कभी-कभी जिंदगी में ऐसे भी कुछ लम्हे आते हैं जो ओस की बूंदों की तरह मन को भिगो देते हैं। अजीब शीतलता होती है इनमें। जो मन को तो सुकून देते हैं पर दिल पर जमे हिमखंडो को पिघलाते हुए आँखों से भी बह निकलते हैं। दिमाग अपने स्वभावानुसार सवाल करता है-

"हुआ क्या ?”

"तुम रो क्यों रहे हो?”

लेकिन जवाब किसी को नहीं सूझता। बस आँखें झरती रहती हैं, दिल पिघलता रहता है और मन अजीब सी अनुभूतियों में भीगा रहता है। दिमाग थोडा झल्लाता है फिर खुद ही निर्णय पर पहुँचता है। ये सब पागल हैं।

शिखा भी आज ऐसे ही एहसासों से लबरेज थी। दिल, दिमाग और आँखें किसी पर भी उसका बस नहीं चल रहा था। मन तो कुछ ऐसा भीगा था कि किसी भी तरह दिमाग की गिरफ्त में आने को तैयार ही नहीं था। सुध-बुध खोए उस अनाथ बच्चे की मानिंद हो गया था जो दिनभर तपती धूप में जलने के बाद पेड़ की छाया में भी ऐसे शांति से सो जाता है जैसे ए.सी. चल रहा हो।

देखा जाए तो कुछ खास तो नहीं हुआ था लेकिन फिर भी कुछ तो खास था। दरअसल पिछले कुछ समय से एक अजीब सा तनाव तैर रहा था शिखा और मोहित के बीच। प्यार का झरना जो पहली ही नजर में अपने पूरे वेग से फूट पड़ा था दोनों के दिल में, अब इतने सालों बाद सूखा-सूखा सा लगने लगा था। उस पर जब-तब होनेवाली कहासुनी और मनमुटाव ने स्थिति और बिगाड़ दी थी। तीन महीने पहले हुई तीखी बहस आज भी दोनों के दिल और दिमाग में नश्तर की तरह चुभ रही थी और बातचीत लगभग बंद थी। बस जरूरी बातें हो जाया करती थीं। जबकि दोनो पहले घंटो बतियाते थे।

मोहित ने शिखा को पहली बार अपने दोस्त की शादी में देखा था। एक दूल्हे का खास दोस्त, दूसरी दुल्हन की। पहली ही नजर में कुछ तितलियाँ सी गुदगुदाने लगी थीं दोनों के दिल को। उस पर शादी की रस्मों की नोंक-झोंक, माहौल और छींटाकशी ने कुछ ही घंटों में रंग दिया था प्यार के सतरंगी रंगों से। वहाँ मौजूद दोनों के परिवार भी भाँप गए उनकी आँख-मिचौली को और हो गया चट-मंगनी, पट-ब्याह।

समय मानो पंख लगाकर उड़ रहा था। दोनों सारी दुनिया को भुलाये रोमानियत की नदी में गोते लगा रहे थे। जिन्दगी जन्नत हो गई थी। अजीब सी खुमारी छाई थी दोनों पर। एक दूजे में ही डूबे रहते थे सारी दुनिया से बेखबर।


शादी के सालभर बाद ही एक नन्हे फरिश्ते ने कदम रख दिया उनकी उस जन्नत में। जिन्दगी और खुशनुमा हो गयी। देखते-देखते तीन साल गुजर गए। अब दोनों के रास्ते जुदा होने लगे थे। शिखा, अमन के कामों में उलझी रहती और मोहित ऑफिस के। कभी साथ बैठकर बात करने का मन भी करता तो कभी मोहित का फोन बज उठता, तो कभी अमन उठ जाता। बच्चा, घर और ऑफिस की जिम्मेवारियों में जिंदगी उलझने लगी थी। और शिखा तथा मोहित झुंझलाने लगे थे। छोटी-मोटी कहासुनी अब रोज की बात होने लगी थी।


ऐसा नहीं था कि दोनों अपने रिश्ते को संभालना नहीं चाहते थे पर लाख चाहने के बाद भी कुछ कर नहीं पाते थे। दोनों ही अकेले में पुराने दिनों को याद करते और अपने रिश्ते में जमती जा रही बर्फ को उखाड़ फेंकने का निश्चय करते। पर कुछ न कुछ बीच में अड़ ही जाता। और पिछले तीन महीने में तो स्थिति और भी बद्तर हो गई थी।

आज एक जनवरी है। मोहित दो दिन से ऑफिस टूर पर है। एक हफ्ता बाहर ही रहेगा। पिछले पाँच सालों में यह पहली बार है जब मोहित और शिखा नए साल पर साथ नहीं हैं। शिखा 31 दिसंबर रात 12 बजे से ही मोहित के फोन या मैसेज का इंतजार कर रही थी। अजीब सी जिद थी दिल में, देखूँ मुझे विश करते हैं कि नहीं। पहले वे विश करें फिर मैं विश करूँगी। लेकिन मोहित का न मैसेज आया, न फोन। शाम होते-होते शिखा बिल्कुल बुझ सी गई थी। बार-बार मोबाइल पर मिस्ड कॉल और व्हट्स ऐप पर मैसेज चैक करती। हाथ सिर्फ निराशा लगती। शिखा का गुस्सा और निराशा दोनों बढ़ते ही जा रहे थे।

अब उसे लगने लगा था कि ऐसे रिश्ते का क्या फायदा, जहाँ सामनेवाले को मेरी जरा भी परवाह नहीं है। उसने निश्चय कर लिया था कि रात बारह बजे तक मोहित ने विश न किया तो मैं अपनी जिंदगी का रास्ता अलग कर लूँगी। मैं क्यों मोहित पर बोझ बनूँ ? जब हमें बाँधनेवाला प्यार ही न रहा तो फिर साथ रहने का क्या मतलब रह जाता है ? मगर बेचैनी अब भी साथ नहीं छोड़ रही थी। फाइनली काउंट डाउन भी स्टार्ट हो गया था-

पाँच...

चार...

तीन...

दो....

एक।


नये साल के पहले दिन का आखिरी प्रहर समाप्त हो गया था। शिखा बर्फ सी ठंडी हो गई थी। उसके दिल को पहले से ही इसका अंदेशा था। खैर भारी मन से उसने मैसेज टाइप किया-"हैप्पी न्यू इयर" और सैंड कर दिया। साथ ही बहुत से दृढ़ निश्चय उसे घेरने लगे। ठीक उसी समय उसने एक मैसेज रिसीव किया। मोहित का मैसेज-


"हैप्पी न्यू इयर शिखा। सॉरी आय एम लेट।"


बस इतना ही लिखा था उस मैसेज में, शिखा ने सोचा-


"इतना ईगो, मेरे मैसेज के बाद मैसेज किया। पहले नहीं कर सकते थे क्या ?"


यही सब सोचते हुए उसकी निगाह मैसेज रिसीविंग टाइम पर गई।


"ओह माय गॉड, मोहित ने मुझे खुद से मैसेज किया !"


असल में दोनों के मैसेज का टाइम एक ही था। उस पर मोहित का मैसेज कुछ शब्द लम्बा था। तो उसके रिप्लाय होने का तो सवाल ही नहीं उठता था। अजीब सी खुशी छा गई थी शिखा के मन में। शिखा का चेहरा शिखा की ही तरह दीप्तिमान हो उठा था।


उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। आँखों से आँसू झरने लगे थे। मन भीग गया था। दिल का हिमखंड पिघल रहा था। दिमाग सवाल पूछ रहा था लेकिन जवाब कुछ नहीं था। जेहन में किसी तरह का कोई ख्याल नहीं था। न गुस्सा, न प्यार, न यादें, कुछ भी नहीं। बस कुछ एहसास थे, जिन्हें नाम देना लगभग नामुमकिन था।



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