हिंदी साहित्य में जब नब्बे के दशक में स्त्री विमर्श की आंधी चल रही थी तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि हिंदी फिल्मों में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसका असर देखने को मिलेगा । साहित्य में स्त्री विमर्श अभी तक अपने मुकाम पर नहीं पहुंच पाया है और लगातार अपने होने के लिए संघर्ष कर रहा है वहीं हिंदी फिल्मों में स्त्री यानि नायिका पूरे तौर पर स्थापित हो चुकी है । कई बार रामधारी सिंह दिनकर की संस्कृति के चार अध्याय में लिखी हुई यह उक्ति याद आती है जहां वो कहते हैं – विद्रोह क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले लंबे समय तक पकता रहता है । दिनकर की इस उक्ति में हम यह जोड़ सकते हैं कि साहित्य और कला में भी किसी प्रवृत्ति के स्थापित होने में वक्त लगता है और उसकी स्वीकार्यता में और भी समय लगता है । साहित्य में यह समय फिल्मों से ज्यादा लग रहा है । इन दिनों साहित्य में तो स्त्रियां केंद्र में हैं, बहुधा अरनी रचना की वजह से और कभी कभार अपने बयानों की वजह से । साहित्य के स्त्री पात्र लगातार बोल्ड होते चले जा रहे हैं । घूंघट में रहनेवाली स्त्रियां अब अपने बिंदासपन की वजह से पुरानी छवि को छिन्न भिन्न कर आगे बढ़ चुकी है । इस वक्त हिंदी साहित्य में जो युवा पीढ़ी सक्रिया है उसमें लेखिकाओं का पलड़ा भारी है और आलोचकों की आत्मा भी उनकी ओर झुकी हुई नजर आती है । लेकिन वहां अब भी लेखिकाओं को लेकर एक झिझक दिखाई देती है । यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी । हम बात कर रहे हैं हिंदी फिल्मों में नायिकाओं के बदलते किरदारों की और उनके बढ़ते हुए दबदबे की । हिंदी फिल्मों के इतिहास पर नजर डालें तो फिल्में पुरुष प्रधान ही बना करती थी और नायकों के होने या ना होने से फिल्मों के चलने या फ्लॉप होने का अनुमान लगया जाता था । चूंकि किसी भी कथानक में स्त्रियों की उपस्थिति अनिवार्य होती थी लिहाजा फिल्मों में नायिकाओं को रखा जाता था । जैसे परिवार में पत्नी, बहू और बहन उसका अनिवार्य अंग होते हैं उसी तरह से फिल्मों में नायिकाओं को रखा जाता था । नायिकाएं भी वैसी कि अपने पहनावे में बिल्कुल घरेलू, नख से शिख तक ढ़की हुई । दिल के अरमानों को दिल में ही दफन करने को हरदम तैयार । जैसे जैसे समय बदला नायिकाओं के रंगरूप में तो परिवर्तन हुआ लेकिन फिल्मों में वो रहीं शोभा के तौर पर ही । फिल्मों के क्रमिक विकास के साथ साथ नायिकाओं के कपड़े थोड़े कम होने लगे । फिल्म संगम में वैजयंतिमाला ने कपड़ों ने उस वक्त काफी धूम मचाई थी। तब यह तक लिखा गया था कि भारतीय फिल्मों की नायिकाएं बोल्ड होना शुरू हो गई हैं । पहनावे में बोल्डनेस के बावजूद हिंदी फिल्मों की नायिकाएं अपने नायकों के मुकाबले दोयम दर्जे पर ही रहीं । बॉलीवुड में अगर हीरो को किसी एक फिल्म के लिए एक करोड़ रुपए मिलते थे नायिकाओं को पच्चीस लाख पर ही संतोष करना होता था । माना यह जाता था कि फिल्में तो हीरो के बल पर चलती हैं । साठ के दशक में एकाध प्रयोग हुए जिसमें नायिकाओं के बूते पर फिल्म चलने की बात सामने आई । मीना कुमारी की फिल्म मैं चुप रहूंगी की सफलता से इस बात की वकालत करनेवालों को बल मिला । उस दौर में मीना कुमारी का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोलता था । किसी भी फिल्म में मीना कुमारी की मौजूदगी उसके हिट होने की गारंटी मानी जाती थी । आलम यह था कि एक ही साल मीना कुमारी की तीन फिल्में फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए नामांकित हुई थी । यह फिल्मफेयर अवॉर्ड में एक रिकॉर्ड था कि एक ही साल में एक ही अभिनेत्री अलग अलग तीन फिल्मों से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामांकित हुई थी । मीना कुमारी के बाद फिल्मी दुनिया में हेमा मालिनी के वक्त एक बार फिर से ऐसा मौका आया कि लगा कि नायिका भी अपने बूते पर फिल्म को सफल बना सकती हैं । सीता और गीता पूरे तौर पर हेमा मालिनी की फिल्म थी । आगे चलकर रेखा ने भी कुछ फिल्में अपने बूते पर सफल करवाई । अब यहां एक बात गौर करने लायक है । इस दौर में फिल्मों की नायिकाओं का जो संघर्ष था वह अपने आपको बचाने, अपने वजूद को बचाने, अपने को साबित करने या फिर अपने परिवार को बचाने का संघर्ष था । फिल्मों की नायिकाएं वैसी सामाजिक संरचना का हिस्सा थी जहां कि एक महिला का जीवन संघर्ष केंद्र में था । यही चरित्र के इर्द-गिर्द पूरी फिल्म घूमती थी । अब अगर हम गौर से देखें तो उस वक्त इस तरह की फिल्में इस वजह से हिट हो रही थी कि समाज की महिलाओं का भी वही संघर्ष था । तो फिल्में देखकर महिलाएं कथानक के साथ अपने आपको भी आईडेंटिफाई कर रही थी । इस बात पर भी शोध किया जाना चाहिए कि उन्नीस सौ बासठ में मीना कुमारी की फिल्म मैं चुप रहूंगी के सफल होने के बावजूद फिल्म निर्माताओं ने नायिका प्रधान फिल्मों पर दांव क्यों नहीं लगाया ।


मैं चुप रहूंगी के रिलीज होने के लगभग चालीस साल बाद अब हिंदी फिल्मों में एक ऐसा दौर आया

है जब लगातार एक के बाद एक नायिका प्रधान फिल्में आ रही हैं और हिट भी हो रही हैं । अभी अभी रानी मुखर्जी अभिनीत मर्दानी और प्रियंका चोपड़ा की फिल्म मैरी कॉम आई जो काफी सफल रही । फिल्मों के जानकारों के मुताबिक मैरी कॉम पर फिल्म निर्माता को करीब सौ फीसदी का मुनाफा हुआ है । ट्रेड पंडितों के मुताबिक फिल्म मैरी कॉम के निर्माण पर कुल अठारह करोड़ रुपए की लागत आई थी और अबतक उसकी कुल कमाई पैंतीस करोड़ रुपए को पार कर चुकी है । इसी तरह से रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी भी पचास फीसदी से ज्यादा मुनाफा कमाने में कामयाब हो चुकी है । मर्दानी की लागत उन्नीस करोड़ रुपए के आसपास थी और रिलीज होने से लेकर अबतक फिल्म ने करीब तीस करोड़ रुपए का कारोबार कर लिया है । इन दो फिल्मों के अलावा भी कई फिल्में आई जिसमें नायिकाओं ने अपने बूते पर फिल्म की लागत तो वसूल ही ली बल्कि ठीक ठाक मुनाफा भी कमाया । इस साल रिलीज हुई हाईवे, रागिनी एमएमएस, बॉबी जासूस और गुलाब गैंग में से सिर्फ गुलाब गैंग ही अपनी लागत नहीं निकाल पाई । अब इन महिला प्रधान फिल्मों की सफलता के पीछे दो तीन वजहें हैं । एक तो मल्टीप्लैक्सों की संख्या बढ़ने और लाइफस्टाइल में बदलाव की वजह की से महिला दर्शकों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है । दूसरे अब फिल्मों की नायिकाओं का चरित्र भी बदला है । पहले जहां फिल्मों की नायिकाएं अपने या अपने परिवार के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करती थी वहीं अब जो फिल्में आ रही हैं उसमें महिला समाज के लिए लड़ती हुई दिखाई दे रही है । भारतीय फिल्मों में यह एक बड़ा बदलाव है जिसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है । जैसे मर्दानी और गुलाब गैंग में तो समाज के लिए संघर्ष ही फिल्म की केंद्रीय थीम है । उसी तरह से मैरी कॉम में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा और उसका संघर्ष ही नायिका के तौर पर प्रतिबिंबित होता है । अब यह जो समाज के लिए कुछ करने का संघर्ष है, वह आज के मल्टीप्लैक्स में जानेवाली महिलाओं के मूड से मेल खाता है । इस तरह के चरित्र से आज मल्टीप्लैक्स की महिला दर्शक अपने आप को आईडेंटिफाई करती हैं । महिला दर्शकों की बढ़ती संख्या और फिर फिल्म के किरदार से एक तरह का उनका जुड़ाव नायिका प्रधान फिल्मों की सफलता के लिए आधार प्रधान कर रही है । लिहाजा फिल्में लोकप्रिय हो रही हैं । नायिकाओं को हीरो बनाती इस तरह की फिल्मों में फिल्म निर्माताओं की भी रुचि काफी बढ़ी है । निर्माताओं की बढ़ती रुचि के पीछे आर्थिक कारण है । नायिकाओं को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मों की लागत बहुत कम होती है । हीरो की तुलना में हिरोइन का मेहनताना कम होता है । अगर हम हाल में रिलीज हुई फिल्मों पर नजर डालें तो जय हो और सिंघम रिटर्न्स की लागत सौ करोड़ या उससे ज्यादा रही है, जबकि नायिका प्रधान फिल्मों की औसत लागत पच्चीस से सत्ताइस करोड़ रही है । अब अगर हम तुलनात्मक रूप से देखें तो नायिका प्रधान फिल्में कम बजट में तैयार हो जाती है और उनका औसत मुनाफा भी ठीक ठाक रहता है । ज्यादा निवेश पर जोखिम ज्यादा होता है और जो निर्माता ज्यादा निवेश का जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं वो कम लागत पर बनने वाली नायिका प्रधान फिल्में बना रहे हैं । वजह चाहे जो भी हो लेकिन इतना तय है कि हिंदी सिनेमा में बदलाव का एस ऐसा दौर आया है जहां अब हिरोइनों के बल पर लगातार एक के बाद एक फिल्म सफल हो रही है ।

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