लव लेटर - अखिलेश कुमार


"तड़ाक" और एक ज़ोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा और मैं सड़क से लुढ़ककर खेत में औंधे मुंह जा गिरा।
"का रे ! तैं चमार क लईका,तोर एतना हिम्मत हो गईल की तैं हमारे बहिन के लभ-लेटर देहले है रे "
"रुक जो रहुला ! अगर तैं बाबु के तनको छुअले त ठीक न होई"
"लेकिन दीदी तूँ ना समझबू , ई साला क औक़ात कईसे भईल इ कुल कईले क"
"रहुला, पाहिले तूँ इहँवा से जो त , हैं तो से बाद में बात करब।
..... और मैं अभी तक धान के खेत में पड़ा हुआ फूट-फूट का रो रहा था।
अरे रुकिए-रुकिए, ज़्यादा अनुमान मत लगाइये ये मेरा लव-लैटर नहीं था। दरअसल बात 2009 की है जब मैं ६वीं कक्षा में पढ़ता था,और तब मेरी दुनिया नन्हे "सम्राट" और "चम्पक" के इर्द-गिर्द घुमा करती थी। ये वो दिन थे जब साइकिल के रिन यानि "टीवी एन्टीना" को घुमा-घुमा कर टीवी के सिग्नल पकड़वाने में हमें महारत हासिल थी। ये वो दिन थे जब "चन्द्रकान्ता" देखकर हमें अमेरिकन VFX से भी ज़्यादा मज़ा आता था। ये वहीँ दिन थे ,जब हम किसी घिसी-पिटी फ़िल्म को भी लगातार तीन दिनों तक रात 11 बजे ''बाइस्कोप'' में देखा करते थे। और एक बात बतायें गुरु,हम भी तब टोपी लगाकर और गन्ने को उल्टा पकड़कर ,नाक में गाते हुये "हिमेश रेशमिया" बना करते थे।
और हाँ जी ये वहीँ दौर था जब तभी भी "बाप बदनाम बेटा तेरे नाम " वाली कहावत आम थी। खैर,मुद्दे की बात पर आता हूँ। दरअसल हुआ ये था की मैंने और 12वीं की रजनी दी (रजनी पाण्डेय) ने 15 अगस्त पर "Duet song" में परफॉर्म किया था और उसी समय दर्शकदीर्घा में बैठे हुये "जन्मों के प्यासे" और "परम दीवाने" मेरे सनोज भईया (बदला हुआ नाम-क्योंकि असली नाम सामने आने से पीटने का चांस है) को रजनी दीदी में उनकी "शरीक-ए-हयात" दिखीं। बस फिर क्या था टोले के एक पढ़े लिखे लौंडे से सनोज भईया ने शेरो शायरी वाली हिंदुस्तानी में एक लव-लेटर लिखवाया और अपने बड़के भइया का परफ़्यूम चुराकर कागज पर छिडककर एक प्यार भरा किस दिया, अब चूँकि मैं ही रजनी दीदी के काफी क़रीब था इसलिए मुझे "बलि का कबूतर'' बनाया गया। ख़ैर ,दो- तीन दिनों तक मेरी हिम्मत ही नहीं हुयी की मैं वो ख़त रजनी दी को दे सकूँ। आख़िरकार एक दिन मुझे मौका मिल ही गया। स्कूल की छुट्टी के बाद सहेलियों दे थोड़ा पीछे चल रहीं थीं तो मैं भी उनके साथ चलने लगा।


"और बाबू क्या हाल है(वो मुझे प्यार से अखिलेश की जगह बाबू ही बुलातीं थीं) पढ़ाई सही से चल रही है "

"हाँ दीदी,...
(कुछ पलों की चुप्पी के बाद )

"दीदी ,वो मुझे आपको कुछ.... "

"क्या मुझे कुछ "

"ये लीजिये '' और ये कहकर मैंने उन्हें वो लेटर पकड़ा दिया और सड़क के किनारे खड़ा हो गया। ख़त पढ़ते हुए उनके चेहरे पर एक साथ कई भाव आ-जा रहे थे। कुछ देर बाद उन्होंने गुस्से से तमतमाया हुआ अपना लाल चेहरा उठाया और तेज आवाज़ में पूछा की ये तुम्हें किसने दिया है।

मैं अभी मुंह खोलने ही वाला था की। .....

"तड़ाक" और एक ज़ोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा और मैं सड़क से लुढ़ककर खेत में औंधे मुंह जा गिरा।
"का रे ! तैं चमार क लईका,तोर एतना हिम्मत हो गईल की तैं हमारे बहिन के लभ-लेटर देहले है रे "
"रुक जो रहुला ! अगर तैं बाबु के तनको छुअले त ठीक न होई"
"लेकिन दीदी तूँ ना समझबू , ई साला क औक़ात कईसे भईल इ कुल कईले क"
"रहुला, पाहिले तूँ इहँवा से जो त , हैं तो से बाद में बात करब।
..... और मैं अभी तक धान के खेत में पड़ा हुआ फूट-फूट का रो रहा था।


फिर अपने "अमरीश पूरी भाई" के जाने के बाद उन्होंने मुझे ऊपर उठाया और मेरे आंसुओं से भीगे हुए गालों को चूमकर अपने सीने में छुपा लिया।


सम्प्रति-अखिलेश कुमार

History (Hons.) 2nd yr BHU

ph# 8858768939

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