ब्रह्मप्रेतों का अति खौफनाक कृत्य

कुछ अपने आपको ज्ञानी-विज्ञानी मानने वाले कहते हैं कि भूत-प्रेत, चुड़ैल, डाकिनी, जिन्न आदि बस कहानियों में ही अच्छे लगते हैं, इनका कोई अस्तित्व नहीं। पर मेरा मानना है कि पृथ्वी पर अनेकानेक रूपों में अनेक जीव पाए जाते हैं, कुछ ऐसे भी जिन्हें विज्ञान एककोशीय, अकोशीय, जीवाणु, विषाणु आदि संज्ञाओं से विभूषित करता है। कुछ सूक्ष्म जीवों को नंगी आँखों से देखा ही नहीं जा सकता, इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी आदि की आवश्यकता होती है। साथ ही बहुत सारे रहस्यमय जीवों से भी यह दुनिया भरी पड़ी है। जैसे कुछ जीव नंगी आँख से दिखाई नहीं देते वैसे ही कुछ ऐसी आत्माएँ भी होती हैं जिन्हें नंगी आँखों से तब तक नहीं देखा जा सकता, जब तक वह आत्मा खुद न चाहे या आपमें सूक्ष्मदर्शी जैसी कोई शक्ति न हो, आत्मबल न हो, किसी विशेष देव-देवी की कृपा न हो। हाँ पर कभी-कभी ये प्रकट न होकर भी अपने अस्तित्व का एहसास करा जाती हैं। हाँ यह भी सत्य है कि बुरी आत्माएँ अधिकतर कमजोर दिल वालों को, गंदे रहने वालों को ही अपना निशाना बनाती हैं तथा साथ ही पूजा-पाठ करने वाले, स्वच्छ रहने वाले, निडर लोगों के पास यह बुरी आत्माएँ जाने से डरती हैं। पर कुछ आत्माएँ ऐसी भी होती हैं जो किसी से भी नहीं डरतीं, कहीं भी बेरोक आती-जाती रहती हैं। इसका कारण यह है कि जैसे कोई निडर व्यक्ति, धर्मपरायण व्यक्ति आदि अकाल काल के गाल में समा जाता है तो जब तक उसकी आत्मा का उद्धार नहीं होता, वह भटकता रहता है पर बेखौफ होकर।

सभी आत्माएँ बुरी भी नहीं होती, कुछ अच्छी भी होती हैं। दरअसल यह इनके आत्मा (भूत-प्रेत, ब्रह्म, जिन्न, चुड़ैल आदि) के रूप में आने से पहले यानी कहने का तात्पर्य है कि अकाल मौत से पहले ये जिस रूप में, जिस स्वभाव के, मनुष्य या किसी अन्य जीव के रूप में होते हैं, मरने के बाद भी अधिकतर अपने उसी व्यवहार का उपयोग करते हैं पर साथ ही इनके अकाल मृत्यु का कारण क्या था, वह भी इनके स्वभाव में बदलाव को प्रभावित करता है। अगर किसी को जानबूझकर किसी दुश्मनीवश हत्या कर दी जाती है तो वह व्यक्ति अच्छा रहने के बावजूद, मरने के बाद उसे मारने वालों या उनके परिवार के लोगों को सताता है और यह भी हो सकता है कि वह अपने लोगों का भला करे, क्योंकि कई प्रेत ऐसे होते हैं जो अपनों का कुछ नहीं बिगाड़ते और फायदा ही पहुँचाते हैं।

मूल कहानी शुरू करने से पहले मैं आप लोगों को एक भूतही घटना सुनाता हूँ, जिसे मैंने कई बड़-बुजुर्गों से सुना हूँ। हमारे जवार (क्षेत्र) में एक पंडीजी थे, जो जादू-टोना में सिद्धहस्त थे, बहुत कुशल तांत्रिक माने जाते थे। कहा जाता है कि ये पंडीजी अपने तंत्र-मंत्र के बल पर, पूजा-पाठ के बल पर एक भूत को अपने कब्जे में कर लिए थे। ये उस भूत से उसकी क्षमता अनुसार काम करा लेते थे जैसे कि किसी के बखार से धान-गेहूँ निकलवा लेना, किसी दुकान से दिन-दहाड़ें बिना दुकानदार के जाने कोई वस्तु चुरवा लेना आदि-आदि। कुछ लोग तो कहते हैं कि पंडी जी खेती-बारी का काम भी उस भूत से करा लेते थे, जैसे की ढेंकुलि से खेत में पानी चलवाना यानी खेत की सिंचाई, खेत के आड़-मेड़ की झँटाई तथा कोन-आदि को कोड़ना आदि। एक सुनी घटना याद आ रही है। आप भी सुन लें। पंडीजी के गोयड़े के खेत में एक कुआँ था, जिस पर सिंचाई के लिए ढेंकुलि लगी हुई थी। एकदिन भिनसहरे कुछ महिलाएँ खेतों की ओर (आज भी कुछ गाँवों आदि में बहुत ही सुबह, यानी भिनसहरे बहुत सारी महिलाएँ शौच के लिए खेतों में ही जाती हैं) जा रही थीं तो एक महिला क्या देखती है कि पंडीजी के खेत के कुएं पर लगी ढेंकुलि अपने आप बहुत तेजी से चल रही है और पानी निकाल-निकालकर नाली में डाल रही है, और वह पानी नाली के रास्ते पंडी के खेत में जा रहा है। वह बहुत डर गई और सहमे हुए कुछ और औरतों को यह दृश्य दिखाई। कुछ औरतें तो यह देखकर चिल्लाने लगी तभी ढेंकुलि का चलना बंद हो गया और खेतों की ओर से पंडीजी भी दौड़कर आ गए, साथ ही गाँव के दो-चार और लोग आ गए। जब महिलाओं ने यह बात बताई तो पंडीजी तड़ाक से बोल पड़ें, अरे मैं ही तो था, आधी रात से ही आकर ढेंकुलि चला रहा हूँ, शायद अंधेरे के कारण तुम लोग मुझे देख नहीं पाए होगे। पर गाँव के कुछ बड़-बुजुर्गों को समझते देर नहीं लगी कि पंडीजी का भूत ढेंकुलि चला रहा था।

ऐसे बहुत सारे किस्से हैं, उस भूत के बारे में। एक बार तो एक दुकानदार को वह भूत इतना परेशान कर दिया कि उस दुकानदार को आकर पंडीजी से माफी माँगनी पड़ी और एक जोड़ी पियरी (पीले रंग में रंगी हुई) धोती भी देनी पड़ी, तब जाकर उस भूत ने उस दुकानदार का पीछा छोड़ा था। दरअसल हुआ यह था कि पंडीजी अपनी लड़की की शादी में उधार पर कुछ कपड़े लिए थे। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि पंडीजी ने अपनी लड़की की शादी में कई कपड़ों, गहनों की दुकानों से बहुत सारा सामान उस भूत से चुरवाया था पर समाज, गाँव-हित को दिखाने के लिए कुछ सामान उधार भी लिए थे ताकि लोगों को सच्चाई का पता न चले। तो हाँ, जिस दुकानदार से पंडीजी कुछ कपड़ें उधार लिए थे, कुछ समय बीतने के बाद वह तगादा (अपना पैसा वापस करने के लिए दबाव डालना) करना शुरू किया। पंडीजी आज-कल करते रहे। एकदिन दुकानदार का मुनीब (मुनीम) आया और पंडीजी की गाय खोलकर लेकर चला गया। शायद पंडीजी घर पर नहीं थे। जिस दिन वह गाय उस दुकानदार के घर पर गई उसी दिन अचानक उस दुकानदार के घर में आग लग गई। खैर इतना तक तो ठीक था पर अब धीरे-धीरे उस दुकानदार की परेशानी बढ़ने लगी। कभी उसकी दुकान से कपड़ों का कोई गट्ठर गायब हो जाता तो कभी-कभी उसके रुपये-पैसे रखने वाले कठ-बक्से से रुपये-पैसे। उसे पता ही नहीं चलता कि यह कैसे हो रहा था। वह बार-बार अपने यहाँ काम करने वाले लोगों पर चिल्लाता। धीरे-धीरे उसके वहाँ काम करने वाला भी कोई नहीं बचा और ग्राहक भी आने बंद हो गए क्योंकि कुछ ग्राहक बताते थे कि उसकी दुकान में जाकर बैठने पर अजीब लगता। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि कोई अदृश्य शक्ति है जो जबरदस्ती बैठे ग्राहकों को उठा रही है या इधर-उधर खींचकर परेशान कर रही है। अब तो वह दुकान ही टूटने के कगार पर पहुँच गई फिर कुछ लोगों ने कहा कि उस पंडीजी की गाय वापस करके, उनसे माफी माँग लो तो शायद सब ठीक हो जाए। उस दुकानदार ने वैसा ही किया, उसने पंडीजी की गाय वापस करने के साथ ही उनका कर्ज भी माफ कर दिया और सपरिवार एक जोड़ी पियरी धोती और ग्यारह रुपए पंडीजी के पैर पर रखकर उनका पैर पकड़ लिया। अब क्या, धीरे-धीरे उस दुकानदार की दुकानदारी पटरी पर लौट आई।

आइए अब देर न करते हुए मैं ब्रह्मप्रेतों के अति खौफनाक कृत्यों से भी आप लोगों को परिचित करा देता हूँ। हमारे ही जवार (क्षेत्र) की घटना है। वैसे इस घटना को घटे लगभग 80-90 साल हो गए होंगे। उस समय एक बहुत ही नामी पंडित हुआ करते थे हमारे जवार में। दस कोस की एरिया में उनका काफी नाम था। वे ज्योतिष, तंत्र-मंत्र के बहुत ही अच्छे विद्वान माने जाते थे। लोग घर आदि बनवाने से पहले उनसे सलाह लेते थे और साथ ही पूजा-पाठ के लिए उन्हें ही आमंत्रित करना चाहते थे। पंडीजी धनी-मानी तो थे ही साथ ही अच्छे खेतिहर भी।

एक बार की बात है कि पंडीजी के गाँव का ही घनेसर नामका एक आदमी पंडीजी के पास आया और कहा कि महराज, मेरा परिवार काफी बड़ा हो गया है और खाने के लाले पड़ने की नौबत आ गई है। पंडीजी बहुत ही दयालु स्वभाव के थे, उन्होंने तुरंत उसे दो बिघे जमीन बँटाई के रूप में जोतने-बोने के लिए दे दी। धीरे-धीरे समय बितता गया और इधर घनेसर के मन में भी लालच समाने लगा। घनेसर ने धीरे-धीरे करके पंडीजी को उनके खेत से बँटाई का हिस्सा देना बंद कर दिया। एकबार पंडीजी ने घनेसर से इस विषय पर बात की तो घनेसर तैश में आकर बोल दिए कि अब वह खेत मेरा है और मैं आपको बँटाई-ओंटाई कुछ नहीं देन वाला हूँ, आप की जो मर्जी आए कर लो। अरे यह क्या अभी पंडीजी और घनेसर में यह बात हो ही रही थी तभी घनेसर के तीनों बेटे हाथ में लाठी लिए वहाँ आ गए और बोले कि अगर पंडीजी अब खेत के बारे में एक शब्द भी बोलोगे तो पीट-पीटकर अधमरा कर देंगे। हल्ला सुनकर गाँव के कुछ और लोग भी आ गए बीच-बचाव करके झगड़े को शांत कराया गया।

उसी दिन रात की बात है, घनेसर के घर में जो खाना बना वह कोई खा नहीं पाया क्योंकि खाने को जब थाली में परोसा जाता था तो थाली में वह कच्चा मांस, खून आदि बन जाता था। घनेसर और उनके परिवार वाले यह बात समझ नहीं पाए कि ऐसा क्यों हो रहा है। जब यह बात उन लोगों ने पड़ोसियों को बताई और परोसी हुई थालियाँ दिखाई तो पड़ोसी हँसने लगे, क्योंकि उन लोगों को थाली में खाना यानी भात-तरकारी, रोटी आदि ही दिख रहा था जबकि घनेसर और उसके घरवालों को कच्चा मांस आदि। इसके बाद पड़ोसियों ने घनेसर और उसके घरवालों को अपने घर पर खाना खिलाया। अरे यह क्या, उसी रात जब घनेसर सपरिवार सो रहे थे तो उनके घर पर ईंट-पत्थर चलने की आवाज आने लगी। वे लोग हड़बड़ाकर जग गए और लाठी निकालकर ईंट-पत्थर फेंकने वालों को खोजने लगे पर कोई नहीं मिला और इधर इनका खपड़ैल का घर तहस-नहस हो गया था क्योंकि छत की सारी खपड़ैल फूट चुकी थीं।

यह वाक्या हर रात होने लगा और घनेसर का परिवार अब पूरी तरह से खौफ में जीने लगा। अंत में गाँव के ही कुछ लोगों ने कहा कि उस पंडीजी से इसका समाधान पूछते हैं। अंत में न चाहकर भी घनेसर उसी पंडीजी के पास गए। पंडीजी पूजा में लगे थे। घनेसर ने सारी बात बताई। पंडीजी बोले कि घनेसर अब आपको यह गाँव छोड़कर दूसरी जगह जाकर बसना होगा नहीं तो आप और आपका परिवार सही-सलामत नहीं बचेंगे। घनेसर तो अब पूरी तरह से परेशान होकर गिड़गिड़ाने लगे कि पंडीजी आपकी शरण में हूँ कोई रास्ता निकालिए। पंडीजी बोले कि मैंने कुछ नहीं किया है और मैं किसी का बुरा भी नहीं चाहता हूँ पर क्या करूँ, चाहकर भी आपको इस विपत्ति से छुटकारा नहीं दिलवा सकता।

उसी दिन शाम को गाँवभर के बड़-बुजुर्ग, उस पंडीजी के दरवाजे पर एकत्र हुए और पंडीजी से विनती किए कि घनेसर को माफ कर दें। पंडीजी ने कहा कि मैं घनेसर पर थोड़ा गुस्सा तो था पर अभी जो इनके साथ हो रहा है, वह मैं नहीं करवा रहा। फिर पंडीजी ने आगे बताया कि मेरी जमीन हड़पने और मुझपर लाठी तानने के कारण अपने गाँव के डिह बाबा घनेसर से पूरी तरह रुष्ट हो गए हैं और उन्होंने अब गाँव में कुछ ब्रह्मप्रेतों को बुला लिया है। वे ही ब्रह्मप्रेत घनेसर को परेशान कर रहे हैं। फिर पंडीजी ने कहा कि मैं आप लोगों को बिन बताए डिह बाबा से काफी विनती की कि घनेसर को माफ कर दें पर उन्होंने कहा कि अब उसको कभी माफी नहीं मिलेगी, क्योंकि उसने गाँव के ही आप जैसे अच्छे आदमी का दिल दुखाया है। फिर मैंने बहुत विनती की तो उन्होंने कहा कि जब तक घनेसर यह गाँव छोड़कर नहीं जाता उसे परेशानियाँ झेलनी ही पड़ेगी और बहुत जल्द ब्रह्मप्रेत उसे पूरी तरह से तबाह कर देंगे।

खैर अब तो यह आए दिन की बात हो गई थी। प्रतिदिन घनेसर के साथ, उसके परिवार के साथ कुछ बुरा घटने लगा और बुरा करने वाला भी दिखाई नहीं दे रहे थे। एक दिन घनेसर के घर में अपने आप आग लग गई, सारा समान स्वाहा हो गया। एक दिन घनेसर के एक जोड़ी बैलों को पता नहीं कौन सी बिमारी लग गई कि उनके आगे जो भी खाने को रखा जाता, वे सूँघकर छोड़ देते। कितने सोखा-गँवई डाक्टर को दिखाया गया पर बैलों ने खाना-पीना ही छोड़ दिया और एक दिन ऐसा भी आया कि एक-दो दिन के आगे पीछे ही उनके दोनों बैल काल के गाल में समा गए। कुछ दिनों के बाद की बात है, घनेसर का एक दो वर्ष का नाती रात को घर में अपनी माँ के पास सोया था तभी पता नहीं वह कैसे गायब हो गया। अचानक उसकी माँ जगी तो देखती है कि उसका लड़का नहीं है। फिर घर में उसकी तलाश शुरू हो गई, रोअन-पीटन मच गया। पूरा गाँव जमा हो गया। सभी लोग इधर-उधर उसे खोजने लगे तभी उसे एक कुएँ के पास ऐसे ही सोए-सोए खेलते हुए पाया गया। उसी साल घनेसर भी गाँव से काफी दूर एक बगीचे में एक पेड़ पर लटके हुए पाए गए। लोगों को आज भी पता नहीं चला कि घनेसर ने आत्महत्या की थी या ब्रह्मप्रेतों न ही उन्हें सजा दी थी।

घनेसर के बेटों के अनुनय पर पंडीजी पूजा-पाठ करते रहे पर घनेसर का घर उजड़ता रहा और एक दिन घनेसर के बेटों को अपनी सारी संपत्ति बेचकर दूसरे गाँव में आना पड़ा। इस गाँव में ब्रह्मप्रेतों का आतंक थोड़ा कम हो गया था फिर भी हप्ते-दो हप्ते में कोई ऐसी घटना घट जाती कि घनेसर के बेटे और उसके परिवारवालों की नींद उड़ जाती। वे भयभीत हो जाते। यह सिलसिला सालों-साल चलता रहा पर धीरे-धीरे कम हो गया। कहने वाले तो आज भी कहते हैं कि कभी-कभी घनेसर के बेटों के घर के पास अजीबो-गरीब आवाजें सुनाई दे जाती हैं। खैर आज घनेसर नहीं हैं और उनके लड़के भी पूरी तरह से बुजुर्ग हो गए हैं। उनके नाती भी कमाने-धमाने लगे हैं और हर वर्ष काफी पूजा-पाठ भी करते हैं पर इन ब्रह्मप्रेतों के आतंक का सामना उन्हें साल में एक-दो बार करना ही पड़ता है। जय-जय।

प्रभाकर गोपालपुरिया


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