फूल खिलना बाकी है

 

यकीन नहीं होता कि फोन पर दिए गए एक सन्देश ने मेरी दुनिया बदल दी है. कल तक मुझे ज़िन्दगी हसीन लगती थी, आज भारी लगने लगी है.

कल का ही दिन था जब वह मुझे छोड़कर गया था. जाते समय पूछा – ‘फिर मिलेंगे न?’ मैं उसे कोई जवाब नहीं दे पाई. हाँ, मेरे गालों पर दौड़ी लाली का इकरार उसने समझ लिया होगा. वैसे इस मामले में बहुत कच्चा था. मेरी आँखों की भाषा भी बहुत देर में समझ पाया था.

ग्यारह जनवरी थी जब मैं अमन से पहली बार मिली थी. बहुत सौम्य और सुन्दर चेहरा था उसका. दुनिया के छल-कपट से बहुत दूर था उसका निर्मल मन. बिलकुल वैसा ही था जैसा मेरे सपनों का राजकुमार था. मैं तो दीदी से मिलने गई थी, क्या पता था कि अपना दिल किसी के पास छोड़कर चली आऊंगी. और क्या पता था कि मेरा दिल लिए वह संसार से विदा हो जायेगा.

दीदी ने ख़त में लिखा था कि कभी मुझसे मिलने आ जाया करो. इस बार टाल नहीं सकी. दिसम्बर में सेमेस्टर ख़तम हुआ था इसलिए थोड़ी फुर्सत भी थी. अमन जीजाजी के सबसे अच्छे दोस्त का छोटा भाई था. उसने पहली बार मुझे देखा तो समझा कि मैं पडोसी के घर की हूँ. इसलिए कोई बात नहीं की. जब दूसरी बार मिला तो ‘सॉरी’ कहा. मैंने कारण पूछा तो उसने कहा – ‘मैंने आपको पहचाना नहीं था.’

वो हर दूसरे दिन हमारे घर आता था. कभी-कभी ताश खेलता. मिंटू के जन्मदिन पर देर रात तक हम ताश खेलते रहे थे. वह एक बार भी मुझसे नहीं जीता. उसे ये भी मालूम था कि मैं बेईमानी से उसे हरा रही थी, पर उसने एक बार भी नहीं बोला.

एक बार मैं दीदी के साथ साड़ियाँ खरीदने गई तो वह भी मिल गया. हम एक-दुसरे को देखकर मुस्कुराये. साड़ियाँ चुनने में भी उसने हमारी मदद की. फिर हमारे साथ घर तक आया. मैंने झट अपने हाथों से चाय बनाई. चाय पीते-पीते ही उसे याद आया कि वह खुद के लिए टी-शर्ट खरीदने गया था और हमारी मदद करते-करते भूल गया.

बसंत पंचमी पर मैंने ढेर सारे तिल के लड्डू बनाये. वह ना-ना करता रहा और मैं उसके मुंह में ठूंसती गयी. जब वह थक गया और आँखों में आंसू आ गए तो मैंने उसे छोड़ दिया. उसने कहा – ‘इतनी ज़बरदस्ती तो मेरी माँ भी नहीं करती.’

जीजाजी ने नया कैमरा ख़रीदा. सबने फोटो खिंचवाई. सिर्फ अमन ने फोटो खिंचवाना पसंद नहीं किया. मैंने दीदी को इशारा किया तो वो समझ गयी. मैं धीरे से अमन के पीछे गयी और उसकी आँखें बंद कर दी. इससे पहले कि वह मेरा हाथ हटाता, दीदी फोटो खींच चुकी थी. अमन के चेहरे पर विस्मय के भाव थे. मैंने ‘सॉरी’ बोला फिर हंसने लगी. मुझे हँसता देखकर दीदी और जीजाजी भी हंसने लगे. फिर विवश होकर उसे भी हँसना ही पड़ा.

उसके पास एक खटारा मोटरसाइकिल थी. एक दिन मैंने उससे कहा – ‘इतने दिन हो गए यहाँ रहते, एक बार भी कहीं घुमाने नहीं ले गए.’ बेचारा शरमा गया. फिर धीरे से बोला – ‘कहाँ चलोगी?’

हम शहर से दूर निकल गए. कोई मंजिल नहीं थी, सिर्फ रास्ता था. हलकी पवन थी, मुस्कुराती फिजा थी, खुशगवार मौसम था और अमन का साथ था. जी चाहता था कि वक़्त थम जाये. उसी वक़्त उसकी मोटरसाइकिल थम गयी. फिर स्टार्ट नहीं हुई. सात किलोमीटर चलने के बाद घर पहुंचे. थकान चरम सीमा पर थी. पाँव बहुत दर्द कर रहे थे. अमन के चेहरे पर पराजय के भाव थे. घर पहुँचने पर दुखी मन से बोला – ‘सारी गलती इस खटारा की है.’

उसके घर में बड़ा सुन्दर बगीचा था. एक बार उसके घर गयी तो मैंने उसका बगीचा देखने की इच्छा व्यक्त की. उसने पूरे मन से एक-एक पौधे का इतिहास बताया. फूल-पत्तों की इतनी जानकारी उसके पास थी कि बता नहीं सकती. एक सफ़ेद गुलाब के पौधे के पास मैं ठिठक गयी. अपने आप शब्द फूटे – ‘बहुत सुन्दर है.’ उसने उस पौधे की डंठल काट कर दी और कहा कि इसे अपने बगीचे में लगाना.

अब मेरी आँखों में उसके प्रति प्यार और समर्पण का भाव आ गया था. पता ही नहीं चला कि कब दिल उसका हो गया, कब वह मेरे सपनों के राजकुमार में तब्दील हो गया. उसकी एक-एक अदा मुझमे रच गई. उसका मासूम चेहरा मेरे सपनों में आने लगा और मैं उसके सपने देखने लगी. तब पता चला कि मुझे मोहब्बत हो गयी है. प्यार एक कोमल एहसास है, जहाँ शर्तें नहीं होती, दुनिया के छल-कपट नहीं होते. दुनिया की सूरत अचानक बदल जाती है. सारा जहाँ खुबसूरत लगता है. हर दृश्य मनोरम लगता है.

प्यार का सबसे कठिन दौर होता है इज़हार का. कैसे कहूं कि तुमसे प्यार है? कैसे कहूं कि दिल में तुम हो? कैसे कहूं हर पल में तुम हो? कई बार जुबां ने साथ नहीं दिया. आज तक उसके सामने नहीं घबराई, आज जब इज़हार का वक़्त आया तो घबराहट में शब्द खो जाते थे. प्यार का सन्देश आँखों में समा जाता था.

एक दिन अवसर मिला.

‘मुझे तुमसे कुछ कहना है.’ मैंने कहा.

‘क्या?’ उसने पुछा.

‘मैं...मैं....’

‘हाँ हाँ, बोलो न.’

‘रुक जाओ, पानी पीकर आती हूँ.’

जब पानी पीकर आई तो उसने पुछा – ‘तुम कुछ कह रही थी न?’

‘हाँ.’

‘तो अब बोलो.’

‘मैं न...मैं न...’

‘जल्दी बोलो न, मेरे पास टाइम नहीं है.’

‘ठीक है जाओ, कल बोलूंगी.’

और वह चला गया. एक और मौका हाथ से निकल गया.

अब वापस जाने की बेला आ गई. दीदी भी दो साल के मिंटू के साथ आ रही थी. जीजाजी भी साथ थे. मैंने दीदी से कहा – ‘दीदी अमन से भी कहो न साथ चले.’

‘क्यों?’ दीदी कपड़े पैक करते हुए बोली.

‘ऐसे ही. इतनी बार उसके घर गई न, तो उसने बोला था कि तुम्हारे मम्मी-पापा से मिलने का मन है.’ मैं दुपट्टे का एक छोर हाथ से रगड़ते हुए बोली.

दीदी ने कपड़े पैक करना बंद कर दिया. मुस्कुराती हुई बोली – ‘गुडिया, सच-सच बताना. तुझे उससे प्यार हो गया है न?’

इस प्रश्न के लिए मैं तैयार नहीं थी. शर्म के मारे मैंने अपना चेहरा हथेली में छुपा लिया. दीदी हथेली हटाते हुए बोली – ‘जब कोई लड़की किसी हमउम्र लड़के का जिक्र होने पर शरम से पानी-पानी हो जाये, तो समझ लेना चाहिए कि उसे प्यार हो गया है. अब मुझे तेरी स्वीकृति की ज़रुरत नहीं है.’ मुझे यकीन था कि दीदी हमें ज़रूर मिलायेंगी. साथ ही मैं सोच रही थी कि अमन में इतनी चतुराई क्यों नहीं है?

अमन भी हमारे साथ चला. रस्ते में मैंने उसे बहुत छेड़ा. कभी उसे भूत बंगले की कहानी सुनाई और कभी अंधे क़त्ल की. बेचारा डरता रहा. उसका एक ही काम था – हर स्टेशन पर उतरकर कुछ खाने के लिए लाना. मिंटू रोने लगता तो उसे चुप कराने की जिम्मेदारी मैं अमन को दे देती और बेचारा रोते हुए बच्चे को चुप कराने में रुआंसा हो जाता. मैं हँसते-हँसते पागल हो जाती. दीदी और जीजाजी अमन का पक्ष लेते. उसे दिलासा देते. रात को उसके कान में हेयरक्लिप डालकर उसे कई बार जगा दिया. वह हर बार चौंककर उठता. तब शायद उसे मेरी भूत बंगले की कहानी याद आई होगी. अंत तक वह ये पता नहीं लगा पाया कि मैं ही उसे जगा रही थी. ये राज़ हमेशा उसके लिए राज़ ही बना रहा.

मेरे बगीचे में उसने खुद बड़ी मेहनत से गुलाब का पौधा लगाया. मैंने उसे अपनी सहेलियों से मिलवाया. उसे अपने साथ कई सहेलियों के घर ले गयी. हर बार मेरे हाथ जोड़ता कि मुझे कहीं नहीं जाना, पर मैं भी कहाँ मानने वाली थी. वो लड़कियों से घबराता था, और मुझे उसे सताने में मज़ा आता था.

मेरे मम्मी-पापा को वह बहुत अच्छा लगा था. मैंने दीदी से बोला की पापा से कहकर मेरी बात चलाओ न! दीदी ने मुझे गले से लगा लिया और बोली – ‘बस, अच्छा मौका मिलने की देर है.’

जिस दिन उसे जाना था उस दिन मैं बहुत दुखी थी. इतने दिन संग रहने के बावजूद मैं अमन से प्यार का इज़हार नहीं कर पाई थी. आज आखिरी अवसर भी हाथ से निकलने वाला था. सुबह-सुबह ही जाना था, इसलिए कोई नया मौका नहीं मिल पाया. जाते वक़्त वो भी दुखी था. पता नहीं क्यों मुझे एहसास हुआ कि मेरा प्यार एकतरफा नहीं है. ज़रूर वो मेरी आँखों की भाषा समझ गया है. मैंने अपने पहले प्यार का इज़हार करने के लिए कविता लिखी –

“कैसे कहूं कि दिल में तुम हो

कैसे कहूं हर पल में तुम हो

रोज़ रात को स्वप्न में तुम हो

कैसे कहूं हर रत्न में तुम हो

सुमन में तुम हो ताल में तुम हो

रात की जगमग थाल में तुम हो

नदी में तुम हो जल में तुम हो

कैसे कहूं हर पल में तुम हो

चाँद के दुधिया रंग में तुम हो

तारों के अंग-अंग में तुम हो

आज में तुम हो कल में तुम हो

कैसे कहूं हर पल में तुम हो

तितली के पंखों में तुम हो

फूलों के रंगों में तुम हो

ग़ज़ल में तुम हो गीत में तुम हो

दुश्मन तुम हो मीत भी तुम हो

बेचैनी और हल भी तुम हो

कैसे कहूं हर पल में तुम हो

धरती में आकाश में तुम हो

तृप्ति में हो प्यास में तुम हो

आँखों के आँचल में तुम हो

कैसे कहूं हर पल में तुम हो”

सबकी नज़र बचाकर मैंने वो कविता उसके बैग में डाल दी. कागज़ के पीछे अपना फ़ोन नंबर भी लिख दिया कि कहीं अमन भूल न जाये. उसकी अपने साथ वाली फोटो भी रख दी, जिसे वो लेने से इनकार करता रहा था.

मैं उसे स्टेशन छोड़ने गयी. इतने दिनों तक मैंने उसे तंग किया था, आज उसने सूद समेत मुझे दुःख पहुँचाया था. जी चाहता था कि उसे कुछ दिन और रोक लूँ. जब ट्रेन आहिस्ता-आहिस्ता चलने लगी तो उसने पुछा – ‘फिर मिलेंगे न?’

मैंने कोई जवाब नहीं दिया. आँखें बंद कर ली, क्योंकि उसे जाते हुए नहीं देख सकती थी. अचानक न जाने क्या हुआ, मैंने दीदी को पकड़ लिया और फूट-फूट कर रोने लगी. दीदी ने कहा – ‘रोना किस बात का? अब तो तुझे उसी की दुल्हन बनना है.’

मैंने आश्चर्य से सर उठाया. मुस्कुराते हुए वे बोलीं – ‘मैंने सारी बात कर ली है. मम्मी-पापा से भी और अमन से भी. देख, वो तुझे देखकर मुस्कुरा रहा है.’ मैंने भाव-विभोर होकर उन्हें जकड़ लिया.

मुझे भरोसा था कि वो मेरी कविता पढ़ेगा, भरोसा था कि मुझे फ़ोन करेगा, भरोसा था कि गुलाब के पौधे में फूल खिलेंगे. मुझे पूरा भरोसा था कि वो मेरा बनेगा. भरोसा दृढ था, अटल था, किन्तु सिर्फ तब तक, जब तक यह फ़ोन नहीं आया था. उसकी मौत की खबर थी. रेल पुल पर दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी. एक राहतकर्मी को उसके बैग से एक कागज़ का टुकड़ा मिला, जिसपर एक फ़ोन नंबर लिखा हुआ था. वह फ़ोन नंबर मेरा था. उसी ने ये दुखद सूचना दी.

मेरे पहले प्यार का इज़हार अधूरा रह गया, मेरी कविता अनपढ़ी रह गयी, मेरी दुनिया वीरान हो गई. अब अमन इस दुनिया में नहीं है. जीने का सहारा सिर्फ उसकी यादें हैं. अब भी उसका चेहरा मेरे सपनों में आएगा, अब भी उसका प्यार मुझे पुकारेगा, पर इज़हार का मौका दोबारा नहीं आएगा.

और वो गुलाब का पौधा – अभी उसमें फूल खिलना बाकी है.

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