(लघुकथा)
                                                                                         
'अम्मा! तू इत्ती देर तक किससे हँस-हँस के बातें कर रही है?'
रामदुलारी ने मोबाइल ब्लाउज में रखते हुए बेटे को झिड़का,- 'चल तू अपनी पढ़ाई कर। - - बड़ा आया इन्क्वायरी करने वाला।'
'बता न अम्मा, तू किससे फ़ोन पर इत्ता मज़ाक करती रहती है?'
अब रामदुलारी का जी कसैला हो गया। सोनू का कान ऐंठते हुए बोली,- 'काहे रे! - - हँस नहीं सकती क्या मैं? - - -किसी से मज़ाक नहीं कर सकती? - - - एकदम अपने बाप पर गया है छोरा!'
'लेकिन बाबा से तो तूने कभी ऐसे बात नहीं की? - - काकी कहती हैं कि अगर तू बाबा से भी ऐसे ही हँस-मुस्कुरा के बातें किया करती तो आज वे अपने साथ होते।'
'अच्छा! - - -तो बुढ़िया ने यह नहीं बताया कि तेरा बाप रोज़ कितना दारू पीकर आता था और मुझे कैसे-कैसे, कहाँ-कहाँ मारता था?'
'तू उस समय भी तो दूसरे रिक्शा वालों से हँसकर बातें करती थी। - - घर में बैठाती थी, लस्सी पिलाती थी और बाबा सादे पानी के लिए चिल्लाते रहते थे।' 
'अच्छा! - - तो ये कहानी सुनावे है ई बुड्ढी? - - आज तो इसको ऐसा खाना खिलाऊंगी कि सोई ही रह जावेगी।'
'नहीं अम्मा! - - यह पाप मत करना। - - पता नहीं किस पाप के कारण बाबा के रहते भी तू एक विधवा जैसी रहती है?'
रामदुलारी ने अपनी मैली दाँतों को आपस में रगड़ते हुए सोनू का कान फिर खींचा, - ' सच बता, - - ई बुढ़िया ने ही पढ़ाया है न तुझे?'
'नहीं अम्मा! - - मैं भी तो देखता हूँ कि जब देखो तू कान से मोबाइल सटाकर पता नहीं किससे-किससे हँस-मुस्कुरा के बातें करती रहती हो।  - - - बाबा तुम्हें इसीलिए मारते थे न कि तू उनके सामने कभी खुश नहीं रहा करती थी? - - अब तुम मुस्कुराती हो तो मुझे डर लगता है अम्मा!'
'किस बात का डर लागे है रे तुझे?'
'तुम्हारे एक नहीं मुस्कुराने से बाबा दूर हो गए। - - - अब तुम मुस्कुराती हो तो डर लगता है कि कहीं तुम ना दूर हो जाओ। - - - मैं अभी छोटा हूँ न अम्मा! - - अकेले कैसे रहूँगा?'
सोनू की बातें सुनकर रामदुलारी काँप गई। 
उसकी आँखों में आँसू के कण चमकने लगे।
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                                                                                                                                 - केशव मोहन पाण्डेय  

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