ईख चबाती लड़की
अर्पण कुमार

जिसकी आवाज में मिठास है
जिसके शब्दों में
कभी न हारने की एक आस है
जो रहे कहीं भी
जो हो कोई भी
मगर हमारे आस पास है
ईख चबाती ऐसी
किसी लड़की में
कुछ तो खास है
कुछ तो खास है

जिसके मिजाज में
एक घुमक्कड़ी है
जो चंचल हर घड़ी है
जो किसी के
कोरे स्लेट से जीवन की
बारहखड़ी है
यह क्या हुआ
क्योंकर हुआ कि
वह आज पुनः
कार्तिक की इस अमावस
दीपोत्सव की
देदीप्यमान चेतना में
दीए की लौ सी
हठात् आ खड़ी है

ईख चबाती लड़की
प्रतिबिंब है
सहज स्त्री विश्वास का
फिर चाहे वह
गाँव में रहे या शहर में
कस्बे में हो या महानगर में
वह अपने भीतर
रखे चलती है
एक तरल और
विरल दुनिया
जिसके भीतर
सुरक्षित होती है
हर असफलता और
अवसाद के बावजूद
जिह्वा भर मिठास
मुट्ठी भर विश्वास
नयन भर उजास
मन भर साहस
…...
दुनिया के भीतर
किसी और दुनिया में
होती है लड़की
दुनिया के बरक्स
कोई और दुनिया
रचती है लड़की

वह संगम है
अक्खड़ता और कोमलता का
वह होती है एक चकमक
प्रहार करो जिसपर
तो आग पैदा करे
वह होती है चंद्रप्रभा
जिसके आँचल में आओ
तो शीतल करे मन को

ईख चबाती लड़की का गला
है इतना पारदर्शी कि
उससे नीचे जाता
गन्ने का रस
दिखता है साफ साफ
और उसे देखते हुए
हुलस हुलस उठता है मन
दूर क्षितिज पर दिखते हैं
दो सफेद कपोत
प्रेमरत
बादल
धरती की गोद में
करता दिखता है
विश्राम

ईख चबाती लड़की के
लाल होंठ
हो उठते हैं कुछ
और सुर्ख
मीठे रस की बूंदों को
धारण किए
उसके युगल होंठ
कुछ ऐसे दिखते हैं
मानों सैंकड़ों
सुधाकर की सुधा
उसमें जमा हो
सीमोल्लंघन कर
छूने का मन करे जिन्हें
......

ईख चबाती ऐसी ही
एक लड़की को
मन में बसाए
एक सैनिक हँसते हँसते
खेत हो गया था कभी
सीमा पर
दुश्मनों से लड़ते हुए
वीरतापूर्वक
....
उसके स्मारक पर
फूल चढ़ाते हुए
हर पुण्यतिथि को
वह लड़की चुपके से रखती
चली आ रही है
तब से एक रसभरा गन्ना भी
......
आज जो ऊख
चूस रही है
कल खाने पड़
सकते हैं उसे
निर्रथक और बेमानी
अपमान भरे शब्द
छोटी छोटी बातों में
मगर वह तैयार है
हर तरह के
संघर्ष के लिए
उसे मालूम है
जीवन सिर्फ
मिठास का नाम नहीं
प्रेम सिर्फ दिल नहीं जोड़ता
दिल तोड़ता भी है
यहाँ गरल पीना पड़ता है
और रुसवाई
सहनी पड़ती है
वह जानती है
रस से अधिक
सीठी होती है ईख में
मगर इतने भर से
कोई ईख चूसना
नहीं छोड़ देता
....
ईख चूसती हुई
दुनिया की मिठास को
वह अपने अंदर भरती है
और बाहर दुनिया में ही
छोड़ देती है
अनावश्यक और
सारहीन पदार्थ
दुनिया के

ईख चूसते हुए
वह सीख गई है
छाँटना और छोड़ना
वह जान गई है
इस तरह
ज़िंदगी जीना भी

................ 

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