कहते है जमाना जब करवट बदलता है तो समय का चलन भी बदल जाता है। नये फैषन, नये तौर तरीके और सब कुछ नया। लोग पुराने संस्कारों से बाहर निकल कर नये नियम अपनाने लगते है। यह कोई जरूरी नहीं कि यह कदम सदा सराहनीय ही हो कभी दृ कभी विपरीत परिणाम भी देखने को मिलते है।
आजकल एक नया फैषन चला है -‘रिलेषनसिप’, नये जमाने का नया समझौता। युवा वर्ग का एक अनोखा प्रयोग। बगैर विवाह के एक साथ रहना। एक दूसरे को अच्छी तरह समझने . बुझने के लिए। ताकि जिंदगी के अंतिम समय तक रिष्ता बना रहे।
ऐसे चलन के कई कारण है, पर कुछ कारणों पे प्रकाष डालना आवष्यक है । काफी अरसे तक रूढीवादी परिवार लड़का या लड़की की सहमति के बगैर एक दूसरे को विवाह के बंधन में जकड़ देते हैं। तब न चाहते हुए भी दोनो को अनचाहे समझौते करने पड़ते हैं। कभी दृ कभी विचारों मे मेल नहीं खाने की वजह से जिंदगी तब बोझ बन जाती है और बात तलाक तक पहुंच जाती है।
महानगरों में आवास की काफी विकट समस्या है। जब कोई भी युवक या युवती रोजी रोटी की जुगाड़ में महानगर में आता है तो नौकरी तो झट से मिल जाती है पर मकान नहीं। सरकारी महकमे में काम करने वाले लोगों का जब तबादला होता है उन्हें भी इन्हीं समस्याओं में जूझना पड़ता है। महानगर के मकानमालिक भी कुंआरो या बैचलर को जल्द किराये पे मकान नहीं देते। एक परिवार को किरायदार बनाना उन्हें ज्यादा सुरक्षित लगता है। मतलब महानगर में किराये पे मकान लेने के लिए विवाहित होना आवष्यक है। तब आपकी समस्या जल्द सुलझ जाती है।
इन झंझटों से छुटकारा पाने के लिए कई युवक . युवतियों ने पति. पत्नि होने का नाटक कर अपनी समस्या सुलझाने लगे। कई बार वे सफल भी हुए और रिष्ता हकीकत में बदल गया। पर कई बार लेने के देने पड़ गये। फिर भी सभ्रांत परिवार वालों ने ‘रिलेषनसिप’ के चलन को अपनाने लगा।
मुंबई जैसी महानगरी में भी आवास की समस्या का षीघ्र समाधान नही होता क्योंकि बैचलर को कमरा मिलना जरा मुष्किल होता है। परंतु एक अवैघ रिष्ते को सामाजिक सुरक्षा की दृश्टि से पनाह देने में लोग हिचकिचाते नहीं।
आर्दष कॉ. हाऊसिंग सोसायटी में किराये के फ्लैट में मि. अजय और मिस. मोनिका आराम से ‘रिलेषनसिप’ के तहत एक साथ रह रहे थे। दोनो अच्छी कंपनी में अच्छे पोस्ट पे थे। अतः रहन दृ सहन में ठाट थे। विवाह के बंधन में बंधने के पहले एक दूसरे के विष्वास, सहनषक्ति और मर्यादा को परखना चाहते थे। अतः अजय देर रात तक काम में व्यस्त रहता। मोनिका की पूछताछ के पहले ही एक स्पश्ट बयान दे देता - कंपनी के बिजनेस मिंटिग मेंं व्यस्त रहता हूं... बॉस मेरी काबलियत को परख रहे है। भविश्य में पदोन्नति की संभावना है इसलिए भरपूर मेहनत कर रहा हूं।
मिस मोनिका को भी अक्सरहा देर रात कोई न कोई कार से घर तक छोड़ जाता। नाईट क्लब की षौकिन दृ मोनिका जीवन में भरपूर इंज्वाय करना चाहती। तब अजय एक अधिकारिक पति की तरह गरजना चाहता पर तुरंत खामोष हो जाता। रिलेषनसिप में मात्र समझौता होता है, अधिकार नहीं.
मोनिका एवं अजय के माता-पिता को दोनो का साथ-साथ रहना पसंद नहीं था। आधुनिक युग में लड़का-लड़की के प्यार को वो मान्यता तो दे चुके थे। धीरे-धीरे कई परिवार लड़का-लड़की के आपसी पसंद को अपनी स्वीकृती प्रदान कर षादी के बंधन में बांध देते। पर ‘रिलेसनषिप’ का तरीका उन्हे पसंद नहीं है।
हो सकता है आने वाले दिन में ऐसा भी हो कि पहले लोग साथ रहेंगे और बच्चा भी पैदा करेंगे। अगर लड़का हुआ तो लड़की से षादी कर लेगे और गर लड़की हुई तो संबध विच्छेद कर लेंगे। अगर इंसान हर कार्य अपनी सुविधा एवं स्वार्थ के लिए करें तो फिर सामाजिक मर्यादा, संस्कार एवं रिष्ते की महत्ता कहां रहेगी।
परंतु मोनिका एवं अजय को अपने माता-पिता के उपेक्षा की परवाह नहीं। वो दोनो इसे दकयान्सी सोच समझते। अतः उनके असहमति के उपर अपना निर्णय थोप दिया तब दोनो के माता-पिता बिल्कुल खामोष हो गये।
दोनो को अपनी स्वछंद जिंदगी रास नहीं आ रही थी। मन में एक चोर घर करने लगा था। कुछ तो छिपाया जा रहा है ........ कहीं न कहीं ज्यादती हो रही है ...... मर्यादा का उल्लघंन हो रहा है ..... रिष्ते की परवाह कम और महत्वकांक्षा की फिक्र ज्यादा है।
अजय को तब अपने मम्मी-पापा की याद आ जाती। देर रात तक पापा के लिए मम्मी का इंतजार करना। रात का खाना पापा के साथ खाना। पापा के चेहरे पे षिकायत के भाव को पढ़कर सारे षिकवे षिकायत भूल जाना। वो करवा-चौथ का व्रत, बच्चों की खुषियों के लिए अपनी फरमाईषे भूल जाना। पापा के बनाये साड़ी के बजट में से एक षर्ट भी ले लेना। अजय को भी सब सही लगता। पति.पत्नि एक दूसरे के दर्द एवं जरूरतों को नही समझेंगे तो दूसरा कौन समझेंगा। क्या सिर्फ नौकरी करने से ही रिष्तों की परिभाशा बदल जाती है। आज के जमाने में अधिकतर औरतें नौकरी करती है। इससे उसके परिवार को आर्थिक मदद मिलती है। ताकि जीवन खुषी से गुजर सके। अगर भविश्य में कोई दुर्घटना घट गई तो दूसरों का मोहताज न होना पडे़। पर अधिकतर औरते नौकरी करके मौज . मस्ती से जीना चाहती है। मोनिका भी उन्ही में एक है।
तब रिलेषनसिप का समझौता एक बोझ महसूस होने लगा। आखिर एक दिन षराब के नषे में धुत अजय का आक्रोष फूट ही पड़ा - मोनि..तुम बहुत गुलछर्रे उड़ा रही हो ..... मेरी तुम्हे कोई फिक्र नहीं..... यू आर नॉट फिट फॉर वाईफ ..... सारी जिंदगी साथ गुजारना संभव नहीं ..... मेरी तो पदोन्नति हो चुकी है और जल्द ही कंपनी की तरफ से कनाडा जाने वाला हूं ...... नाऊ, आई हैव टू थिंक फॉर माई स्टेटस“।
मोनिका भी तब नहले पे दहला फेंकती हुई बोली - ”मैं भी बड़ी मुष्किल से तुम्हारे साथ एडजस्ट कर रही थी ......... तुम एक कामयाब इंसान जरूर हो पर एक सफल पति नहीं। ‘वो’ पति ही क्या जिसके पास पत्नी के लिए न समय हो और न ही प्यार। ऐसे में प्यासी आंखो को कोई न कोई तृप्ति प्रदान करने वाला मिल ही जाता है। तुम्हारे अंदर मात्र .प्रॉमिष है पर प्यार, पावर और प्यास नहीं। मैं संडे तक यहां से सिफ्ट कर रही हूं। लोखंडवाला कॉम्पलेक्स में फ्लेट गिफ्ट में मिला है। कनाडा जाने के पहले मेरी सगाई में अवष्य षामिल होना। तुम्हारा ही बॉस मि. मल्होत्रा मेरे भावी पति है।
तब अजय के पैरो तले जमीन खिसकती नजर आई। रिलेषनसिप बस दर्द का सीप बन गई जिसे खामोषी के साथ पीने के बगैर कोई चारा न रहा।
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