'अब आप यहां क्या करेंगे? मेरे साथ ही चलिए पिताजी। आप हमारे साथ परिवार में रहेंगे, बच्चे हैं,सविता है, घर की व्यवस्था है। यहां अकेले में आपको दिक्कत होगी।'

'नहीं बेटा! यहां कोई अकेला नहींहोता। इस देश की मिट्टी, पानी, हवा और धूप सब साझा करके एक दूसरे को बांध देती है। वह हंसाथा, वह तुम्हारी गुजरातन आंटी है न, आप चाहो या न चाहो वह खाखड़े तो दे ही जाएगीं। और यह पंजाबी मिसज़ भाटिया सर्दियों में हर हफ्ते या दस दिन बाद एक कटोरा साग तो भेज ही देती है। मना करो, तो कहेगी, अरे भाई साहब, आपके लिए तो बनाया नहीं, घर में बना ही था। आप भी खाइये।फिर मेरे जैसा साग कौन बनाएगा! फिर अपने ही खेतों का है। बलवीन्द्र जब भी आता है ले आता है।भाई साहब दो रोटी मक्की की भी है। अब साग है तो मक्की की रोटी भी होगी ही। हंसती हुई आती है और हंसाकर चली जाती है।यहां सब अपने ही जैसे हंै। तुम चिंता मत करो बेटा। '

'परंतु पिताजी अब आप रिटायर हो गये हंै। अकेले में समय काटना मुश्किल हो जाएगा।'

'ना-ऽ बेटा, डाॅक्टर और टीचर कभी रिटायर नहीं होता, अगर वह चाहे तो भी! हमारा काम ही ऐसा है।अब मुझे पैसों के लिए तो पढ़ाना नहीं है। फिर क्या! जिनको जरुरत हैं, पढ़ाई में कमजोर है उन बच्चों को पढाउंगा।'

विवेक उनके तर्क के सामने निरुत्तर हो गया था।

'ठीक है। पिताजी, आप अपना ख्याल रखिए। जबआपका मन करे कुछ समय के लिए आ जाईये। मैं भी आता ही रहूंगा।'

'ठीक है बेटे। खुश रहो तुम सब। मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है।'

विवेक चला गया था।मि. गुप्ता का अपना एक जीवन रुटिन था। सुबह सैर करने जाते। लौटकर नाश्ता वगैरा। कामवाली घर
का काम कर जाती थी पहले ही की तरह। फिर वह अकादमी में कक्षाएं लेने चले जाते। मैथस और साईंस के बच्चों को हमेशा अलग से कोचिंग की ज़रुरत होती है। शाम को लौटते। चाय पीकर, थोड़ी देरपार्क में जाना होता तो चले जाते। घर लौटकर रात का खाना, थोड़ी देर टीवी पर खबरें और दिन निकल जाता।

उसने देखा, नीचे वाली पड़ौसी शर्मा, आॅगन की खुली जगह पर कमरा बनवा रहे थे। एमआइजी फ्लैटस में और दूसरी ग्रुप हाउसिंग में यह एक आम बात है। नीचे का फ्लैट दो बेड रुम का था। इसमें एक और कमरा मिल जाता। कईयों ने जरुरत बढ़ने पर और कईयों ने एक कमरा और मिल जाता है इसलिए इस खुली जगह को कवर कर लिया था। छत पहली मंजिल वालों को मिल जाती। जिसे वे खुली जगह पर बैठने, धूप सेकने आदि के काम में लाते। यह व्यवस्था ऐसी ही चल रही थी। अरे, यह क्या?शर्मा ने कमरा बनवा लिया और साथ ही एक सीढ़ी लगवा ली। उस सीढ़ी पर चढ़कर तो कोई भी आसानी से उसके घर में घुस सकता था। वैसे भी इस काॅलोनी का डी ब्लाक पीछे की तरफ पड़ता है।जहां मुस्लिम कब्रिस्तान है। उजाड़ सी जगह है, जहां अक्सर असामाजिक तत्व किसी खुराफात की ताकमें रहते हैं। दिन में वे पीछे से पत्थर फेंककर घरों के शीशे तोड़ते हैं। भाग जाते हैं आज तक शिकायतकरने पर कोई नहीं पकड़ा गया। रात में फैंस लांघकर घरों में घुसने की कोशिश में रहते हैं। रात को
सुरक्षा की समस्या बनी रहती है। काॅलोनी वाले चाहकर भी विशेष कुछ कर नहीं सकते थे। काॅलोनी के अंदर वैलफेयर एसोसिएशन ने बिजली के खम्बों से खराब बल्ब निकाल कर नये लगा दिए थे। सुरक्षागार्ड को भी कहा गया था पीछे चक्कर लगाया करे। शायद सुरक्षा गार्ड खुद डरे रहते थे।उसने शर्मा से कहा था, यह सीढ़ी हटाइए, इसमें हमारे घर की सुरक्षा को खतरा हो गया है। वैसे भी कानूनन आपका इस छत पर अधिकार नहीं। सीढ़ी लगाना और भी गैर कानूनी है। यूं तो यह
कन्सट्रक्शन ही गैर कानूनी है। पर और लोगों ने किया तो आपने भी कर लिया। औरों ने छत पहली मंजिल वालों को दी। उन्होंने अपनी सुरक्षा का प्रबंध कर लिया। पर आप छत नहीं देना चाहते। ठीक है,यह सीढ़ी हटा लीजिए। शर्मा ने कुछ नहीं किया। उसे शराफत से कई बार कहा गया। आखिर पुलिस में रिपोर्ट की गई। कुछ नहीं हुआ। शर्मा पत्रकार था और क्राईम बीट पर था। पुलिसवालों को जानता था। इसलिए फोन करने पर पुलिसे वाले, देखते रिपोर्ट लिखते और चले जाते। उसने डीसीपी से शिकायत की। कुछ नहीं हुआ, उसने पुलिस कमिश्नर को चिट्ठी लिखी। तब भी कुछ नहीं हुआ। उसने आरटीआई
के अन्र्तगत चिट्टी लिखी है। उसके भीतर अकेले घर में रात को सोने में डर लगता था। पड़ौसी भी आते, सहानुभूति दिखाते। बहुत गलत है, सीढ़ी नहीं लगानी चाहिए। उसे कोई कुछ नहीं कहता। कहतेयह तो गुण्डा है। क्राइम बीट पर काम करते हुए खुद भी क्रीमनल हो गया है। वह सोच रहा था, उसका भी सुरक्षा का अधिकार है। वह मुख्यमंत्री को चिट्टी लिखेगा। मास्साहब क्या करें, इस गंुडे से कोई भी पंगा नहीं लेना चाहता। लोग इसकी न्यूजसैंस से डरते हैं। पर मैं तो नहीं डरता। जरुरत पड़ी तो
प्रधानमंत्री तक जाउंगा। आरटीआई में चिट्ठी डाली है, इंतजार कर रहा हूं।काॅलोनी के पास ही छोटी सी मस्जिद थी उसने देखा? चार-पांच महीने में ही किले की तरह उंची हो गईथी और इधर-उधर पसर गई थी। आस-पास की जमीन भी उसके घेरे में आ गई थी। जिनकी ज़मीन थी उन्होंने विरोध किया। आमने सामने की लड़ाई में खतरा था। लोगों का विरोध प्रतिरोध असमाजिक तत्वों
के कारण साम्प्रदायिक रंग ले सकता था। कानून की लड़ाई ही लड़ी जा सकती थी। उसमें भी राजनीतिक अल्पसंख्यकों को लुभाने की नीतियां। कोर्ट में वर्षों एडि़या रगड़ना। कुछ लोगों ने अपना भाग्य स्वीकार लिया था कि अब यह ज़मीन उन्हें नहीं मिलेगी। कुछ दूसरे कोर्ट में चले गए थे। मस्जिद उपर उठ गई थी। सुबह-सुबह पांच बजे अल्ला-हो-ऽ की उंची आवाज़ से शुरु हुई अज़ान दिन में पांच बार दोहराई जातीं। उसे तो अल्ला से परेशानी थी और न ही मस्जिद से। पर इस तरह दिन में पांच बार लाउड
स्पीकर पर अज़ान दी जाए, इसका क्या मतलब! ये तो ध्वनि प्रदूषण है। साथ ही आसपास के निवासियों की शांति भंग करना है। जन्म अष्टमी के दिन रात के दस बस चुके थे। मंदिर वालों ने लाउड स्पीकर लगा रखा था और भजन कीर्तन की आवाज़ें आ रही थीं। उसने पुलिस वालों को फोन किया था। वह हिचकिचाये थे। उसने कहा था आप सिर्फ लाउड स्पीकर हटवा दीजिए। बाकी माईक पर जो भी वहां बैठे लोग, जैसा चाहे करंे। पुलिसवाले मंदिर में नहीं जाना चाहते थे। उसने पंडितजी को फोन पर समझाया था। देखों कोई बीमार भी हो सकता है, बच्चे के इम्तहान भी हो सकते हैं। पंडित जी ने लाउडस्पीकर हटवा दिया था। उसने आसपास के लोगों से बात की थी। सब उसकी बात से सहमत थे। पर कुछ हो सकेगा इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। तो भी रेजीडेंट वेलफेयर वालों से पहले कारपरेशन के दफ्तर में चिट्ठी लिख दी थी। फिर एक चिट्ठी मुख्यमंत्री को भी लिखी थीं। पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं। मिसरीन बता रहे थे मास्टरजी कुछ नहीं होने वाला। उन्होंने साकेत में ही एक घर बनाया था। उनके
पिता ने सस्ते दिनों में एक तीन सौ गज का प्लाट खरीद लिया था। खूब दिल से, सपने की तरह एक घर बनाया था वहां। पर वहां भी पांच सितारा होटल से होड़ करती एक मस्जिद थी। वहां भी वही सुबह पांच बजे अल्ला-ऽ हो-ऽ शुरु हो जाता। क्योंकि हमारा घर उसी के सामने पड़ता था। इसलिए मेरी पत्नी सुबह पांच बजे ही दहल जाती। लगता था यह आवाज़ उन्हीं के घर के भीतर से आ रही है। सारी खिड़कियां बंद कर दी र्गइं। पर आवाज़ नहीं रुकी थी। मेरी पत्नी बर्दाश्त ही नहीं कर पा रही थी। बहुत
भागे दौड़ें, कहां-कहां नहीं गये शिकायत लेकर। जान पहचान से प्रधानमंत्री तक चिट्ठी पहुंचाई गई। संविधान का वास्ता दिया गया। नागरिक अधिकारों की बात कही गई। आश्वासन दिया जाता पर कुछ नहीं होता। छः महीने में ही पत्नी बीमार लगने लगी थी। कहती मैं सारा दिन घर पर रहती हूं। पांच बार अजान सुनती हूं। क्यों सुनूं? मैं उंची आवाज़ में तो रेडियो, भजन, तुम्हारी बात तक नहीं सुन सकती। मैं क्या करुं? आखिर फैसला लिया गया। दूसरी काॅलोनी में घर ढूंढा गया और उस जी-जान से बनाए घर
को बेच दिया गया। मास्टर साॅब यहां वोट की राजनीति है। सरकार कोई भी हो, पार्टी कोई भी हो, वोट की राजनीति करेगी। आपने देखा नहीं सामने हौजरानी काॅलोनी की सारी अवैध 7 दुकानें जब यह सड़कचैड़ी की गई तो उनको किसी ने नहीं छुआ। सड़क टेढ़ी हो गई पर उनकी सारा अवैध निर्माण वैसा ही खड़ा है। यहां पांच सितारा अस्पताल बने, माॅल बना, कोर्ट बना, कालोनी बनी। पर यह दो फर्लांग की सड़के टेढ़ी मेढ़ी वैसे ही आगे जाती है। ट्रैफिक जाम होता है। यहां की कालोनी के रहने वाले परेशान है पर कुछ नहीं हुआ। कुछ होने वाला ही नहीं है। तो भी इस तरह हिम्मत तो नहीं हारनी चाहिए। गलत का विरोध तो होना चाहिए। मास्टरजी ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था। आस-पास की कालोनी के दो सौ हस्ताक्षर वाली चिट्ठी प्रधानमंत्री को भेज दी थी।उम्मीद थी कि कहीं कुछ तो होगा।

वह सुबह पार्क में जाने लगा था। देखता स्कूल के बच्चे वहीं पार्क में घूमते या खेलते रहते। या इधर उधर बैठे रहते। उसे हैरानी हुई थी स्कूल यूनीफार्म में ये बच्चे स्कूल ही आए होंगे। उसने रुक कर पूछा था। कौनसे स्कूल के हो? ये सामने भाई वीरभद्र स्कूल से है। आप कौनसी कक्षा के हैं। बताया था, बच्चे नवीं, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षाओं में थे। आप लोगों को तो इस समय स्कूल में होना चाहिए। यहां पार्क में क्यों हैं आप? एक ने कहा था, अभी छुट्टी है, आधी छुट्टी। पर आप लोग तो यहां बहुत
देर से हैं। इतनी लम्बी आधी छुट्टी तो नहीं होती। आप जाओ, स्कूल जाओ। स्कूल खत्म होने के बाद आकर खेलना। उन्होंने एक-दूसरे की तरफ देखा था। वहां जाकर क्या करेंगे? क्यों स्कूल में जाकर क्या करते हैं? पढ़ते हैं! वहां कौनसी पढ़ाई होती है? कक्षाओं में बैठने की जगह भी नहीं हैं। हमारी क्लास में अस्सी-सौ बच्चे हैं और बैठने के लिए बैंच सिर्फ चालीस बच्चों के लिए हैं।बाकी क्या करें? नीचे क्यों बैठे! बैठ भी जाएं पर वहां टीचर नहीं आते हैं। उनसे जाकर कहो तो कहते हैं आप चलो आता हूं अभी! पर कभी नहीं आते। आप लोग प्रिंसिपल से शिकायत क्यों नहीं करते?कहा था उनसे भी। बोले ठीक है, बुलाकर कह देंगे। पर तो भी टीचर नहीं आते। वह उस दिन स्कूल के अंदर चला गया था और प्रिंसीपल के कमरे में घुस गया था। प्रिंसीपल आठ-दस लोगों से घिरा था।उसने उसका ध्यान अपनी ओर खींचा था, बैठिए आप। इन्तज़ार कीजिए। देखिए, मैं यहां अपने किसी
काम से नहीं आया हूं। आपका ही काम है, आपके बताने आया हूं। आपके स्कूल के बच्चे यहां सामने पार्क में खेलते रहते हैं। स्कूल में कक्षाओं में नहीं जाते। कहते हैं, बैठने की जगह नहीं है और टीचर पढ़ाने के लिए क्लास में नहीं आते। प्रिंसीपल सकपकाया था। आपका शुक्रिया। कोशिश करुंगा। पर हमारी अपनी समस्याएं हंै। जगह की कमीहै। दाखिल में उपर का प्रेशर है। फिर टीचर परमानेंट हैं, कहते हैं, पर क्या करें लाचार हो जाते हैं।ठीक हैं, देखता हूं क्या कर सकता हूं। वह लौट आया था। वह उनको उसी तरह पार्क में खेलते, लड़ते,झगड़ते, गाली गलौच करते देखा था। फिर उसे एक उपाय सूझा था। आप लोग अगर चाहो तो यहां बैठकर साईंस और मैथस की अपनी समस्याओं को मेरे साथ बैठकर सुलझा सकते हो। बच्चे हैरान हुए थे। पर छः आठ बच्चे तैयार हो गए थे। बाकी इधर उधर खिसक गये थे। अब वह वहां उन्हें घंटा दो घंटा पढ़ा देता। बच्चे दस-बारहां आने लगे थे। उसे अच्छा लगता था। घंटा डेढ़ घंटा उन्हें पढ़ाता और लौट आता। उसने देखा कुछ बच्चे विषय में अच्छे थे और पढ़ने के इच्छुक भी थे। तो भी अधिकतर बच्चे इधर-उधर घूमते रहते। पार्क के साथ ही मार्केट थी। वहां चले जाते। घर से एक कमीज़ बैग में ले आते। यहां आकर कमीज़ बदल लेते और सिनेमा में ‘ए’ फिल्में देखने चले जाते। वहीं मार्केट में शराब
की एक दुकान थी। बच्चे उस दुकान में शराब खरीदते और इधर उधर बैठकर पीते। उन्हें न कोई रोकता और न ही कुछ कहता या समझाता। वह मार्केट में था, घर के लिए कुछ सब्जी, दूध, मक्खन आदि लेना था। उसने शराब की दुकान पर खड़े बच्चों को देखा था। शराब खरीदने आए थे। उसने दुकानदार को रोका था। आप इन नाबालिग बच्चों को शराब क्यों बेच रहे हैं। आपका पता होना चाहिए |

यह गैर कानूनी है। पहले तो दुकानदार झेंपा था, फिर अकड़कर बोला था, आप अपना काम कीजिए।रास्ता नापिए।अपना ही काम कर रहा हूं। स्कूल का अध्यापक हूं। बच्चों को सही रास्ता दिखाना हमारा ही काम है। आपका भी तो फर्ज यही है। उसने देखा तीन चार लड़के थे। आगे आए थे। उन्होंने उसे घेर लिया था।यह वही पगलेट मास्टर है, पार्क में भी बच्चों को पढ़ाता है। वे हंस रहे थे। हम पढ़ाते हैं इसे अब,दिखाते हैं इसे सही दिशा। एक लड़का आगे आया था, उसने उसके पेट में मुक्का मारा था। फिर तीन-चार लड़के उस पर झपटे थे। वह उन्हें रोक रहा था भरसक कोशिश कर रहा था। पर एक लड़के ने पाॅकेट से एक चाकू निकाला था और उसकी गर्दन पर वार किया था। वह खून से लथपथ वहीं गिर गया था। चारों तरफ अफरातफरी मच गई थी। मार्केट के लोग आसपास इकट्ठे हो गए थे। लड़के भागने लगे थे।शायद किसी ने फोन कर दिया था। पुलिस आ गई थी। खून बह रहा था। अम्बुलेंस बुलाई गई। उसे अस्पताल ले जाया गया। एमरजेंसी में रखा गया। गर्दन पर घाव था पर गहरा नहीं था। पुलिस स्टेटमेंट लेने आ गई थी। उसे दो-तीन घंटे बाद होश आई तो पुलिस पूछ रही थी, आप वहां शराब की दुकान पर झगड़ा क्यों कर रहे थे।मेरा किसी से झगड़ा नहीं हुआ। ना ही मैं वहां शराब खरीद रहा था। तो यह मार पीट, चाकू छूरी यूं ही चल पड़ी क्या? उसने बताया था, चार पांच स्कूल के लड़के थे शराब खरीद रहे थे। पास खड़ा दुकानदार उसे आंखों के इशारे से रोक रहा था। उन्हें रोका था, शराब खरीदने से और बस। इस दुकानदार को भी मनाह किया था स्कूल के लड़कों को शराब बेचने के लिए। बस, इस बात पर वे मेरे उपर पिल पड़े।
'आप उन्हें पहचानते हैं क्या?'
'हां, स्कूल के बच्चे हैं। ये सामने ही तो है।' दुकानदार इशारे से उसे रोक रहा था। पुलिस वाले ने दुकानदार से पूछा था,

'क्या तुम जानते हो उन्हें? तुम्हारे ग्राहक है तो जानते ही होंगे!'
'क्या पता साहब! इस मार्केट में कभी देखा नहीं।'

पुलिसवाले ने हड़काया था,' नहीं साहब, मैं नहीं पहचानता।'
और आप? वह अब उससे पूछ रहा था। जरूर स्कूल के ही बच्चे थे। स्कूल के समय में भी यहां पार्क में, मार्केट में, सिनेमा में घूमते रहते हैं। कमीज बदल लेते हैं, साथ लेकर आते हैं, अपने बैग में। पुलिस वाले ने दुकानदार की तरफ देखा था,

'बच्चे तो पकड़े ही जाएंगे पर आपका भी लाइसेंस कैंसल हो सकता है। याद रखिए।'

पुलिस पूछताछ करके, बयान दर्ज करके चली गई थी। दुकानदार उसे धमका रहा था।

'आप भी बचेंगे नहीं मास्टरजी। इन लड़कों को आप नहीं जानते।'

मार्केट के कुछ दुकानदार आ गये थे।
'आपको बीच में नहीं पड़ना चाहिए था मास्टरजी। कोई कुछ भी करे आपसे मतलब। अब देखिए आगे क्या होता है। आपकी जान को भी खतरा है। अब आप एक मेहरबानी करिए। वे, लड़कों को पकड़कर आपके पास लाएं तो पहचानने से इंकार कर देना। इस घटना के बाद तो आप समझ जाइए।'

उसने देखा किसी को सही करने पर भरोसा नहीं था। सबको कुछ बुरा होने का भय सता रहा था। वे चार पांच दिन अस्पताल में रहकर घर लौट आया था। पड़ौस के कई लोग आए थे।

'हमें तो पता नहीं चला। आपकोहमें बताना चाहिए था। दिन में आप नहीं दिखते तो सोचते आप पढ़ाने गये होंगे। पार्क में भी नहीं दिखे,सोचा शायद नहीं आए होंगे। बस आज ही पता चला, गुंडों ने आपको घायल कर दिया। भला आप जैसे मनुष्य से किसी का क्या बैर।'
'वे गुंडे नहीं थे।' उसने बताया था। 'स्कूल के ही बच्चे थे। गलत रास्ते पर चल पड़े तो फिर अच्छा बुरा कुछ नहीं दिखता।'

मार्केट के दुकानदार थे, आपका हाल पूछने आ गए हैं। उसने शुक्रिया कहा था पर वह उनकी मंशा जान गया था। अब आप बेहतर है पहले से। हां ठीक हो रहा हूं। आप बच गये, किस्मत अच्छी थी। इन मवाली हुड़दंगियों का क्या भरोसा था। शराब की दुकान वाला था, पास खिसक आया था, अब आप मेहरबानी करे मास्टरजी, अगर वे उन लड़कों को पकड़ लाएं तो आपको उन्हें पहचानने की जरुरत नहीं। आपको दुबारा से कहना जरुरी लगा था। ‘आप क्या मुझे धमकाने आए है?’ नहीं-नहीं....
, ऐसा क्यों सोचते हैं आप! अपनी सुरक्षा का तो ध्यान हमें रखना ही होता है। जी-आप चिंता न करे मेरी। यहां आने का फिर से शुक्रिया। वे चले गए थे। अरुण का फोन था, कह रहा था वह दिल्ली आ रहा है। कुछ समय यहीं रहेगा। ‘आप से मिलने भी
जाउंगा’।बड़ा उत्साहित था। उसे भी अच्छा लगा था। दो दिन बाद अरुण और नवीन दोनों आ गए थे। नवीन बता रहा था, माससाहब, अभी तक नौकरी तो नहीं मिली पर मैं पार्टटाइम एक अखबार के साथकाम कर रहा हूं। और अरुण तुम?
सर, ढूंढ तो मैं भी नौकरी ही रहा हूं पर मैं भी स्वतंत्र रुप से सामाजिक समस्याओं पर लिखता हूं। यहां इंटरव्यू के लिए आया हूं।
'पर तुम तो वहीं अरुणाचल में, अपने घर परिवार और अपने लोगों के बीच ही रहना चाहते थे।'
'वो तो ठीक है मास्साॅब पर काम भी तो चाहिए। वहां की हालत खराब है, दिनों-दिन और खराब हो रही है। वहां बड़ी संख्या में आए शरणार्थी, स्थानीय लोगों के लिए चुनौती बन गए हैं। इसके विरोध में आसाम, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल के लिए परेशान हो रही है। बाहर से आए लोगों को सरकारी मदद, खेती की जमीन और पहचान पत्र आराम से दिए जा रहे हैं। हजारों शरणार्थी हैं जिन्हें बसाया गया है। उन्हें बिजली, पानी, राशनकार्ड और दूसरी सुविधाएं दी गई हैं। उन्हें नागरिकता प्रदान की
गई है। बिना कोई शुल्क चुकाए उन्हंे सब मिल रहा है। शरणार्थियों की आड़ में वे वोट बैंक की राजनीति कर रही है। अपनी सत्ता निश्चित कर रही है। आप देखें तो हैरान हो जाएं मास्साहब -शरणार्थियों ने बड़ी-बड़ी कोठियां बना ली हंै। लगता है अशांत देशों के नागरिकों के लिए सबसे अच्छीजगह भारत ही है। विभिन्न देशों में अराजकता गृहयुद्ध और शासन के अत्याचारों के कारण सीमावर्तीइलाकों में करोड़ों की आबादी आ गई हैं। विश्वभर में स्थायी शरणार्थी सबसे ज्यादा हमारे यहां है।
सरकारें अपने नागरिकों पर कटौती करके उन्हें सुविधाएं दे रही है। क्यों? उन्हें वे अपना वोट बैंक मान रही है। पश्चिमी बंगाल में उन्हीं के बल पर पंचायत के चुनाव जीते!हमारे लिए अपने ही राज्य में नौकरी मिलना असंभव हो गया है। कई लड़के जो मेरे साथ ही थे यहां लौट आए हैं। छोटी-छोटी नौकरियां कर रहे हैं। मैकडाॅनल, पीज़ाहट, डुमैनो जैसे खाने की जगहों में एकया दो शिफ्ट में काम करके या तो अपनी आगे की पढ़ाई कर रहे हैं या अपना गुजारा कर रहे हैं।'
मास्टरजी, नंदलाल और वैभव भी यहीं पर है।अब मास्टरजी के घर में अक्सर हर दिन ये लड़के आ जाते थे। घंटो राजनीतिक सामाजिक मुद्दो पर चर्चा करते। नंदलाल तुम किस समाचार पत्र के साथ काम कर रहे हो? मास्टरजी, नाम कोई बड़ा नहीं है। पर बड़ा ही निष्ठावान और प्रतिबद्ध अखबार हैं। जहां भी, ज्यों भी गलत हो रहा है, उसको उजागर करना ही इसका उद्देश्य है। फिर गलत कोई भी कर रहा हो, राजनेता ही क्यों न हो। आप देखिए- सौ, हजार, दस हजार की चोरी करने वालों को जेल होती है और करोड़ों की हेराफेरी करनेवाले उंची कुर्सियों पर विराजमान है। हमारा अभियान इन्हीं के विरोध में है। सर! आपने हमें भारत निर्माण का इतिहासपढ़ाया था। देश के निर्माण में बालगंगाधर तिलक, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल, राममनोहर लोहिया, अम्बेडकर थे। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे देशभक्त शहीदों की सूची थी। लेकिन सर, यह आज की राजनीति में क्या हो रहा है? राष्ट्र निर्माण का सारा श्रेय नेहरु और उसके परिवार को दिया जा रहा है। सर, 54 केन्द्रीय योजनाएं हैं इनमें 18 के नाम राजीव के नाम पर हंै। कुछ नेहरु और इंदिरा गांधी के नाम पर हंै। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय पुरस्कारों के नाम, हवाई अड्डों, विश्वविद्यालयों, संस्थानों, खेल परिसरों, सड़को, स्टेडियम इत्यादि के नाम एक ही परिवार के नामों पर
क्यों? लोकतंत्र के नेता तो तिलक, गोखले, राजेन्द्रप्रसाद, मदन मोहन मालवीय इत्यादि थे। वे सब कहां गए? सन् 1950 के बाद पार्टी परिवार होती गई, फिर इंदिरा, इंडिया हो र्गइं। सरकारी योजनाएं देश के करदाताओं से संचित कोष से चलती है। देश का राजकोष एक परिवार की सम्पदा कैसे बन गया? इस तरह समाजकल्याण की योजनाओं का परिवारिकरण बहुत गलत है सर! एक तरह से संवैधानिक अपराध है। स्वतंत्र देश में महत्वपूर्ण स्थानों, संस्थाओं के नाम, किन्हीं प्रतिभाशाली वैज्ञानिक या साहित्यकला दर्शन तथा अन्य क्षेत्रों की प्रतिमाओं के नामों पर हो सकते हैं। सर, आपने जो हमें स्वतंत्रता का इतिहास
पढ़ाया था वो गलत था क्या?नवीन ने कहा था, मास्साहब दुनिया बदल रही है, इसमें मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। सच्चाई को छिपाना अब आसान नहीं। क्या हम नहीं जान रहे कि हमें लोकतंत्र का इतिहास वह नहीं है जो प्रोजेक्ट किया जा रहा है। कांग्रेस पार्टी की सरकार ने ऐसे चापलूसों को और दूसरे दूसरे पद और पैसे के लालची लोगों को शिक्षा संस्थानों में नियुक्त किया जो नेहरु परिवार की पीढि़यों का गुणगान करें। दूसरे बड़े नेताआंे को कमतर दिखाए। ऐसे ही लोगों को अकादमियों में उंचे पद दिए गए। उन्हंे अन्र्तराष्ट्रीय फैलोशिप दिलवाया गया। उन्हें पुरस्कृत, विभूषित और उपकृत किया गया। सर, मैं आपको प्रो. मक्खनलाल की एक किताब दूंगा। अगली बार आते हुए ले आउंगा। ‘सेक्यूलर पाॅलिटिक्स, कम्युनल एजेंडा’किताब है प्रो. लाल की जिसमें उन्होंने नेहरु की राजनीति के षडयंत्रों को उजागर किया है। सारी प्रादेशिक कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम नामित किया था प्रधानमंत्री पद के लिए। पर नेहरु राजनीति, गांधी का ‘ब्लयू आई बाॅय’, पटेल को अपना नाम वापिस लेना पड़ा। नेहरु ने अपनी पसंद नापसंद में कितने गलत निर्णय लिए। भारत के लोग हैदराबाद और कश्मीर के बारे में नहीं जानते। नेहरु के हाथ में होता तो दोनों हमारे हाथ से निकल जाते। सरकार पटेल ने ही वहां सेनाएं भेजी थीं।पाकिस्तान के हाथों में जाने से बचाया था। नेहरु, पटेल से उनकी प्रतिमा लौह व्यक्तित्व से डरते थे।पटेल की अत्योष्टि में आदेश पारित किया था कि कोई अधिकारी सरकारी तौर पर वहां नहीं जाएगा।आज भी इस पार्टी में वंशवाद की जड़े गहरी फैली हैं। इसके सदस्य चापलूस और बौने है। सब देखते
है, कोई नहीं बोलता, क्योंकि दस साल से पार्टी सत्ता में है - निरंकुश हो गई है। सर, कहते हैं इतावली बड़े शूड्रऔर क्रुक होते हैं। होते हैं न सर! कैसे रिमोट कंट्रोल से सत्ता चलाई जा रही है। सब बेबस देख रहे हैं, कोई कुछ नहीं करता। पर सर, अब ये स्थिति ज्यादा देर रहने वाली नहीं है। ये सारा कुछ, विवादास्पद तुम्हारा अखबार छापता है, उपरी दबाव नहीं पड़ता। अखबार बंद नहीं होजाता। नंदलाल हंस रहा था, पड़ता है 'सर! अखबार भी बंद हो जाता है। थोड़े दिन बाद दूसरे नाम से शुरु कर देते हैं, पहले राष्ट्रनिर्माण, फिर देश बचाओ, अब नव जागरण है सर! फर्क यह है कि ये अखबार सरकारी मदद से तो चलता नहीं। एक स्वतंत्रता सेनानी का लड़का है जो अमरीका में लगभग 80 प्रतिशत पोर्टल गुजराती चलाते हैं। खूब पैसा भी कमाते हैं। कहता है, मैं अपने पिता के ही काम को पूरा कर रहा हूं। अपनी तरह से देश के लिए काम कर रहा हूं। जब अखबार बंद हो जाता है। दूसरे
नाम से फिर शुरु हो जाता है। सर्कुलेशन भी अच्छी है, सर! हमारा उद्देश्य जन जागरण है सर! उत्तरप्रदेश और बिहार में लोग इसे ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ते हैं। यह मानो एक प्रति अखबार कम से कम दस लोग पढ़ते हैं। अगर इसकी सर्कुलेशन दो ढाई हजार हैं तो
पाठक तो दस हजार हो गए, सर। नवीन ने कहा था, ये ‘नेशनल डेली’ है सर इनमें पन्द्रह से बीस प्रतिशत न्यूज पेड न्यूज़ होती है सर! इक्नोमिक टाइम्स में काम करता है राघव, रिपोर्टर है। रियलस्टेट कवर कर रहा है। सर, उसके पास पांच सालों में 2 मकान हो गए। है न कमाल सर। पेड न्यूज का कमाल है। इन बड़े अखबारों की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठाता। पर जो छोटे अखबार है वे हमेशा शक के घेरे में रहते हैं। राजनीतिज्ञों के निशाने पर भी होते हैं।तुम इतने चुप और उदास क्यों बैठे हो कपिल! कुछ भी नहीं बोल रहे।'

उसका चेहरा और भी लटक गया था। आंखे छलछला आई थी।
'कपिल, बहुत वर्ष हो गए। कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ना पड़ा था।हां, सर बहुत वर्ष हो गए। पर क्या किया हमारे लिए शासन या सरकार ने। सर, अभी मोदी ने अपने भाषण में अनुच्छेद 370 पर बहस की बात की थी। यह भी कहा था कि आम आदमी को इससे क्या फायदा हुआ सर! हम यहां भिखारी हो गए। मेरे पिता के पास, बादाम बाढ़ी थी, सेब के सैकड़ों पेड़ थे।
अखरोट के दरख्त थे। हमार ड्राईफ्रूट का बिजनेस था। हमारी एक दुकान रैजीडंैसी रोड पर थी सर! वहां उम्दा कालीन थे, पशमीने की शाले थीं। अखरोट की लकड़ी का बेहतरीन सामान था। हमारे ग्राहक खास होते थे सर! आम ग्राहक तो इन चीज़ों पर खर्च नहीं कर सकता पर सर, हमें यहां से खदेड़ दिया गया। वहां हम बड़ी-बड़ी कोठियों में खुले घरों में और आंगन में रहते थे। यहां हमारा जो बेहाल हुआ, वर्षों कोई कम्परसेशन नहीं मिला। सर मेरे पिताजी को जब किसी शाॅल की दुकान में सेल्ज़मैन का काम करना पड़ा तो वह मानसिक रुप से बीमार हो गए। हम छोटे-छोटे तीन भाई बहिन थे। मां यू ही सारा दिन रोती रहती थी। इतना रुतबे वाला आदमी किसी के अधीन सेल्समैन का काम कब तक कर सकता था। आखिर उनका नर्वस ब्रेकडाउन हो गया। चल बसे। चाचा ने संभाला परिवार को। उन्हें एक 4 फुट गुणित 6 फुट की एक गुमटी मिली थी। उन्होंने वहीं अपनी दुकान लगाईं। उन्हें होज़री के काम का कोई अनुभव नहीं था। पर उन्होंने सीख लिया। चाची, उनकी दो बेटियां और हम चार लोग। सब का भार उन पर था। किशोर होते ही सर, प्राइवेट परीक्षाएं, इग्नू से दी है और मैकडाॅनल में काम किया है। जूठे बर्तन साफ किए अब असिस्टेंट मैंनेजर हूं सर! पर अंदर से खुश नहीं हूं। मैं मीडिया और कम्यूनिकेशन का कोर्स कर रहा हूं। मुझे बनना तो पत्रकार है सर! इस व्यवस्था की उधेड़नी है सर! सच को जनता तलाना है। सर, आप सोचिए देश के अन्य भागों में लागू कानून जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होते। 370 का कितना दुरुपयोग हुआ है सर! इस राज्य को मिलने वाली मदद का बड़ा हिस्सा किनके पास जाता है? उन्हीं चुनींदा लोगों के पास। यही पैसा अलगाववादियों के पास भी जाता है। जनता के विकास में काम नहीं
आता। इस पर कोई बात नहीं करना चाहता। इसे संवेदनशील मुद्दा मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। पैसा स्थानीय राजनीति के भ्रष्टाचार की भेंट होता है। कोई आॅडिट नहीं। बड़ा हिस्सा वहां की नौकरशाही वर्ग के जेब में जाता है। बाकी लोग वहां का आम नागरिक वैसा ही अशिक्षित, गरीब और अंध विश्वासों से घिरा दयनीय स्थिति में है।आपको पता है सर,सांप्रदायिक हिंसा कानून जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होता। वहां हिंदुओं पर सर्वाधिक अत्याचार होते हैं। लोग इस अनुच्छेद के बारे में नहीं जानते। संविधान के इस प्रावधान का नाम आते ही लोग जिहादियों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। क्या आज भारतवासी नहीं जानना चाहते कि यह प्रावधान क्यों? अस्थायी तौर पर बना यह प्रावधान स्थायी कैसे हो गया! संविधान के 21 वें भाग में अनुच्छेद 370 को अस्थायी संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान के रुप में रखा गया है। पहले ये अनुच्छेद 360 ए पेश हुआ फिर 370 के रुप में आया पर अब स्थायी हो गया।अनुच्छेद 370 के माध्यम से कश्मीर के मुद्दे पर कुछ बड़ी गलतियां हमने की है। जिनके बुरे नतीजे हम आज भोग रहे हैं। देर तो हो गई है पर बैटर लेट देन नेवर, सर। सोचना तो चाहिए हमें। वहां के
स्थानीय निवासियों की अवहेलना, उनके हितों और आंकाक्षाओं की उपेक्षा और दमन। यह लोकतंत्र तो नहीं हो सकता संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्रपति जब चाहे, एक आदेश से इस अनुच्छेद को निरस्त कर सकते हैं। अनुच्छेद 368 के अनुसार इसे निरस्त कर दिया जाना चाहिए। परंतु सर, यह प्रक्रिया अनुच्छेद 370 पर लागू नहीं होती। इस संदर्भ में दोहरी नागरिकता का प्रश्न भी आता है। दोहरी नागरिकता अलगाववाद नहीं है। परंतु सर, जम्मू और कश्मीर, भारत में रहते हुए स्वायत्ता प्राप्त कर सका। देश के अन्य भागों में लागू कानून यहां लागू नहीं होते। इसमें भी तो अलगाववाद को बढ़ावा मिला है। जम्मू कश्मीर में पनपने वाला अलगाववाद भी तो चिंता का विषय है। जम्मू कश्मीर को जो लाभ दिए गए उसकी कीमत रोज देश को चुकानी पड़ रही है।सर देश में भी तो यह सब परोक्ष रुप से हो रहा है। अलीगढ़ विश्वविद्यालय को मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाने का राजनीतिक षडयंत्र जो कट्टरवादियों के पक्ष में था। पर क्या संसद या जनता नहीं जानती कि विश्वविद्यालय भी सरकार की आर्थिक सहायता से चलता है और सरकार के इस पैसे पर अधिकार हर देश के हर युवक का है क्योंकि यह धन भारत की जनता कर के रुप में देती है। मुस्लिमों को खुश करने की राजनीति के पक्ष में तो भी माना जाता है यहां का हर शिक्षक और छात्र मुस्लिम संप्रदाय के
हित में है। और छात्रों का मुस्लिम कोटा बढ़ा दिया जाता है। फिर पार्टी चुनाव की राजनीति की चाल चलती है और इसे मुस्लिम विश्वविद्यालय घोषित करती है पर कोर्ट ने इसे अस्वीकार किया और इसे अल्पसंख्यक घोषित करना भी असंवैधानिक बताया। क्या यही लोकतंत्र है। या यह इस लोकतंत्र की धर्मनिरपेक्षता है? इन सवालों पर भी विचार तो होना ही चाहिए सर! मि. गुप्ता का घर जैसे शाम को काफी हाउस में बदल जाता था। खूब बहस होती, चर्चाए चलतीं। पांच-छः और कभी ज्यादा लड़के आ जाते। यह सभी यहां नौकरी की तलाश में आए थे। कुछ को छोटा-मोटा काम मिल भी गया था। पता नहीं क्यों इस पीढ़ी के युवकों में विद्रोह था। ये सभी पत्रकार बनना और मीडिया में कैरियर चुनना चाह रहे थे। नंदलाल कहता था, मास्टरजी, हम एमबीए, इंजीनियरिंग या डाॅक्टरी नहीं कर सके। हो सका तो कभी आगे जाकर आइटी की पढ़ाई जरुर करेंगे। पर वे जागरुक थे।
कुछ दिनों में एक लड़का बाबू भी आने लगा था। नवीन ने बताया था, सर, यह मुझे चैराहे पर कभी फूल कभी झाड़न, कभी मोबाइल के चार्जर बेचता नजर आता था। पर वह औरों से अलग लगता था। एक दिन उसने बताया था कि वह इग्नू से बारहवीं की परीक्षा दे चुका है। बस परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा है। कहता है ‘मैं भी लिखता हूं, इसे अखबार में छपवा दीजिए।’ मैंने देखा था सर, अच्छा लिखगया लेख था।राजनीति का अल्पसंख्यकों के साथ किया गया राजनीति का खेल। कैसे वोट बैंक के तहत आरक्षण के नाम पर इन्हें सरकार ने अपनी जेब में डाला। पर उनके लिए जातिवाद और भेदभाव रहित प्रगति का मार्ग कहा?'
'तुम कहां रहते हो बाबू?'
वह चुपा गया था। नवीन ने कहा था,' बोलो बाबू मास्टरजी अपने हैं।'
उसने कहा था, 'कहीं नहीं, मास्टरजी, फ्लाईओवर के नीचे ही हमारा घर है सर। उपर छत मिल जाती है। धूप, बारिश और ठंड में कुछ बचाव हो जाता है। हम राजस्थान से आए है सर, नट जाति के है।शुरु से हमें कसरत करवाकर, हमारे शरीर को लचीला बना दिया जाता है। हम इस छोटे से रिंग से पूरा शरीर निकाल लेते है। आपने सड़कों पर चैराहों पर हमारे बच्चों को ये सब करते और कलाबाजियां दिखाते देखा होगा। मुझे यह नहीं करना होता था। बहुत मार खाई मास्टरजी, बापू मारता था, पूछता था,तू क्या करेगा?मैंने सर, चैराहों पर चीज़े बेचनी शुरु की। समय निकालकर पढ़ने लगा। एक मेमसाहब ने मुझे इग्नू का पता दिया था। वहां गया था। सब ठीक लगा था। मेमसाॅहब ने फीस के पैसे भी दिए थे। किताबों के पैसे भी दिए थे। मैंने 12वीं कर ली है। अब क्या करुं?'
'पर तुम क्या चाहते हो?'
'मुझे पता नहीं चल रहा सर! मैं आगे पढ़ना चाहता हूं। क्या पढ़ना चाहते हो?सर, समझ नहीं आ रही। पर जहां अच्छी नौकरी मिल सके सर! हमारे लिए, हम छोटी जाति के लोगों और आदिवासियों के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया। हमें आज भी निचली श्रेणी का जीव माना जाता है। हम अपना कस्बा छोड़कर यहां आए थे। सूखा पड़ा था। यहां जो भी हो बस किसी तरह से रोटी का जुगाड़ हो जाता है। मां और भाई बहिनें भीख भी मांगती हैं सर! कहने को चीज़े बेचते हंै, लेकिन चीज़े नहीं कोई खरीदता तो दयनीय मुद्रा में पैसे मांगते हैं। यह सच्चाई है मास्टरजी! बहिन की इज्जत भी अब खतरे में हैं। हम दोनों भाई उसकी रक्षा करते हैं। उसे एक अच्छी मेमसाहब अपने घर ले गई है। वह उसका बच्चा देखती है। मैमसाहब दफ्तर जाती हंै। उसने पीछे से घर देखना और बच्चे की देखभाल का काम सीख लिया है। वह पैसे दे देती हंै। गुजारा हो जाता है। कहती है तू पढ़ ले, पढ़कर कुछ बन जा।'

' ठीक है, 12 वीं का नतीजा आ जाए। कोई प्रोफेशनल कोर्स एक साल का हो, दाखिला ले लो। प्राइवेट
बीए भी करो। ग्रेजुएशन जरुरी है।'
'ठीक है सर! वह सकुचाया था। वह मेमसाॅहब तो चली गई सर! उसने बहुत मदद की थी।'

'चिंता मर करो। अब तुम्हारी मदद मैं करुंगा। दाखिल के पैसे और हर महीने क्लास के पैसे भी दूंगा। किताबों के लिए भी पैसे दे दूंगा। तुम पढ़ो, मुझे बहुत सुख मिलेगा इसमें।'
'जी सर!' वह झुका था, उसने मास्टरजी के पैरों में हाथ लगाया था।

उसकी आंखे भर आई थी। मि. गुप्ता सोच रहे थे। यह कैसा लोकतंत्र है। राजनीति में कितना पतन हो गया है। कहने को ये सरकार अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के लिए लुभावने वायदे और योजनाएं घोषित करती हंै। आरक्षण के नाम पर उन्हें अपनी जेब में डाल लेती है। धर्म निरपेक्ष, भेदभाव रहित प्रगति मार्ग कहां है? गरीब और दलित वर्गाें से आए नेता भी करोड़ों की संपत्ति के मालिक है। दलितों और गरीबों की स्थिति वैसी ही। नेताओं, मंत्रियों के करोड़ों के घोटाले, पर वे किसी न किसी बहाने से बाहर घूम रहे हैं। भाषण दे रहे हैं। उधर जेलों में 7890 कैदी वे हंै जिनका ट्रायल होना है। नेताओं का अपराध सिद्ध नहीं हुआ इसलिए वे स्वतंत्र है, पर आम आदमी, जेलों में रह रहा आम आदमी जिन पर आरोप सिद्ध
नहीं हुए, वर्षों से जेलों में रह रहे हैं। बहसे होती हैं। चर्चाएं होती हैं मीडिया पर, सब, सब कुछ जानते हैं। पर कहीं कुछ नहीं होता।पूंजीवाद क्या सिर्फ आर्थिक होता है। यह राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों में होती हुई पूरी सोच और विचारों को प्रभावित करती है। पंूजीवाद का मतलब मुनाफा है। छोटे उद्योगों को नष्ट करना,लघु उद्योगों को जो जन सामान्य की आत्म निर्भरता का आधार है। उन्हें आर्थिक संबल देते हैं उनको भी कोई रियायत न देना, उनके विकास के लिए कुछ भी नहीं करना। आखिर वे अपने गांव, कस्बे, शहर छोड़कर महानगरों में आकर झोपड़पट्टियों में बस जाने को मजबूर होते हैं। मजदूर बन जाते हैं। दिहाड़ी के मजदूर है। घर बार उनका काम, खेत सब छूट जाते हैं। वह उसका दर्द महसूस कर रहा था। पर वहसिर्फ उसका दर्द कहां था। उसके जैसे हजारों का यही हाल था। तो भी ! जितना कुछ कर सकूं। उतना ही सही। लड़के चले गए थे। वह सोच रहा था इस पीढ़ी को हमने क्या दिया? भ्रष्टाचार, वंशवाद, भ्रष्ट राजनीति, मंहगाई, वोट की राजनीति, बदहाली! पर तो भी यह पीढ़ी असहाय महसूस करके भी आक्रोश से भरी है। इनका आक्रोश स्वाभाविक तो है पर जरुरी भी! तभी कुछ हो सकेगा। परिवर्तन भी तो यही लाएंगे। अंधेरा हो गया था। वह भीतर आया था। देखा खिड़की में लगी शर्मा की सीढ़ी। कुछ नहीं हुआ
था अब तक। हां, अभी कल इसी ब्लाक में एक घर में चोरी हो गई थी। यहां चोरी के लिए तो कुछ नहीं होगा पर जान का खतरा.... वह कांप गया था। बाहर खिड़की से उंची आजान की आवाज़ अल्ला- हो- आ रही थी। उसने खिड़कियां बंद की थी। सात बज चुके थे। अभी खाने का समय नहीं हुआ था। वह उठा था, जूते पहनकर बाहर निकल आया था। थोड़ा घूम आता हूं.... मन संभल जाएगा।
 

 

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