मेरे होंठों पर सजती तुम्हारी बतकही
अर्पण कुमार

अपने होंठों पर
जब जीभ फिराता हूँ...
स्वाद आते हैं
तुम्हारी बतकही के
कितना मादक और आत्मीय है
तुम्हारे शब्दों को यूं
मिसरी की तरह उतारना
अपने भीतर

बरसाती अंधेरी रातों में
जब मैं घूमता हूँ
आवारा शहर की
काली चमकती सड़कों पर
ये तुम्हारे ही शब्द हैं
जो बुदबुदाते हैं मेरे होंठों से
विरह और मोहभंग की
लंबी रात को छोटी कर जाते हैं
तुम्हारे अनकहे ये शब्द
उच्चरित होकर अस्फुट
मेरे होठों पर
....

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