बड़े बाजार की व्यस्तम सडक। आनन्द उमंग से भरपूर रौनक. मौसम एक दम साफ़। किसी प्रकार के तूफ़ान की उम्मीद नही। अचानक भगदड मच गयी। अफरा तफरी का माहौल। दुकानों के शटर गिरने लगे। शुरू हुआ आगजनी और लूट पाट का दौर। एक अफवाह और सांप्रदायिक दंगा। जलाने लगे अपने ही लोगों के अरमानों कि होली. उपद्रवियों का नंगा नाच. किस लिए किसके नाम पर ? 
स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था अपर्याप्त.अतिरिक्त सुरक्षा बल की माँग ? . 
जलते वाहन, दुकाने और हिंसा का खुला नंगा नाच. अबोध बच्चे फेंके जा रहे जलती दुकानों में। 
सर , आप खड़े - खड़े क्या देख रहे हैं। लाठी चार्ज , आँसू गैस , हवाई फायरिंग सब निष्फल। मरने वालों की संख्या और बढ़ जायेगी। मुझ से नही देखा जा रहा यह सब। यह दंगा ऐसे नही रुकने वाला। आप गोली चलाने का आदेश दीजिए नही तों मैं आपको .. ?
''मैं क्या करूँ राम सिंह '' '' ऊपर से आर्डर नहीं है फायरिंग का। '' 

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