज नहीं रही होगी |यह काम तो टीवी वाले वर्षों से कर रहे हैं मैंने हस्बेमामूल कह दिया कुछ भी बना लो |मेरा मन तो था कि आज चने की भाजी बनाई जाये , इस बार पूरा सीजन ही निकल गया चने की भाजी नहीं खाई |लेकिन चने की भाजी कहाँ मिलेगी |||
यह ऊब की मनःस्थिति के दौरान हुए घरेलू वार्तालाप का ब्यौरा है ,इसमें उल्लेखनीय कुछ भी नहीं है | आजकल ऊबने के इस दैनंदिन यथास्थितिवाद को टी वी के सीरियल्स भी कहाँ तोड़ पाते हैं |मैंने पत्नी के हाथ से रिमोट लेकर , चैनल को उत्तरप्रदेश के चुनावों पर होने वाली बौद्धिक ? बहस पर केन्द्रित करने का प्रयास किया और सारी ऊब को एक महाऊब के खंदक में धकेल दिया | पर राहत यहाँ भी नजर नहीं आई | वही प्रायोजित बुद्धिवादी दिखाई दिए जो ले दे कर इस बात पर गुत्थमगुत्था हो रहे थे कि अच्छा हुआ नेताजी ने यू पी में समाजवाद को बचा लिया वरना बाहर वालों ने तो लोहिया जी को कहीं का नहीं छोड़ा था |

बाहर सर्दी थी और एक फेरी वाला था जो सर्दी से लड़ते हुए इस संवादबोझिल पारिवारिकता को भेद रहा था| वह गली के मुहाने पर आवाज लगा रहा था “ छांछ कोतमीर ” !!! उसकी आवाज में कातरता और ठिठुरन थी | इस आवाज को रोज सुनता हूँ लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया |संभ्रांत घरों के लोग फेरी वालों की आवाज को अक्सर अनसुना कर देते हैं , और ये आवाजें प्रायः बंद दरवाजों से टकराकर वापस लौट जाती हैं तथा हांक लगाने वाले की छाती या पीठ से टकराकर जमीन पर गिर पड़ती हैं | छांछ और कोतमीर जैसी दो असंगत चीजों को एक साथ बेचने की गुहार पर आज पहली बार ध्यान गया |मै दरवाजा खोलकर बाहर निकल पडा | वह एक खंडित साइकिल के जीर्ण कैरियर पर छांछ की कुप्पी लटकाए हुए था | कुप्पी के वजन से साइकिल टेढ़ी हो रही थी जिसे संतुलित करने के लिए उसने हेंडिल पर कोतमीर का गठ्ठर रख लिया था | संतुलन फिर भी मुआफिक नहीं था | लेकिन वह साधे हुए था | ऐसी असम्भव साधना आजकल कतिपय राजनीतिक पार्टियाँ भी कर लेती हैं जहाँ भीतर के भूचालों के बावजूद प्रवक्ता गण हँसते हुए सबकुछ ठीक होने के दावे करते दिखाई देते हैं | वह एक पतला सा कुरता और धोती पहना हुआ अधेड़ आदमी था जिसके नीचे के एक दांत पर चांदी का खोल चढ़ा हुआ था |वह हँसता था तब चांदी वाला दांत बाकी दांतों को नेपथ्य में धकेल देता था | चांदी भले ही मुहँ के भीतर ही क्यों न हो अपनी हेकड़ी बता ही देती है |उसका कुरता सर्दी से लड़ने में असमर्थ था | ठण्ड की शर्मिंदगी को छुपाने के लिए वह या तो हँसता था या फिर जोर से हांक लगाता था ! छांछ कोतमीर !!! मैंने उससे , इस अटपटे धंधे के बारे में जानने की गरज से कहा “ यार या तो छांछ बेचो या सब्जियां ये क्या आधा तीतर आधा बटेर बेचते हो | धंधे के भी कुछ उसूल या अनुशासन होते हैं कि नहीं | वह आदतन हँसा फिर अचानक उसकी हँसी बुझ गई | वह समझ चुका था कि मै उपयुक्त ग्राहक नहीं हूँ | उसने कहा बाबूजी एक भैंस है और थोड़ा सा बाड़ा है ||जमीन इतनी कम है कि सिर्फ धनिया ही बो सकता हूँ | कोथमीर गरीब पौधा है , पकने का रास्ता नहीं देखना पड़ता पत्तियां बिक जाती हैं | मैंने कहा रुको तुम्हारे लिए कुछ लाता हूँ | मै उसे अपनी ऊनी सदरी देना चाहता था जिसे मैंने पहनना बंद कर दिया था | लेकिन भीतर गया तो जैसे आसमान से गिरकर खजूर में अटक गया | पत्नी कहने लगी कि वह सदरी तो उसने शनि महाराज को देने के लिए रखी है , वो शनिवार आने वाला है | मै अचकचाया सा खड़ा रहा , तबतक पत्नी उस छांछ वाले के पास पहुँच गयी |

भैया तुम गाँव से चने की भाजी ला सकते हो , पत्नी ने पूछा | वह एक बार फिर हँसा और बिना कुछ बोले साईकिल पर पैडल मारते निकल गया | अब गली में एक कांपती हुई खडखडाहट बची थी |

कोई डेढ़ दो घंटे बाद वह फिर दिखा | इस बार सीधे घर आ गया | उसके हाथ में एक पोटली थी , जिसे पत्नी को देते हुए बोला बाई चने की भाजी है , अभी तोडकर लाया हूँ | पत्नी ने भाजी रख ली और कपाट से सदरी निकाल कर छांछ वाले को देने लगी | वह सदरी लेकर चला गया | इस बार मै उसका चेहरा नहीं देख पाया लेकिन उसकी पीठ दिखी जो शायद हँस रही थी |

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