इस बात पर हिंदी जगत में व्यापक और गंभीर विमर्श नहीं हुआ है कि सिनेमा और सिनेमा लेखन को लेकर हिंदी के साहित्यकार इतने उदासीन क्यों रहते हैं । किस वजह से सिनेमा के लिए गीत लिखनेवालों को हिंदी के कवियों में शुमार नहीं किया जाता है । वो कौन सी वजह से कि कविता की दुनिया में गुलजार को वो स्थान हासिल नहीं होता है जो कुंवर नारायण या केदारनाथ सिंह को है । प्रसून जोशी को हिंदी साहित्य की दुनिया में वो प्रतिष्ठा हासिल नहीं हो पाती है जो अरुण कमल या राजेश जोशी कवियों को मिली हुई है । यह सूची और भी लंबी हो सकती है लेकिन हमारा मकसद नामों को गिनाना नहीं है बल्कि हमारा मकसद हिंदी साहित्य और सिनेमा के संबंधों की पड़ताल करना है । एक तो रही ये बात दूसरी बात ये कि हिंदी साहित्य से जुड़े ज्यादातर लेखक फिल्मों में ज्यादा सफल क्यों नहीं हो पाए और वापस साहित्य की दुनिया की ओर लौट आए । प्रेमचंद, अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रा नंदन पंत जैसे साहित्यकार अपने शुरुआती दिनों में फिल्मों से जुड़े लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हुआ और वो वापस साहित्य की दुनिया में लौट आए । प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग को रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया । बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी । बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना ।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।‘अब ऐसा क्यों कर हुआ कि हमारे हिंदी साहित्य के हिरामन फिल्मों से इस कदर आहत हो गए । क्यों सुमित्रानंदन पंत जैसे महान कवि के लिखे गीतों को फिल्मों में सफलता नहीं मिल पाई, क्यों गोपाल सिंह नेपाली जैसे ओज के कवि को फिल्मों में आंशिक सफलता मिली । क्यों राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर जैसे शब्दों के जादूगर फिल्मों में अपनी सफलता का डंका बजाते हुए लंबे वक्त तक कायम नहीं रह सके । राजेन्द्र यादव की जिस कृति ‘सारा आकाश’ पर उसी नाम से बनी फिल्म को समांतर हिंदी सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में शुमार किया जाता है वो राजेन्द्र यादव बाद के दिनों में फिल्म से विमुख क्यों हो गए । दरअसल इसकी मुख्य वजह जो समझ में आती है वो ये कि साहित्यकार की आजाद ख्याली या उसकी स्वछंद मानसिकता फिल्म लेखन की सफलता में बाधा बनकर खड़ी हो जाती है । अपनी साहित्यक कृतियों में लेखक अंतिम होता है और उसकी ही मर्जी चलती है, वो अपने हिसाब से कथानक को लेकर आगे बढ़ता है और जहां उसे उचित लगता है उसको खत्म कर देता है । लेकिन फिल्मों में उसके साथ ये संभव नहीं होता है । फिल्मों में निर्देशक और नायक पर बहुत कुछ निर्भर करता है और फिल्म लेखन एक टीम की कृति के तौर सामने आता है वहीं साहित्यक लेखन एक व्यक्ति का होता है ।

प्रेमचंद के जिस दर्द को रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने अपने संस्मरणों में जाहिर किया है उससे तो कम से कम यही संकेत मिलते हैं । कुछ तो वजह रही होगी, कोई यूं ही बेवफा नहीं होता । प्रेमचंद जैसा लेखक ये कहने को मजबूर हो गया कि अगर तुम मेरी इज्जत करते हो तो इस फिल्म को कभी मत देखना । संकेत यही है कि कथानक से उनकी मर्जी के विपरीत खिलवाड़ किया गया । कुछ इसी तरह के संकेत सिनेमा के सौ बरस में लिखे अपने लेख ‘मैंने तो तौबा कर ली’ में मस्तराम कपूर ने भी दिए हैं – ‘ मैंने महसूस किया कि फिल्मों की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिखी गई रचना सही मायने में साहित्यक रचना नहीं बनती है । मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि फिल्म और टी वी का माध्यम साहित्य के अनुकूल नहीं है । फिल्म और टी वी के लिए लिखी गई रचना बाजार की मांग को ध्यान में रखकर लिखी जाती है जबकि साहित्यक रचना अपने अंधकार और अपने बंधनों से लड़ने की प्रक्रिया से निकलती है ।‘ प्रेमचंद के दर्द और मस्तराम कपूर के अनुभवों से ये बात साफ हो जाती है कि हिंदी का साहित्यकार फिल्मों में ज्यादा लंबा क्यों नहीं चल पाता है ।


अब दूसरा मुद्दा कि हिंदी साहित्य में फिल्म लेखन को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया । इसकी कई वजहें हैं । विचारधारा के साहित्य और उनके साहित्यकारों की फिल्मों को लेकर मानसिकता तो मुख्य वजह है ही लेकिन उससे इतर साहित्यकारों का फिल्मी दुनिया से कड़वे अनुभव लेकर साहित्य की दुनिया में लौटना और उसको साथी साहित्यकारों से साझा करना भी एक अन्य वजह है । कड़वे अनुभवों से यह निकलकर आता है कि फिल्मों में लिखने वाले अपने मन की नहीं कर पाते हैं । उनका लेखन दवाब और वक्त की मांग का लेखन होता है । यह बात बहुत हद तक सही भी है । मौजूदा दौर में फिल्मी कहानियों और गीतों की रचना निर्देशकों की मर्जी और उनके द्वारा दिए गए सिचुएशन के हिसाब से की जाती है । इसलिए कई बार कहानी और गाने एक दूसरे के साथ घुलने मिलने की बजाए अलग से नजर आते हैं । अब तो आलम यह है कि म्यूजिक कंपनियां लेखकों से गीत लिखवाकर रख लेती हैं और फिल्मकारों को उनकी मांग के हिसाब से गीत उपलब्ध करवा देती हैं। कई बार संगीत के साथ तो कई बार बगैर संगीत के । अब जब इस तरह की व्यवस्था बढ़ने लगे तो साहित्य में प्रतिष्ठा हासिल करने में दिक्कत तो होगी । मांग के अनुसार लिखा जानेवाला साहित्य और मन के हिसाब से लिखे जाने वाले साहित्य में फर्क तो होता ही है । मन को हमेशा से मांग से उपर का स्थान हासिल होता है और वही साहित्य और सिनेमा लेखन में भी है । तात्कालिकता के दबाव और बाजार की मांग के अनुरूप लाभ कमाने के उद्देश्य से लिखा जानेवाला लेखन कालजयी नहीं हो पाता है

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