नियति


सुनीता ने लजाते हुए कहा – ‘अगले मइने मेरी सादी ऍ।’

‘शादी? किसकी, तेरी?’- मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।

‘हाँ, मम्मी पापा ने कहा लड़का अच्छा ऍ।’

‘पर तू तो अभी छोटी है, इतनी जल्दी क्या है?’

‘हमारे याँ तो सादी बहोत पैलेई होजाती ऍ। आप जरूर आना।’

रामदुलारी हमारे यहाँ पिछले लगभग दस वर्षों से काम कर रही है। जब हम दूसरी कॉलोनी में रहते थे, तब से। जब इधर आये, संयोग से रामदुलारी का परिवार भी कुछ महीनों बाद ही पास ही कहीं किसी झुग्गी झोंपड़ी में आ बसा और ढूंढते ढांढते रामदुलारी ने हमारा पता कर ही लिया। दूसरी कामवाली को उसने किसी तरह हतोत्साहित करके काम छोड़ने पर मजबूर कर दिया और खु़द ही फिर काम पर लग गई। उसकी एक छोटी सी बिटिया थी, कोई तीन चार साल की, जो कभी कभी उसके साथ आजाया करती थी। बड़ी चुलबुली सी, होशियार। मेरी बेटी मिन्नी से दो तीन साल छोटी। मिन्नी ने ही बतलाया था उसका नाम सुनीता है। मिन्नी के साथ सुनीता खेला करती थी। कभी ‘बिल्ली’ बन कर मिन्नी रूपी ‘शेर’ से डर कर भागती थी, कभी उसके चाबी वाले खिलौनों को दूर से उठा लाकर उसे दे देती थी। मिन्नी अक्सर उसे टॉफ़ी और बिस्कुट दे दिया करती थी। धीरे धीरे वह लगभग रोज़ ही रामदुलारी के साथ आने लग गयी। मिन्नी के पुराने कपड़े हम उसे दे दिया करते थे जो उसे बड़े अच्छे लगते थे और वह उन्हीं को पहन कर आती थी।

पर एक दिन रामदुलारी ने बताया सुनीता को उन्होंने गाँव भेज दिया उसकी दादी के यहाँ। कई दिनों तक सुनीता की याद आती रही। मिन्नी को भी। वो अक्सर रामदुलारी से पूछती थी - ‘सुनीता कब आयेगी?’

दस साल बाद सुनीता एक दिन अचानक आई – ‘आंटी, पैचाना मैं कौन ऊं?’

हमें ज़्यादा देर नहीं लगी उसे पहचानने में। अब वह थोड़ी बड़ी होगई थी बारह-तेरह साल की। रामदुलारी चाहती थी कि उसकी जगह सुनीता ही हमारे यहाँ काम किया करे ताकि वह खुद कोई नया घर ढूंढ ले। इस बात से सुनीता बड़ी उत्साहित थी, हालाँकि हमें बड़ा संकोच होरहा था। सुनीता छोटी थी, पता नहीं काम सम्हाल पायेगी कि नहीं। उसकी पढ़ाई वगैरह का क्या होगा? फिर अब पहले वाली बात नहीं रही, मिन्नी भी बड़ी होगई थी। उसका व्यवहार भी जाने कैसा हो उसके साथ। फिर भी हमने सोचा एकाध महीना देख लेते हैं, अगर सब कुछ ठीक चलता रहता है तो कोई बात नहीं। लिहाज़ा, रामदुलारी की जगह अब सुनीता ही काम करने लगी। जल्दी ही हमें लगने लगा, शायद अब ज़्यादा अच्छी तरह काम होने लगा था। पर दुःख इस बात का था कि अपने गाँव में पिछले दस सालों में सुनीता स्कूल कभी गयी ही नहीं, और न ही उसे पढ़ने लिखने में कोई रुचि थी। कई बार मिन्नी ने उसे क,ख,ग पढ़ाने की कोशिश की, लेकिन पढ़ने के नाम से ही उसे सांप सूंघ जाता था और अकसर खिला रहने वाला चेहरा गुमसुम होजाता था। पर सुनीता को ज़्यादातर समय यहीं रहना अच्छा लगता था। कभी कभी तो वह अपने घर शाम को ही जाया करती थी। दिन में टीवी देखती थी, खाना भी यहीं खा लेती थी। हमको लगता था इसके पांच-छः भाई-बहन घर पर चिल्लपों मचाते होंगे इसलिए वो यहीं ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताना पसंद करती थी। चूँकि यहाँ सबसे इतनी घुलमिल गयी थी, हमें भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। ईमानदार थी, उसको चोरी-चकारी की कोई बुरी आदत नहीं थी, इसलिए ये चिंता भी कभी नहीं रही कि घर से कोई चीज़ ग़ायब न होजाये।

हमारे साथ बाज़ार जाना भी उसे अच्छा लगता था। सारी थैलियाँ अपने ऊपर लाद कर चलने में उसे शान महसूस होती थी, जैसे सारी शॉपिंग वह खुद करके आई है। कभी कभी एकाध फ्रॉक हमलोग उसको भी दिला देते थे और इससे उसके चेहरे पर जो खुशी झलकती थी वो देखने में बड़ा सुकून मिलता था। हमको भी सुनीता से स्नेह सा होगया था। रामदुलारी चाहती थी कि सुनीता दो-तीन घरों में और काम करने लगे। वह मुझ पर भी दबाव डालती थी कि मैं इस बाबत सुनीता को समझाऊं। बड़ी मुश्किल से सुनीता एक और घर में काम करने को राज़ी हुई, पर एकाध घंटे के बाद ही फिर काम करके लौट आती थी।

इस तरह बड़ी अच्छी तरह सुनीता ने तीन साल काम किया और अब उसने बतलाया अगले महीने उसकी शादी होने वाली है।

‘क्या करता है तेरा होने वाला दूल्हा?’ – मैंने पूछा।

“पस्चिमपुरी कालोनी में कपड़े इस्त्री करने का ई काम करता ऍ। अपने माँ-बाप के साथ वईं झोंपड़पट्टी में रैता ऍ। उसके पापा भी दूसरी कालोनी में इस्त्री का ई काम करते एं” – सुनीता ने बड़े गर्व के साथ बताया।

जब सुनीता की शादी हुई, संयोग से हम लोग वहाँ नहीं थे। रामदुलारी बतलाती थी सुनीता बहुत खुश है। लड़का भी बड़ा अच्छा है, उसका ध्यान रखता है। कुछ दिनों बाद सुनीता घर आई। उसके साथ उसका पति भी था। किशना उसका नाम था। उम्र होगी लगभग 17-18 वर्ष, अच्छा खासा, सुन्दर। हमें लगा, सुनीता भाग्यशाली थी कि उसे इतना सुन्दर और ख्याल रखने वाला पति मिला। यह संतोष की बात थी। सुनीता को देख कर भी अच्छा लगा। साड़ी पहन कर वह दुल्हन सी ही लग रही थी। उसने बड़ी सी बिंदी लगा रखी थी, लदफद गोटे वाली लाल साड़ी पहन रखी थी और चटक गहरे लाल रंग की लिपस्टिक लगा रखी थी। उसके गाल भी बेहद लाल लग रहे थे - शायद उसने जम कर रूज़ लगाया हुआ था। इस सब के बाद वह अपने आपको किसी फ़िल्मी एक्ट्रैस से कम नहीं समझ रही थी। उसे देख कर मिन्नी की हंसी छूट रही थी – बालिका वधू। लेकिन हम महसूस कर सकते थे कि सुनीता सचमुच फ़ख़्र महसूस कर रही थी अपने पति को ले कर। बार बार वह उसे ही निहारती रहती थी। अचानक यूं आजाने से हम पहले से उसके लिए कोई उपहार तो नहीं ला पाये थे - पर मेरे पास एक नई साड़ी पड़ी थी और मेरे पति के पास भी एक नया शर्ट निकल आया जो हमने उन्हें दिया। दोनों बहुत खुश हुए – हालाँकि मेरे पति चाहते थे उनकी शर्ट के बदले रुपये देना ठीक रहेगा। मैं समझ सकती थी, बड़े चाव से उन्होंने वो शर्ट अपने लिए जो ख़रीदी थी। मिन्नी को बड़ा मज़ा आरहा था - दोनों मेहमानों की तरह कुर्सियों पर बैठे थे और ठन्डे शर्बत का आनंद उठा रहे थे। बीच बीच में एक-दूसरे से कुछ मज़ाक भी कर रहे थे जिससे सुनीता कुछ शर्मा सी रही थी।

सुनीता ने बतलाया वे लोग पश्चिमपुरी की झुग्गी-झोंपड़ी ‘कालोनी’ में रहते हैं। कोशिश कर रहे हैं कि वहीँ कहीं दूसरी जगह ले लें रहने के लिए। किशना का काम ‘अच्छा’ चल रहा था – दिन भर में सौ-सवा सौ की आमदनी तो हो ही जाती थी। घर का सारा काम अब सुनीता ने ही सम्हाल लिया था और वहीँ पास के दो मकान ‘पकड़’ लिए थे जिससे उसे भी हज़ार डेढ़ हज़ार मिल जाते थे। हमें खुशी थी कि सुनीता खुश है।

लगभग एक वर्ष के बाद सुनीता अचानक ही आती दिखाई दी। दूर से उसका चेहरा वैसा ही लाल लाल सा नज़र आरहा था। उसने सलवार कुर्ता पहन रखा था। पास आई तो देखा मुंह पर और हाथ पैरों पर लाल-नीले निशान कुछ और ही क़िस्सा बयान कर रहे थे। आते ही वह रोने लगी। उसे मार पीट कर किशना और उसके माँ-बाप ने घर से निकाल दिया था। किशना ने अब दूसरा ‘नाता’ कर लिया था और वो नहीं चाहता था कि सुनीता वहाँ रहे। उसकी नई बीवी ने यही शर्त रखी थी कि उसके घर में आने से पहले सुनीता निकल जानी चाहिए। उसका मुरझाया चेहरा देख कर हमें बेहद दुःख हुआ। एक वर्ष पहले ही जो लड़की इतनी चहक रही थी और अपने पति पर न्यौछावर हुई जारही थी, उसे आज इस तरह घर से बाहर निकाल दिया गया – मारपीट कर। यह सब क्यों हुआ – उस समय न तो उसने कोई कारण बताया और न हमने ही पूछना उचित समझा। बस उसने यही कहा कि उसके मम्मी-पापा जाकर फिर बात करेंगे उन लोगों से। हमें नहीं लगता था अब कुछ होगा, जब कि लड़के ने दूसरी शादी भी कर ली थी। पर सुनीता ने कहा – ‘हमारे याँ तो कई बार ऐसा ई होजाता ऍ।’ आश्चर्य था यह सब इतनी आसानी से होजाता है। अब तक हमें रामदुलारी ने भी कुछ नहीं बताया था।

अगले दिन रामदुलारी बहुत रोई और किशना और उसके परिवार वालों को कोसने लगी। वो लोग दो चार महीने बाद ही सुनीता को दुःख देने लग गए थे, जब कि बेचारी ने चार-पांच बंगले भी ‘पकड़’ लिए थे और घर भर का सारा काम भी करती थी। जितना महीने भर में किशना कमाता था लगभग उतना ही सुनीता भी कमा लेती थी – फिर भी वो लोग हमेशा उसके साथ गली-गलौज, मारपीट करते रहते थे। उन्होंने सुनीता को डॉक्टर को दिखाया था और तब पता चला वह माँ नहीं बन सकती। कई महीनों तक तो सुनीता सब सहती रही थी और उसने अपने घर पर कुछ नहीं बतलाया – पर बाद में जब कभी वो आती थी तो उसके शरीर और मुंह पर हमेशा चोट के निशान पड़े होते थे। तब उसने सिसक सिसक कर सब बतलाया। वहीँ उसकी बिरादरी की एक लड़की से शादी करने के लिए किशना ने सुनीता पर ज़ोर ज़बर्दस्ती शुरू कर दी थी।

हमने रामदुलारी को सलाह दी कि वह सुनीता को ही हमारे यहाँ काम पर भेज दिया करे – पर सुनीता की मानसिक स्थिति अभी ठीक नहीं थी। उस सदमे से वह उबर नहीं पाई थी। घर में उसके लौट आने से उनके घर में भी जगह कम पड़ने लग गयी थी जिससे घर में झगड़े शुरू होगये थे। हालाँकि रामदुलारी समझ सकती थी सुनीता की मनोदशा, पर उसके घर वाले इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि सुनीता उनके साथ रहे। हमें यह सब सुन कर सुनीता की बेचारगी पर बड़ा तरस आता था। जो लड़की चिड़िया की तरह चहक चहक कर हमारे यहाँ उछलकूद करती थी, बाज़ार में हमेशा हमारे साथ हो लिया करती थी, घर में खुशी खुशी सारा काम करती थी, तन्मयता से टीवी देखती थी, हर काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहती थी – वही आज ‘अपने’ ही घर में गुमसुम पड़ी रहती है। अवांछित व्यक्ति की तरह। जैसे किसी के घर में कोई बाहरी आदमी घुस आये। कैसी विडम्बना थी कि जिन छोटे भाई बहनों को उसने इतना प्यार दिया था, सब उसके खिलाफ़ होगये थे, कोई भी उसके पक्ष में बोलने के लिए तैयार नहीं था। रामदुलारी बता रही थी कि वे लोग कोशिश कर रहे हैं सुनीता की शादी फिर से कहीं होजाये। हमें यह सुन कर अच्छा लगा। अभी यह लड़की कुल मिला कर सत्रह अठारह वर्ष की भी नहीं हुई और उसने इतना सब देख लिया, सह लिया। उसकी भी अपनी कुछ इच्छाएं होंगी। एक अच्छी ज़िंदगी पर उसका भी हक़ है।

एक महीने बाद फिर सुनीता आई। इस बार उसका चेहरा खिला हुआ था। उसने बताया फिर उसकी शादी की बात चल रही है। यह सुन कर हमें खुशी हुई। अभी ज़्यादा कुछ पता नहीं, पर दिल्ली में ही कहीं है लड़का। एक वकील के यहाँ ड्राइवर है। चार पांच हज़ार महीने के मिल जाते हैं। वह बहुत खुश थी। बोली - अगर उसे वो काम करने देगा तो वह भी दो-तीन हज़ार तो कमा ही लेगी। जिस चेहरे को हम हमेशा खुश देखने के आदी थे सुनीता का वैसा ही चेहरा देख कर हमें अच्छा लग रहा था। एक दो घंटे बतिया कर सुनीता वापस चली गयी। कह रही थी शादी से पहले कुछ दिन गाँव में रहेगी दादी के पास।

दो वर्ष के लिए मेरे पति को प्रतिनियुक्ति पर बाहर जाना था। यह निश्चय हुआ कि अगर मिन्नी का वहाँ किसी स्कूल में एडमिशन हो गया तो सब जायेंगे, वर्ना वो अकेले ही जाएँगे और हम यहीं रहेंगे। सौभाग्यवश मिन्नी का एक अच्छे स्कूल में एडमिशन हो गया। जाने से पहले दुःख था कि सुनीता से मैं नहीं मिल सकी। उसे शादी की बधाई, शुभकामनायें और कुछ तोहफ़ा देना चाह रही थी। मुझे मालूम था अगर मैं यह रामदुलारी को दे दूं तो यह सुनीता तक शायद ही पहुंचे। फिर इस बात से संतोष कर लिया कि वापस लौट कर ही उसको यह सब दे देंगे।

दो वर्षों के बाद जब वापस लौटे तो न रामदुलारी का कुछ पता चला न सुनीता का। हमारे यहाँ कोई दूसरी नौकरानी काम करने लगी थी। एक दिन बातों ही बातों में पता लगा वह किसी सुनीता नाम की बाल-बच्चों वाली औरत को जानती थी जो पहले उसकी ही झुग्गियों के पास कहीं रहती थी पर अब वहाँ से चली गयी थी। फिर भी वह उसके बारे में पता करने की कोशिश करेगी। यह शायद कोई और ही सुनीता थी, वर्ना दो साल में ही वह बाल बच्चों वाली कैसे हो सकती थी।

दो-तीन महीनों के बाद एक दिन अचानक सुनीता आई। उसका गला बेहद फूला हुआ था, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी थीं, आँखों के नीचे काले गड्ढे दिखाई दे रहे थे, और वह बिल्कुल मुरझा गयी थी। उसे देख कर बड़ा धक्का लगा। ऐसा लगता था वह बीस-बाईस वर्ष की युवती नहीं, पैंतालीस-पचास वर्ष की कोई अधेड़ औरत है। उसने बताया, दो साल पहले उसकी शादी होगई थी। उसका पति एक वकील के यहाँ ड्राइवर है। उसकी पहली पत्नी दो तीन साल पहले गुज़र गयी थी और उससे तीन बच्चे हैं। सबसे बड़ा तो सुनीता की उम्र का ही था, लगभग बीस-बाईस वर्ष का, उससे छोटी एक लड़की और सबसे छोटा एक लड़का जो करीब चौदह पन्द्रह वर्ष का था। बड़ी कठिनाई से हँस कर उसने बताया कि कैसे वह शादी के तुरंत बाद ही एक साथ तीन बच्चों की ‘माँ’ बन गई। मुझे उसकी हंसी पर ही रोना फूट रहा था – वह कितनी मुश्किल से अपने आपको सुखी दिखाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

मैंने पूछ – ‘तेरे गले में क्या हुआ?’

“जी, गाँठ ऍ। एक अस्पताल में एक बार दिखाया था। महंगा इलाज बताया था डागदर ने। कुछ दिन दवाई बी ली पर कोई फ़ायदा नईं हुआ। ये तो बढ़ता ई जारा ऍ।”

“तो इलाज बंद कर दिया?” – मैंने पूछा।

“हाँ जी। इन्नै कहा किसी दूसरे अच्छे डागदर को दिखायेंगे। अब तो सांस भी फूलने लगी ऍ मेरी।” – किसी तरह धीरे धीरे सुनीता बोली। कुछ देर बाद पानी-वानी पीकर वह चली गयी।

एक दिन फिर आई सुनीता। थोड़ी खुली तो उसने बताया उसके पति को घर लौटने में अक्सर देर हो जाती है। अगर जल्दी जाने के लिए वकील से कहता है तो वह उसे नौकरी से निकालने की धमकी देने लगता है। थक कर आता है तो फिर दारू की बोतल खोल कर बैठ जाता है। खाना खिलाने के लिए वह उसकी दारू खतम होने का इंतज़ार करती रहती है, पर कभी तो वहीँ लुढ़क जाता है बिना खाना खाए - पर अक्सर उसके बाद वह उसे घसीट कर बिस्तर पर ले आता है नोंचने खसोटने के लिए। अब तो उसकी सांस भी फूलने लगी है। मना करती है तो बुरी तरह पीटता है। अब तो बच्चे भी हाथ उठाने लग गए हैं उस पर। घर का काम भी बड़ी मुश्किल से होता है।

फूलती साँसों के बीच सुनीता ने बड़े दार्शनिक अंदाज़ से कहा – “आंटीजी, अब तो जो कुछ ऍ अच्छा ई ऍ। जिंदगी कट रई ऍ जैसै तैसै। अब आप ही बताओ मेरी जैसी औरत कर ई क्या सकती ऍ। भगवान नै जैसा भाग लिखा ऍ वैसा ई भोगना तो पड़ैगा ई। हाथ पैर जादा चलते नईं एं तो मैंने काम बी छोड़ दिया। इन्नैं बी कुछ नईं कहा।”

मुझको सुनीता की हालत पर बेहद तरस आरहा था और उसको सांत्वना देने के लिए ज़ुबान से कोई शब्द नहीं निकल रहे थे। लगता है नियति का कोई अन्य विधान, कोई प्रारब्ध भी होता है जिसका इस जन्म में किये किसी काम से शायद कोई सम्बन्ध नहीं होता। तभी तो हँसती खिलखिलाती मासूम बच्ची के भाग्य में जो लिखा था वह सब उसने करवाया जिसकी न उसने कभी कल्पना की थी, न वह उसकी हक़दार थी। प्रारब्ध के इस चक्र का नियंता कोई और ही होता है और इसके वशीभूत होकर हम अनजाने ही ऐसी ऐसी अच्छी या बुरी परिस्थितियों में घिर जाते हैं जो हमें अकल्पनीय सीमाओं तक उठा कर धकेल देती हैं। सुनीता का दुर्भाग्य उसे कैसे कैसे मोड़ों पर लाकर खड़ा कर रहा है और इस जटिल मकड़जाल में वह बरबस एक निरीह और असहाय पतंगे की तरह आकर फँस गई है।

थोड़ी देर रुक कर सुनीता ने फिर कहा- “आंटीजी, मेरे बड़े लड़के की सादी तै होगई ऍ। मथुरा के पास एक गाँव में बरात जायगी आठ-दस दिन मैं ई। अब तो घर मैं बी काम बढ़ गया ऍ। नए कपड़े सिलाए ऐं बच्चों के। घर की बड़ी मैं ई ऊं न, नई बऊ को सब कुछ सिखाना पड़ैगा।”

मैंने उसे बहलाने और खुश करने को कहा – ‘अरे वाह! अब तो तू सासू माँ भी बन जायेगी। चलो बहू आजाएगी तो तेरा ख़ूब ख्याल रखेगी।’

वह सिर्फ़ थोड़ा मुस्करा भर दी। जिस शारीरिक और मानसिक वेदना से वह गुज़र रही थी, इससे ज़्यादा वो कर भी क्या सकती थी। मैं उसे कुछ सांत्वना देना चाह रही थी पर जैसे सारे शब्द गले की तरह ही सूख कर गुम होगये थे। मेरी आवाज़ भी बड़ी कोशिश के बाद निकल रही थी। आँखों को मैं बह निकलने से किसी तरह रोक रही थी। मुझे लग रहा था मेरी व्याकुलता और मेरे चेहरे पर उसके लिए दया को देख कर वह और ज़्यादा दुखी हो जायेगी, जो मैं नहीं चाहती थी। अपने आप को किसी तरह सम्हालते हुए मैंने उसे खाना खिलाया और कुछ रुपये दिए जो वो लेने से मना कर रही थी। उसको मैंने एक साड़ी भी दी जिसे देख कर एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर खुशी झलकी। मैंने कहा – ‘ये गोटे और सलमा सितारे वाली साड़ी तुझ पर अच्छी लगेगी। बारात में यही पहन कर जाना सास जैसे ठाठ के साथ।’ बड़ी कठिनाई से वह फिर थोड़ा मुस्करा दी। उसको अलग से मैंने सौ रुपये दिए और ताक़ीद की कि वह रिक्शा करके जाए, पैदल बिल्कुल न जाए। वह खुश होकर चली गयी।

एक दिन हम लोग चाय पर बात कर रहे थे सुनीता की ही। अब तक उसके बेटे की शादी होगई होगी और वह खुशी से सास बनी इतरा रही होगी।

तभी घंटी बजी। बाहर रामदुलारी थी जिसने मुझे देखते ही रोना शुरू कर दिया। वह बताने लगी – “सुनीता खुशी खुशी आपकी दी हुई साड़ी पहन कर बारात के साथ रवाना हुई ही थी कि उसकी सांस बुरी तरह फूलने लगी और आवाज़ भी रुक गयी। उसके मुंह में पानी डाला पर कुछ ही मिनटों में उसकी साँस भी बंद होगई। उसके गले में कैंसर की गाँठ थी जिसकी वजह से कैंसर फेंफड़ों तक फैल गया था। पर बीबीजी, उसके मरद ने वहीं उसको नीचे सड़क पर उतार कर पटक दिया, हम लोगों को भी बस से उतार दिया और वो लोग बारात लेकर रवाना होगये। हमने ही उसका बारहवां किया पर उस दिन भी न तो उसका मरद आया, न उसके घर से कोई और आया।”

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(कमलानाथ के कहानी संग्रह "भौंर्या मो" से)

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