#तीसरीकसमके50वर्ष #50YEARS0FTEESRIKASAM

चोर बाजारी का माल इस पार से उस ओर बाहर से भीतर करने का काम ! उफ़्फ़ ! बैलगाड़ी को रात-बिरात इ पुलिसिया लोग अपने दारोगा जी के हुकुम पर जाने कौन-कौन करम न कर दें. हीरामन पिछली रात में ही बच-बचा कर कैसे छिप-छिपा कर एक ही साँस में सरपट अपनी जान बचा कर भागा था. अपने गाँव-घर पहुँच कर अँधियारे में जो अपनी खटिया में समाया तो अगले दिन सूरज के ओसारे तक चढ़ आने पर ही आँखे खुली. पहली कसम खाया हीरामन ने उठते ही. अब कभी भी अपनी गाड़ी में चोरी का सामान नहीं लादेगा.
पर, आफत-मुसीबत भला एक कसम से टल जाए तो फिर भला ओका मुसीबत कौन कहे. इस बार भाड़ा आया बाँस लदनी का. हीरामन का मन तो नहीं मान रहा था पर भाड़ा मन माफिक मिल रहा था सो हाँ बोल दिया. गाड़ी में चार हाथ अगुवा और चार हाथ पिछुवा निकला पड़ा बाँस रास्ते भर जोखिम को न्यौता दिए चल रहा था. कितनों बचते-बचाते चलो मगर राहगीर कब चपेट में आ जाए, का पता. हुआ यूँ कि सामने घोड़ागाड़ी की छतरी अगुवा बाँस के कोरे में जो फँसी तो सब कुछ गड्मगड्ग हुई गवा. बस, इहाँ दुनों गाड़ी भिड़ी और उहाँ इ दुनों महाराज आपस में गुथ्थम्गुथ्था हो गए. हीरामन का आदर-सत्कार गाली-गलौज और जी भर धुनाई से कर दिया. अब दूसरी कसम खा ली हिरामन ने कि कभी बाँस की लदनी नहीं करेगा अपनी गाड़ी पर.
इस दूसरी और तीसरी कसम के बीच के अन्तराल में घटित कथा ने हीरामन की ज़िन्दगी में हीरा की असल चमक से जो उजार भरा वह ही कहानी का ऐसा रस अपने में घोले है जो जीवन को फेनूगिलासी सा सुख दे गया. अब की बार कम्पनी-नौटंकी की सवारी मिल गयी हीरामन को. रास्ते भर बैलगाड़ी में हिचकोले ले-ले कर मन में जो उमँग फूट पड़ रही थी हीरामन के करेजवा मा ओकी पहली गुदगुदी तब मिली जब गाड़ी में बैठी जनाना सवारी ने उससे उसका नाम पूछा. जी, हीरामन नाम है हमरा. अरे, तब तो तुम-हम मीता हो गए. सवारी ने अपनी महीन आवाज़ में आगे कहा कि उसका नाम भी हीरा है. जैसी खूबसूरत बोली वैसी ही परी सी सुन्दर हीराबाई को देख-सुन कर निहाल हो गया हीरामन मन ही मन. हीराबाई भी समझ गयी इस हीरामन को कि यह तो वाकई दिल से हीरा है. रास्ते भर बतियाते, किस्सा-कहानी सुनते-सुनाते और फूल की खुशबु संग देह की गमक भीतर तक खोंसे हुए मनवा ने प्रेम के अढाई आखर भी पढ़ लिए. ऐसे में पिरितिया के गीत गुनगुनाते हुए जब हीरामन ने अपनी तान छेड़ी तब बाई के इसरार पर उसने अपनी ही पीर को गीत में ढाल दिया – सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग न बाँचे कोय.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म का ग्रामीण संस्कृति और इसकी लोक कला में रचा-बसा आकर्षण नौटंकी के खेल में खिल कर उजागर हुआ है. रास्ते में महुआ घटवारिन का गीत सुनाते हुए हीरामन ने ‘दुनियाँ बनाने वाले’ के मन में समाई होनी-अनहोनी की व्यथा जब हीराबाई के सामने परोस दी तब छाती की पीर हलक में आ कर जैसे अटक सी गयी. ‘सजन रे झूठ मत बोलो ख़ुदा के पास जाना है’ का सत्य अब हीरामन के होठों पर मचल उठा. मन में उग आये प्रेम के अँकुर ने खिल कर प्रेम के फूल खिला दिए. इसी प्रेम ने तब हीरामन को मरने-मारने पर उतारू कर दिया जब नौटंकी में नाचती हीराबाई के लिए दो-चार अपशब्द कहा गया. प्रेम अपने विस्तार में अब अधिकार के भाव को समेट चुका था. हीराबाई का मन भी इसे खूब समझने लगा था और इस प्रेम में नीचे तक उतर कर उसमें जी भर कर डूब जाने का मन उसका भी हो चुका था पर उसे उसकी ही मन की ड्योढ़ी ने जैसे बरजोरी रोक दिया. ‘पान खाए सैंया हमार’ की चाहत भी हीराबाई के पंख को नयी उड़ान न दे सकी. प्रेम के ढेरों रंग अपने संग भाव के अनेकों काम-कामना लिए कभी हँसते-हँसाते तो कभी रोते-रुलाते रहे और सपनों के नूतन सेज भी सजाते रहे पर ‘लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनियाँ’ की मनोकामना जस की तस मन में ही रह गयी. हाँ, ब्याह करने का मन हो गया था हीरामन का. मन से बेबस हो कर भी हीराबाई बेमन हो कर बस न का अक्षर ही लिख गयी अपने मुख पर जिसे बखूबी पढ़ लिया था हीरामन की मन की आँखों ने. अब किसी नौटंकी की बाई को अपनी गाड़ी में कभी नहीं बैठाऊंगा, हीरामन ने खायी तीसरी कसम.
इस फ़िल्म में हीरामन बने राजकपूर ने ग्रामीण भोले-भाले गाड़ीवान की भूमिका में अपने हाव-भाव को बोली के लोक भाषा के कलेवर में ढाल कर जिस सहजता को अपने ऊपर ओढ़ा है वह अतुलनीय है. वहीदा रहमान की भूमिका हीराबाई के चरित्र में ढल कर जिस कौमार्य को अंगीकार किये हुए झलकती है वह नौटंकी की नृत्यांगना को भी प्रेम के पावस उजास से भिगो गयी है. कवि-गीतकार शैलेन्द्र की अपनी माटी की महक लिए फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की कहानी ‘मारे गये गुलफाम’ पर गढ़ी गयी ‘तीसरी कसम’ साहित्य और सिनेमा का अद्भुत दृश्य-परिदृश्य लिए प्रेम की एक गहन अगन सी तपन लिए है. संगीतकार शंकर-जयकिशन की सांगीतिक प्रस्तुति को इस फ़िल्म का गीत-संगीत एक नूतन आयाम प्रदान करता है जो अद्भुत है. अपने संगीत से ग्रामीण सरोकार को जिस प्रकार जीवन्त करके शंकर-जयकिशन ने परोसा है वह उनके आँचलिक लोक संगीत पर उनकी समझ और सूझ-बूझ को वैश्विक धरोहर में परिवर्तित कर गयी है. गायक मुकेश का समर्पण गायन और लोक भाव की उनकी सहज प्रस्तुति ने जिस सूक्ष्म अनुभूति को उजागर किया है उसे समझने के लिए मुकेश की तपस्या को जानना भी आवश्यक है. शैलेन्द्र की इस फ़िल्म से गहरे जुड़े हुए थे गायक मुकेश. कथाकार कमलेश्वर ने मुझसे इस फ़िल्म पर बरसों पहले की गयी चर्चा में बताया था कि मुकेश ने फ़िल्म के कथानक और उसके संस्कार से स्वयं को जोड़ने के लिए ‘रेणु’ की इस कहानी को तीन-चार बार पढ़-समझ कर उसे अपने अंतर में रचा-बसा लिया था जिस कारण वो मुकेश से हीरामन बन गए थे. इस फ़िल्म के लिए ‘सजनवा बैरी हो गए’ के समान्तर एक और गीत ‘रैना घिरी कजरारी, डरूं मैं बाँकी कुँवारी, हो रामा’ को मुकेश और शैलेन्द्र ने रचा था जिसे धुनों में पिरो कर शंकर-जयकिशन ने तैयार भी कर लिया था पर अन्ततः फ़िल्म के लिए ‘सजनवा बैरी’ का ही चुनाव किया गया. शैलेन्द्र के निधन के पश्चात् ‘तीसरी कसम’ को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का ‘राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया जिसे दिल्ली के विज्ञान भवन में ग्रहण किया था शैलेन्द्र की पत्नी ने और उन्हें वहाँ अपने साथ ले कर गए थे शैलेन्द्र के अभिन्न सखा गायक मुकेश.
भारत में कला फ़िल्मों का दौर प्रारम्भ होने से पूर्व ही पहले ‘जागते रहो’ ने और फिर ‘तीसरी कसम’ ने कला सिनेमा की कलात्मकता को जीवन्त कर दिया था. कहते हैं इस फ़िल्म के निर्माण की अवधि में हुए कटु अनुभवों और व्यवसाय के गणित से अनजान शैलेन्द्र को लगे आघात और भीतरघात के डंक ने अन्ततः उनके प्राण हर लिए थे. फिर भी शैलेन्द्र के अन्दर का जुझारूपना ही उनकी वह शक्ति थी जिसने उन्हें अन्तिम साँस तक संघर्ष की प्रेरणा प्रदान की और मरणोपरांत इसी ‘तीसरी कसम’ ने उन्हें नूतन जीवन दे कर सदा के लिए ‘अमरत्व’ का कालजयी उपहार प्रदान कर दिया.
‘वो जो एक फ़िल्म थी’ की सूत्रधार संगीता के संग आज (17 दिसम्बर 2016) एफ़ एम गोल्ड पर जीवन्त ‘तीसरी कसम’ पर की गयी चर्चा एक विशेष अवसर भी अपने साथ लिए हुए है. दो दिन पूर्व इस आयोजन की परिकल्पना संजोये एफ़.एम.गोल्ड की कार्यक्रम अधिशाषी विनीता ठाकुर (Vineeta Thakur) ने मुझे दूरभाष पर ‘तीसरी कसम’ के प्रदर्शन के तथा इसके निर्माता कवि-गीतकार शैलेन्द्र के निधन के पचास वर्ष पूर्ण होने के सन्दर्भ को रेखांकित करते हुए जब इस फ़िल्म पर बात-चीत के लिए आमन्त्रित किया तब ही मेरे मन में ‘तीसरी कसम’ के दृश्य-परिदृश्य ने जो मूर्त आकार ग्रहण किया था उसी की परिणिति है यह मेरा हृदयोद्गार. एक कालजयी कृति जो आज भी अपने सम्पूर्ण ओज के साथ दृश्यमान है.

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