सियाह लहरें

मेरे जीवन की यह शायद सबसे लम्बी रात रही है। पल भर को नींद नहीं आयी। पूरी रात बिछोह की पीड़ा से होकर निकली थी। बिना भूकम्प के ही मेरा घर हिल गया है। यह प्राकृतिक नहीं पारिवारिक आपदा थी जो ईश्वर ने मेरी भाग्यरेखा में जड़ दिया है।


बहुत कमजोर से लगे थे जब डॉक्टर से मिलकर घर आये थे। सुबह से ही सब काम निर्धारित समय पर कर तैयार बैठी रही। मैं भी साथ जाना चाहती थी लेकिन वे अपने ऑफिस से ही अस्पताल चले गये।


लौटने पर पानी का गिलास देते हुए जब मेडिकल रिपोर्टर के बारे में पूछा तो कहते-कहते मानो कुछ छिपा-सा लिया।

हाँ, कुछ तो था जो असहज-सा लगा था।

यह मेरा भ्रम था या .... 

नहीं , तो और क्या था? लेकिन पनियाई आँखों में दर्द की लहर का सच, जो एकदम से उठते-उठते-से तुरंत शांत हो गया था। असहाय-सी अपने मन को डूबता हुआ महसूस किया मैंने।


डायबिटीज के मरीज हैं वे और साईलेंट अटैक आया था, जिसको वे माईनर अटैक कह कर बता रहें हैं। साईलेंट अटैक का जानलेवा असर बाबूजी में देखा था। कैसे एक जिंदादिल इंसान हँसते-खेलते पल में ही लम्बी कभी ना खत्म होने वाली चुप्पी के सियाह सफर पर निकल पड़ता है। घबराई हुई थी।धमनियों में रक्त मानो बहते- बहते जम गया। मैं बमुश्किल खुद को संभाल रही थी।

"चिंता की बात नहीं है, शारीरिक नुकसान नहीं हुआ है।" ऐसा कहकर उनका तसल्ली देना मुझे, एकदम से नमी की धुँध आँखों में उतर गई। ईश्वर करें ,मेरा शक गलत साबित हो।

रात गले लग कर देर तक सोते हुए उनकी छाती से चिपकी रही। आँसुओं की धार से उनकी बाँहें गीली हो रही थी। वे बच्चों की तरह मुझे थपकी देकर सुलाते रहे।


सुबह उठ कर चाय का प्याला हाथों में लिये मैं उनकी ओर एकटक देख रही थी। वे फिर नजरें चुराते हुए से लगे । शक काला नाग- सा कुण्डली मार कर छाती पर फन काढ़ कर बैठ गया। कुछ तो है जो ये नहीं बता रहें हैं।

"आप ठीक तो हैं ना?" मेरा गला भर्रा रहा था।

"हाँ, क्या होगा मुझे?"

"चिंता लगी है सो पूछ लिया।"

"हूँ, सब ठीक है। खामख्वाह चिंता कर रही हो।"

"मेरी आँखों में देख कर कहिए।"

"कैसी बात कर रही हो।" वह तुनक गये।

उसने कोई जबाब नहीं दिया।

अस्वस्थ पति पर मानसिक दबाब ना पड़े उठकर कमरे में चली आयी और धम्म-से बिस्तर पर निढाल हो गिर पड़ी।

सोने -सा घर अनायास ही लाक्षागृह-सा दहकने लगा था। भावनायें गर्म लावे -सी पिघल कर मानों शरीर के हर अंग पर खदबदाती हुई टीसने लगी थी।

बाथरूम में जाकर आईना देखा तो सिंदूर और बिंदी से चमकता सुबह का बासा चेहरा भी गुलाबी-सा लगा। सुहाग चिंह से परिपूर्ण मैं सुहागन, 

क्या यह क्षणिक सुख है मेरे लिये?

31 अक्टूबर अंतिम तारीख है।

शॉवर खोल कर उसके नीचे देर तक खुद को भिगोती रही।

बात-बात पर मेरा उनसे बहस होना सहसा चुप्पी में बदल गया। मैं सहम गई थी। आने वाला अप्रत्यासित-पल पिघलते हुए सीसे-सा मेरे अंतर्मन को तपा रहा था।

अचानक दुनिया बेमानी- सी प्रतीत हुई। नियती के सामने विवश हो उठता है। भले हम लड़े ,झगड़े, फिर भी जिंदगी भर सिर्फ उनके लिये ही जीना चाहती हूँ। उनके साथ ही मेरे जीवन का अंत हो।

दरवाजे पर बेल बजी।

सिटकनी धीरे से उतार दरवाजा खोल कर देखा, इलेक्ट्रिशियन आया है।

हमारे घर का परमानेंट इलेक्ट्रिशियन है। इस घर का हर कोना उसे जानता है। जरूर उन्होंने बुलाया होगा, बिजली की वायरिंग चेक करवाने के लिये।

" जाईये,वे अंदर हैं हॉल में" कहकर उसको अंदर ले दरवाजे को यूँ ही भिड़ा दिया और अंदर आकर सोफे पर सिमट गई। वे इलेक्ट्रिशियन को लेकर ऊपर कमरे में चले गये। कल कम्प्यूटर में करेंट फैल गया था।घर- गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी वे ही सम्भालते हैं। बाहर और घर ,उनका सब पर बराबर ध्यान रहता है। माँ की दवाई , बच्चों के स्कूल,ट्यूशन फीस,फोन , बिजली ,गैस सिलिंडर सब अपने सिर ले रखा है।


दोस्ती,यारी सबसे दूर ,बाहर कहीं कोई इंगेजमेंट्स नहीं ।एक दम सादा जीवन है । परिवार ही उनकी,हमारी दुनिया।ऑफिस से आते वक्त सब्जी-भाजी , बच्चों के स्टेशनरी से लेकर किराने का सामान लाना सब उन्होंने अपने हिस्से में समेट रखा था। मेरे हिस्से बच्चों की परवरिश, बाई से कपड़े धुलवाना, खाना बनना और डायनिंग टेबल पर सबका इंतजार करना, बस, इतना ही दायरा है मेरा।


बूढ़ी सास है।

वैष्णवों के सभी आचरणों को अपनाया हुआ है उन्होंने। बिना प्याज, लहसुन का खाना, छुआछुत को मुख्य रूप से पालन करते हुए ब्राहम्णी-धर्म का पालन करती और हम सबसे पालन करवाने का यथाशक्ति यदा-कदा कोशिश भी करती रहती हैं।

मैं नहीं मानती इन ढकोसलों को। मेरे लिये सब धर्म बराबर है। इंसान का चरित्र और आचरण ही उसको निम्न और उच्च दर्जा देने का कारण होना चाहिये।


परसों रसोई में झाड़ू लगाते हुए बाई ने पीने के पानी की घुंडी में हाथ लगा दिया था। वैसे तो प्रतिदिन ही छूती थी सफाई करते वक्त, लेकिन माँजी की नजर बचा कर।

पर जाने कैसे आज ठीक उसी वक्त औचक निरीक्षण करती हुई वे प्रकट हो गई और तत्काल ही अपने दैवीय रूप में, उनका धर्म-भ्रष्ट करने के उसके कथित साजिश के लिये उसको बहुत कुछ सुना गई। बेचारी रोती हुई ,बिना काम किये ही चली गयी। उस वक्त पूरा पानी मोरी में उड़ेलना ही पड़ा उनके कहने पर।

पीने के पानी का सप्लाई एकदिन छोड़ कर आता है तो अब दो दिन का निर्वाह मुश्किल था।

वे बाजार गये और बिसलरी के दो बीस- बीस लीटर के जार लेकर आये। तमाशा कर अब वे चुप थीं।

प्यास लगी थी, और दूसरा उपाय नहीं था सो अपने लोटे में पानी उड़ेल कर उसमें तुलसी का पत्ता डालकर गटागट पी गई।

" दादी, यह दुकान का पानी है जाने कितनों ने छुआ होगा भरते और पैकिंग करते हुए। लोड होकर दुकान में आया होगा। अब तो तुमने छुआया हुआ पानी ही पीया है ना!"

" चुप बदतमीज! देखता नहीं , मैंने तुलसी डाल कर पवित्र करके पीया है।"

" तो क्या सिर्फ तुलसी से छुआया हुआ पानी पवित्र हो गया?"


" हाँ, चल पूजा घर में, तुझे भागवत जी में तुलसी-दल की महिमा बताती हूँ।"

" तो तुमने इतना कोहराम क्यों मचाया?बाई को इतना जलील क्यों किया? दो दिन का पानी था वह। फेंकने के बजाय तुलसी से पवित्र करके पीया जा सकता था ना?"

" खामख्वाह उलझ रहा है तू दादी से, जा ,जाकर अपनी पढ़ाई कर!"


मैंने माँजी में अपनी बात मनवाने का जिद पाया है हमेशा। इनको जरा -सा भी कुछ होता है तो मेरे अधर्मी व नास्तिक होने को लेकर अक्सर ताना मारती है। मैं उनकी तरह पूजा पाठ में लीन नहीं रह पाती हूँ। लेकिन कल रात से मैं जाने कितने देव-पितरों को मन ही मन पूज रही हूँ।


अचानक ऊपर कमरे में 'धड़ाम' की तेज आवाज आई तो चौंकी, कलेजा मुँह को आया। कहीं इनको तो कुछ .....!

"नहींss......" बदहवास-सी दौड़ती एक साँस में ऊपर कमरे में पहुँची। लकड़ी का कबर्ड, जिसमें मेरी पुस्तकें भरी थी औंधे मुँह जमीन पर गिरा पड़ा था।

उनको सकुशल देख हृदय की बेचैनी को राहत मिलते ही आँसुओं की बाढ़ बह निकली।

एक अनजाना डर मेरी आँखों में प्रति क्षण किरच-सा करकता रहता है। पल-प्रतिपल मरते हुए भी सुहागन बनकर जीना चाहती हूँ उनके साथ।

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