पढ़े-लिखे मुर्ख
राजीव आनंद

    बेटा पूरे परिवार की इज्जत अब तुम्हारे हाथ में है, हम तो पेट काटकर तुम्हें पढ़ा रहे है अगर तुम अपने क्लास में कम माकर्स लाए तो परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी, मणिशंकर वर्मा इन्ही शब्दों से अपने पुत्र को प्रोत्साहित कर रहे थे.
    हालांकि मणिशंकर वर्मा खूद पढ़े-लिखे क्लर्क थे पर बनना चाहते थे आइएएस, नहीं बन सके इसलिए अब अपनी महत्वाकांक्षा को तलवार बनाकर अपने ही बेटे आदित्य के गर्दन पर लटका रखा था. आदित्य का बचपन कहीं खो चुका था, वह पहले स्कूल जाता था, स्कूल से आने के बाद कोचिंग क्लासेज के लिए जाता था, वहां से लौटने के बाद स्कूल और कोचिंग के होमवर्क करता था यानी कि अव्वल आने के लिए आदित्य के पिता ने उसे शिक्षा के भट्ठी में झोंक दिया था.
    मणिशंकर वर्मा जानते थे कि आइएएस बनने के लिए किस स्तर की तैयारी की जरूरत है, उनका सपना अब आदित्य पूरा करेगा. खेलना-कूदना आदित्य भूल चुका था. अपने सपने को भूल कर वह पिता के सपने को पूरा करने के लिए तनावग्रस्त रहने लगा था. मासूमियत, चुलबुलापन, बचपन की शरारतें कुछ भी आदित्य में नजर नहीं आता था. बचपन में ही आदित्य तनावग्रस्त जीवन जीने के लिए अभिशप्त था.
    मणिशंकर वर्मा कभी यह जानने की कोशिश नहीं किए कि आदित्य क्या करना चाहता है, उसका रूझान किस ओर है. प्रतियोगिता और जीवन संघर्ष का भयावह वातावरण तैयार कर दिया था मणिशंकर वर्मा ने अपने बेटे आदित्य के लिए. वे हमेशा अपने बेटे को कहा करते थे कि बेटे मैं तुम्हें भविष्य में आइएएस से एक इंच कम वर्दाश्त नहीं कर सकता. मैं आइएएस नहीं बन सका इसकी भारपाई तुम करोगे, आदित्य. लोगों को पता तो चले कि मैं भी आइएएस मेकर हॅंू. यही मेरे जीवन का सपना है जिसे अब तुम्हें पूरा करना है.
    आदित्य बेचारा क्या करता, चुपचाप सूनता था और मन ही मन सोचता काश् पापा समझ पाते और मुझे कविता और कहानियां पढ़ने देते. तनाव के पलों में आदित्य कविता लिख कर ही कुछ चैन पाता. कभी जब अपनी लिखी कविता आदित्य अपने पापा को पढ़ कर सुनाता, तो वे रूष्ठ हो जाते और कहते बेटा बेकार की मगजमारी मत किया करो. कविता लिखने में कोई भविष्य नहीं, भूखो मरोगे.
    आदित्य बेचैन सा हो जाता कविता के विरूद्ध बातें सुनकर. लेकिन कविता लिखना उससे नहीं छुटता, उसे जब भी तनाव सा महसूस होता, ह्दय भारी सा लगता, वह अपनी भावनाओं को शब्दों के माध्यम से कागज में बिखेर देता. कई कविताओं को आदित्य अखबारों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेज देता जो गाहे-बगाहे प्रकाशित भी हो जाता.
    12वीं की परीक्षा में आदित्य अपने पिता के मुताबिक हाई माकर्स हासिल नहीं कर पाया, उसे रिजल्ट देखने के बाद बहुत ही आत्मग्लानि हुई, उसने लिखा
    ‘‘ पापा, चाहिए तो था कि
      मेरे सपने करते आप पूरे
      पर अफसोस आपके सपने
      कर न सका मैं पूरे ’’
मौत को गले लगाने से पहले आदित्य ने यही आखरी कविता लिखा था. अपने एकलौते बेटे को खोकर मणिशंकर वर्मा पढ़े-लिखे मुर्ख की तरह जार-जार आंसू बहा रहे थे.


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