नीड़ में नीड़ का निर्माण

ऑफिस से लौटा तो बेटी ने चहकते हुए कहा, ‘‘पापा दो लोग अपना प्लॉट देखने आए थे।’’

बेटे ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई, ‘‘हाँ पापा, दो लोग अपना प्लॉट देखने आए थे।’’

में चौंक गया, प्लॉट! कौन सा प्लॉट?

मन शंका-कुशंकाओ में भटकने लगा।

मेरा तो कोई प्लॉट ही नहीं है।

एक मकान बनाना ही मध्यमवर्गीय इंसान के लिए आसमान से तारे तोड़ लाने के समान है। ऐसे में दूसरा प्लॉट या दूसरा मकान मेरे लिए किसी उपग्रह से आए किसी एलियन को अपने बाहुपाश में लेने के समान है।

मन में सोचा शायद कोई पड़ोसी मकान का नक्शा देखने आया होगा। मकान बनाने से पहले न जाने कितने भूलभुलैयों से होकर गुजरना पड़ता है। प्लॉट खरीदो, नक्शा बनवाओ, ठेकेदार ढूँढो। नक्शा कैसा हो? बेडरूम कहाँ हो? लेट्रिन किस तरफ ठीक रहेगी? किचन कौन से मार्बल के साथ अच्छा लगेगा आदि आदि।

आजकल वास्तुशास्त्र का भूत भी मन में ठक-ठक करता रहता है। अनिश्चितता भरी जिंदगी में, कुछ ऊँच-नीच हो जाए तो मन में पहली दस्तक वास्तुशास्त्र ही देता है। आग्नेय कोण में पानी की टंकी, नैऋत्य कोण में रसोई, सारा गड़बड़ घोटाला है। मानसिक अस्थिरता तो हरदम हर आदमी में रहती है। पैसे की कमी हमेशा रहती है। अब कौन मन को समझाए कि 99 का चक्कर अच्छे से अच्छे आदमी को भी परेशान करता रहता है।

जीवन है तो आशा और निराशा भी रहेगी। जहाँ अच्छा होगा वहीं बुरा भी संभव है। बेचारी निर्जीव वस्तुओं का सजीव जीवन पर इतना प्रभाव। डराएँ नहीं तो वास्तुशास्त्रियों की दुकानें कैसे चलेंगी। पंडे पुजारियों ने हमारे मन में धर्म के साथ डर की तलवार तो सदियों से साथ-साथ रख दी है।

भोला मन तलवार की तेज धार की चमक देखकर भयभीत होता रहता है और पंडित-पुजारी धन-धान्य की फसल काटकर अपना घर भरते रहते हैं।

मन में उठती उथल-पुथल और संशय को देखकर बेटा भी चहक कर बोला, ‘‘सच में पापा, जीजी सच कह रही है। दो लोग आए थे। पहले एक आया और फुदक-फुदक कर प्लॉट देखा। फिर दूसरे को बुला लाया। दोनों ने फुदक-फुदक कर अच्छी तरह से देखा। शायद उन्हें जगह पसंद आ गयी।’’

‘‘हाँ पापा, फुदक-फुदक कर देखा दो चिड़ियों ने। अपने पोर्च में फैली मनीप्लांट के बीच बनी तिकोनी जगह पर बैठ-बैठकर मजबूती देखी। सुरक्षित जगह देखी। शायद दोनां को पसंद आ गई हमारे पोर्च की जगह। दोनों ने खुश होते हुए कहा।’’

‘‘चिड़िया, चिड़िया गंदगी किया करेगी। पोर्च में घोंसला नहीं बनने देना है।’’

‘‘नहीं पापा, अपना घोंसला बना लेने दो चिड़िया को। बाहर ही तो बना रही हैं।’’

‘‘नहीं, बिल्कुल नही, बीट कर-कर पोर्च गंदा किया करेंगी। खाना फैलाया करेंगी। गंदगी हुआ करेगी।’’ मैंने स्पष्ट शब्दों में मना किया।

‘‘बना लेने दो चिड़ियों को घोंसला, बना लेने दो पापा।’’

‘‘नीड़ में नीड़ का निर्माण होगा।’’ पत्नी ने भी बच्चों का समर्थन किया।

मैं अपने आपको अकेला पाकर चुप रहा। मन में द्वन्द्व चल रहा था। चिड़ियों को घोंसला बनाने दूँ या न बनाने दूँ। घोंसला होगा तो गंदगी भी होगी। चिड़ियों की बीट का काल्पनिक डर, राक्षस बनकर डरा रहा था। पशु पक्षियों के प्रति हृदय में उठ रहे प्रेमभावों पर गंदगी का डर भारी पड़ रहा था।

बच्चों एवं पत्नी का घोंसले के पक्ष में होना एवं मेरे हृदय का भी चिड़िया के पक्ष में होना, बौद्धिक मन से जीत नहीं पा रहा था।

सभ्य और विकसित समाज में व्यावसायिक और आर्थिक मन, प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव के प्रति सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा था।

‘घोंसला होगा तो चिड़िया आएगी।’

‘उसकी आवाज होगी तो दैनिक कार्यों में व्यवधान होगा।’

‘चिड़िया की चहचहाहट के कारण परेशानी होगी।’

‘कंप्यूटर पर काम करने में ध्यान केंद्रित नहीं हो पायेगा।’

चिड़िया आएगी फिर घोंसले में बैठेगी। घोंसले का तिनका नीचे गिरेगा। अपने स्वभाव के अनुसार कुतर कुतर कर खाना खाएगी। बीट करेगी। गंदगी होगी जिसकी सफाई में श्रम और पूंजी खर्च होगी।’

बैठे बिठाए श्रम और धन की बर्बादी से मेरा मन नहीं मान रहा था। मानसिक द्वन्द्व में दिल और दिमाग, अपने-अपने तर्क और कुतर्कों की तलवारें चमका रहे थे। किसी निर्णय पर पहुँचना कठिन हो रहा था।

अगले दिन सुबह चिड़िया और चिड़ा अपनी चोंच में तिनका दबाकर लाए। जासूस निगाहों से इधर-उधर ताका-झाँकी की। सब कुछ ठीक देख कर मनीप्लांट के सहारे के लिए बाँधी गई डोरियों के बीच बने त्रिकोण पर पहला तिनका रखा। मकान निर्माण से पहले नींव का पहला पत्थर जमाया। चिड़िया ने भी अपनी चोंच का तिनका जमाकर रखा। फिर अपनी गोल-गोल आँखें घुमाकर चारों ओर देखा। फिर चली गई।

मैंने तिनका रखा देखा। दिल ने चाहा कि नीड़ का निर्माण शुरू हो जाए। मन में खुशी की लहर उठने लगी।

तभी मन ने झिड़का, ‘‘खुश हो रहे हो। पोर्च में सामने से घोंसला घास के ढेर जैसा लगेगा। घर में घुसते चिड़िया की चीं-चीं कान कैसे बरदाश्त कर पाएंगे’’

जबकि विभिन्न तरह के शोरगुल, टीवी, कंप्यूटर, फ्रिज और मोबाइल की आवाज को सुनने में कानों को कोई आपत्ति नहीं थी।

दिल में फिर द्वन्द्व चला। तिनके को पकड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ने लगा। फिर प्रकृति प्रेम ने दिल में हिलोर ली और आगे बढ़ा हुआ हाथ, अपने आप पीछे हट गया।

सभ्यता और असभ्यता का द्वन्द्व छिड़ा हुआ था।

प्राकृतिक घोंसले के पक्ष और विपक्ष में तीर चल रहे थे।

हालाँकि इंटीरियर डेकोरेटर ने घर में नकली पिंजरा, जिसमें बैठी चिड़िया, स्विच चालू करने पर चीं-चीं की आवाज करती थी, टंगवा रखा था।

सजावट के लिए अलमारी में नकली घोंसले में नकली चिड़िया भी बैठी हुई थी।

पशु पक्षियों के प्रति मानव प्रेम को दर्शाती हुई भारतीय संस्कृति और सभ्यता के साथ असभ्यता और जंगलीपन का एहसास दिलाता, असली घोंसला, मन में हलचल पैदा कर रहा था।

द्वन्द्व में दिल हार गया। हाथ ने आगे बढ़कर तिनका उठाया और तुड़ी-मुड़ी कर बाहर सडक पर फेंक दिया।

‘‘देखता हूँ कैसे बनाओगी घोंसला। तिनके को मसला और फेंक दिया।’’

चिड़िया और चिड़ा फिर से तिनके अपनी चोंच में दबाकर लाए। पहले से जमा हुआ तिनका जगह पर न पाकर उन्होंने आपस में देखा। फिर अपन-अपने तिनके जमाए, बिना किसी शिकवा और शिकायत के। फिर से उड़ गए तिनका-तिनका जोड़ कर अपना आशियाना बनाने।

शाम को ऑफिस से घर लौटा तो बच्चे और पत्नी चिड़िया की कार्य कुशलता के बारे में बातें कर रहे थे।

बच्चों ने खुश होकर कहा, ‘‘देखो पापा, चिड़िया ने घोंसला बनाना शुरु कर दिया है। एक-एक तिनके को कितने अच्छे ढंग से गूँथा है आपस में।’’

‘‘पापा, पापा, चिड़िया तिनका गूँथती जाती है। फिर वह बैठकर देख लेती है कि कहीं घोंसला कमजोर न हो।’’ बेटी ने भी चिड़िया की कार्यकुशलता और कारीगरी की तारीफ की।

‘‘और पापा, मैंने पास में ऊन रख दी। चिड़िया ने उसे लेकर तिनकों के बीच में उसे फंसा-फंसा कर बांध दिया।’’ बेटे ने भी चिड़िया की दक्षता की तारीफ की।

पत्नी अंदर गई और रुई का टुकड़ा मनीप्लांट की बेल पर रख दिया।

चिड़िया की कारीगरी देख कर मुझे भी अच्छा लगा। घोंसला नीचे की ओर कुछ कमजोर सा लगा। मैने कहा, ‘‘इससे चिड़िया गिर सकती है।’’

‘‘नहीं पापा, चिड़िया बार-बार बैठकर उछल-उछल कर घोंसले की मजबूती देखती जा रही है।’’ बेटा बेटी ने पूरे दिन घोंसला बनाए जाने की प्रक्रिया को देखा था।

मेरा मानसिक द्वन्द्व खत्म हो चुका था। मन ने घोंसले का अस्तित्व स्वीकार कर लिया था। किसी कुशल कारीगर की तरह चिड़िया और चिड़ा को घोंसला बनाते देखने का कौतूहल, मेरे अंदर भी पैदा होने लगा था। बेटी, बेटा और पत्नी द्वारा चिड़िया की दक्षता का वर्णन, मेरी आँखें स्वयं देखना चाहती थीं।

जैसे ही चिड़िया आकर बैठती, बच्चे पुलकित होकर जाली से चुपके-चुपके देखते और कहते, ‘‘पापा, चिड़िया आ गई है।’’

मैं अपनी उत्सुकता की प्यास बुझाने के लिए जैसे ही धीरे से दरवाजा खोलता। चिड़िया तुरंत उड़ जाती। बिना आवाज के ही उसको पता लग जाता। जैसे वह मेरे मन में उसके प्रति उठ रहे मेरे विचारों से अवगत थी कि मैं कहीं उसको पकड़ न लूँ। उसकी गर्दन न मरोड़ दूँ। जैसे शुरुआत के दो तिनके मैंने तोड़-मरोड़ कर सड़क पर फेंक दिए थे।

भयभीत होकर वह उड़ जाती। सड़क पर बिजली के तारों पर बैठकर कातर नजर से टुकुर-टुकुर देखती रहती। शायद उसे मुझसे बड़ा भय था कि मेरी पैशाचिक प्रवृति उसकी कड़ी मेहनत को बर्बाद न कर दे। उसके सपनों के महल को नेस्तनाबूद न कर दे।

मैं लुटा-पिटा सा चिड़िया को डरते देखता रह जाता। बिना प्राणी के घोंसला वियाबान में उपेक्षित खंडहर महल जैसा लगता। सब लोग चिड़िया के शिल्प, दक्षता और कारीगरी को बयान करते। जिसको मैंने कभी नहीं देखा था। मैं मन मसोसकर रह जाता। दिल में चिड़िया के प्रति स्नेह जग जाता।

आखिर सभ्य समाज के आधुनिक मानव के शरीर में दिल तो वही आदिम जंगली पूर्वजों का था। आँखों पर, मस्तिष्क में भले ही विकास और विकसित होने का चश्मा लग चुका था। रहन-सहन, आवास-निवास कंक्रीट के जंगलों में रच-बस चुके थे। परंतु दिल की धड़कनों में जंगली खुशबू, धरती की हरीतिमा विराजमान थी।

बच्चों ने झाड़ू की सींकें घोंसले के पास ले जाकर रख दीं ताकि चिड़िया उसका उपयोग घोंसले में कर सके। पत्नी ने साइकिल की पुरानी कंडी टांग कर उसमें चावल आदि रख दिए ताकि चिड़िया उनको खा सके।

मेरे अंदर भी प्यार की हिलोरें उठ रहीं थीं। चिड़िया के बहाने प्रकृति के साथ अपनी चाहत मैं रोक न सका। रोटी का एक टुकड़ा लेकर मैंने उसके घोंसले के पास रख दिया।

चिड़िया आई। तिनके को कुशलता से घोंसले में गूँथा। पास रखी रोटी को नजर उठाकर भी नहीं देखा। कर्म के प्रति लगाव देख कर गीता के श्लोक ‘कर्मंण्येवाधिकारस्ते...........’ का स्मरण हो आया। कथनी की बजाय करनी की प्रतिमूर्ति थी चिड़िया।

बच्चों के द्वारा रखे गए रुई के टुकड़े को बखूबी उसने घोंसले में नीचे बिछा लिया। फिर कूद-कूद कर मजबूती देखी। बच्चे खुश हुए।

चिड़िया के द्वारा घोंसला बनाया जाना देखना उनके दैनिक क्रियाकलापों में रच-बस गया था। बच्चे स्कूल जाते समय, होम-वर्क करते समय, बीच-बीच में जाकर चिड़िया को दो पल जरूर निहार लेते। मेरे द्वारा रखी गई रोटी को एक बार भी उसने नहीं कुतरा। मेरे मन में फिर द्वन्द्व छिड़ गया।

मन ने प्रश्न किया, तुम मानव हर चीज पर अपनी श्रेष्ठता क्यों सिद्ध करना चाहते हो। प्रकृति में अन्य जीवों के भी मन-मस्तिष्क है। वे भी अपनी मर्जी से सोचते, विचारते और कर्म करते हैं। उनके अपने बनाए हुए नियम हैं जिनका वे पालन करते हैं।

तुम मानव हमेशा चाहते हो कि हर चीज तुम्हारे हिसाब से चले। यह चिड़िया है तुम्हारे ड्राइंग रूम में सजी हुई नकली चिड़िया नहीं, जो तुम्हारे इशारे पर चीं-चीं करने लगे और तुम्हारे इशारे पर चुप हो जाए।

मैं घोंसला बनाए जाने का विरोध कर रहा था। अब बच्चों और पत्नी के साथ घोंसले के कौतूहल में शामिल हो गया था। अब हम चारां का कौतूहल बढ़ता ही जा रहा था। हम सब चाहते थे कि घोंसला बनाए जाने की प्रक्रिया रिकॉर्ड करके रख ली जाए। काफी प्रयासों के बाद भी रिकॉर्डिंग नहीं हो पाई। अभी चिड़िया हमसे घुल-मिल नहीं पा रही थी।

हम चारों को नए मेहमान के आगमन की उत्सुकता थी। घोंसला बन गया था। चिड़िया और चिड़ा ने बारीकी से घोंसले की मजबूती और सुरक्षा देख ली थी। अभी तक चिड़िया और चिड़ा के बोलने की आवाज हमने नहीं सुनी थी। हम लोग सोच रहे थे कि शायद चिड़िया बोलती नहीं है।

एक दिन ऑफिस से लौटकर आया तो बच्चे बोले, ‘‘पापा, घोंसले में अंडे हैं। चिड़िया बार-बार आकर घोंसले में बैठ रही है। हम लोगों का कौतूहल बढ़ गया था। हम लोग अंडों को देखना चाहते थे। कितने हैं? कैसे हैं? और कितने बड़े हैं? साथ ही मन में भय हो रहा था कि कहीं चिड़िया हमें देख न ले। नहीं तो नए मेहमान आगमन से पहले ही काल के गाल में समा जाएंगे।

मन में तीव्र उत्कंठा जागृत हो रही थी। बच्चे भी अंडे देखने के लिए उत्सुक थे। मैंने स्टूल रखकर, उस पर खड़े होकर, शीशा लगाकर अंडे देखे। मन प्रफुल्लित हुआ। घोंसले में सफेद और कत्थई रंग के चितकबरे दो अंडे रखे हुए थे।

बच्चे भी अंडे देखना चाहते थे। पर हम लोगों को डर था कि चिड़िया हमें देखकर घोंसले के पास न आए। नीड़ के अंदर मेहमानों का आगमन होने जा रहा था। सारी प्रक्रिया कैसे पूर्ण होती है निर्माण की। मैंने बच्चों को घोंसले के ऊपर शीशा लगाकर अंडों को दिखाया।

बच्चे पुलकित हो गए। अंडो की रिकॉर्डिंग चिड़िया की नजरों से बचा कर कर ली। आखिर हम मानव थे आँखों से काजल चुराना अच्छी तरह से जानते थे। चिड़िया हमारी धडकनों में शामिल हो गई थी। हमलोग भरसक प्रयत्न करते कि चिड़िया घोंसले से हमारी नजदीकी को पहचान न जाए।

आठ नौ दिन अंडे सेने के बाद, मांस के लोथड़े जैसे चूजों का आगमन हो गया।

चिड़िया मेरी सोच से भी ज्यादा सफाई पसंद थी। मैं गंदगी होने के डर से उसे घोंसला नहीं बनाने देना चाहता था। पर चिड़िया ने गंदगी तो दूर, घोंसले का एक तिनका तक नीचे नहीं करने दिया।

अंडो से चूजे निकले तो वह टूटे अंडो को बाहर फेंक आई। साफ सुथरे घोंसले में रुई के मुलायम बिस्तर पर बैठे चूजों की हमने रिकॉर्डिंग की। चूजों को चिड़िया अपने शरीर की गर्मी पहुँचाती। फिर उड़कर जाती और चोंच में इल्ली, कीड़े मकोड़े दबाकर लाती। अपनी आवाज में चूजों को जगाती। उनके नन्हें मुँह में उन्हें डालती। प्रकृति ने ही प्राणी को अपने-अपने हिसाब से समझ और स्वास्थ्य के प्रति सजगता दी है। चिड़िया अपने चूजों के लिए पेड़ों से निकला हुआ गोंद लाती। उन्हें खिलाती। कभी कभी छोटी छिपकलियां भी अपनी चोंच में लाकर उन्हें खिलाती। शायद छिपकली का जहर उनके शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता होगा।

अब हम लोगों ने चिड़िया का चहचहाना सुना और हमारे सारे पूर्वानुमान गलत साबित हुए कि चिड़िया किसी ऐसी प्रजाति की है जो बोलते नहीं हैं। चिड़िया का चहचहाना ऐसा लगता मानो माँ अपने बच्चों से कह रही हो ‘‘उठो खाना खा लो।’’ फिर खाना खिलाते समय लोरी जैसी गुनगुनाती रहती।

बच्चे अभी अबोध नासमझ थे। पर माँ के हृदय को अपनी संवेदनाएं बच्चों तक पहुँचाना आता है। ठीक मेरी पत्नी की तरह जो बिल्कुल छोटे बेटे-बेटी के साथ अपना वार्तालाप जारी रखती थी और उपहास का पात्र बनती थी।

हर दिन चूजों को देखना, उनके कार्य-कलापो को देखना, हमारी धडकन में बस गया था। चूजे अब बड़े होने लगे थे। चिड़िया जैसे ही आती, आवाज लगाती, चूजे स्पंदन पाकर अपनी चोंच खोल देते। किलकने लगते। चिड़िया चोंच मे दबाकर लाया कीड़ा उनको खिलाती। उनके ऊपर बैठकर अपने शरीर की गर्मी पहुँचाती।

हमारा प्रयास रहता कि हम चिड़िया और चूजों की दैनिक प्रक्रियाओं, उनके विकास को देखें और रिकॉर्ड करें। पर हम यह ध्यान भी रखते कि चिड़िया अपने चूजों को त्याग न दे। बच्चे बड़े हो रहे थे। चूजों को चिड़िया का मातृत्व, उनके विकास में सहयोग दे रहा था। उनके हाथों जैसे पंख निकलने लगे थे। स्पंदन के साथ वे उन्हें हिलाने लगते थे। जैसे वे अपनी माँ को बुला रहे हों। देखते-देखते बच्चे बड़े हो गए। हाथ नुमा संरचना पंखो में बदल गई। अब चूजे नन्हीं चिड़िया में परिवर्तित हो चुके थे। चहचहाहट गूँजने लगी थी। मेरा संशय दूर हो गया था। उनके चहचहाने से कार्यों में कोई बाधा नहीं पड़ती थी। उल्टे उनकी चर्चा करना अच्छा लगने लगा था।

बच्चे खुश, पत्नी खुश, मैं खुश कि मेरे नीड़ में नीड़ का निर्माण हुआ।

मेरे नीड़ में दो नए मेहमान आ गए थे।


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