सपने से जाग उठी साधना फिर विस्मित थी, रात के करीब दो बजे होंगे । हालांकि सपना डरावना नहीं था पर सपने की सार्थकता के भय से साधना थोड़ी सहम जरूर गई थी। ख़ुद को समझाते हुए बस इतना ही कह पाई थी "नहीं ऐसा बार - बार कैसे हो सकता है ?" यादों की परत खुल रही थी, पिछले पुराने सपने के साथ जिसने उसकी ज़िंदगी को एक नया आयाम दिया था।

सपने के सफ़र में साधना कई कई गलियों से गुजरते हुए एक ऐसे भवन में पहुँची थी जो प्राचीन स्थापत्य कला का सुंदर संसार सरीखा था, जहाँ कोई चहल पहल नहीं, बिल्कुल शांत जगह। भवन से थोड़ी दूरी पर एक ख़ूबसूरत झील जिसमें उसने वोटिंग भी की।उसके बाद कुछ ऐसा हुआ कि पुरातन मूर्तियों के उल्टे पुल्टे चित्र सचित्र होते हुए उसकी आँखों के सामने से बहुत ही तेज गति से गुज़र गए थे। फिर महज दस सेकेंड्स के लिए उसके साथ एक आलिंगनबद्ध साया दिखा था और वो इतना स्पष्ट था कि उसे विस्मृत कर पाना मुश्किल था। और तब किस तरह वह हड़बड़ा कर उठ बैठी थी। अपने घुटनों पर सिर रख कर सोचती रही थी ना जाने कितनी देर तक...

धीरे-धीरे दिन बीतते गए साधना अपनी बी. फॉर्मा की पढ़ाई में व्यस्त हो गई। फिर कुछ ऐसा हुआ साधना की मुलाकात रजनीश से हुई मानो पहले उससे मिल चुकी हो। तब उसने ख़ुद से कहा था.. कहीं सपने में तो नहीं...

साधना, रजनीश की आँखों की गहराई में डूबती उतरती चली गई और उसकी जादुई नज़रों के बाहुपाश में कब कैद हो गई पता ही नहीं चला। इधर रजनीश साधना की प्रतिभा का कायल हो चुका था। प्रेम की इस बयार में दोनों काफ़ी करीब आ चुके थे और फिर दोनों ने दो साल बाद शादी कर लेने का फैसला लिया।

कुछ दिनों बाद रजनीश के साथ साधना शॉपिंग करने गई। वहाँ शॉपिंग मॉल से उनके साथ दोस्त दंपत्ति वीणा और मनीष भी साथ हो लिए थे। झील में वोटिंग की और बाद उसके एक बहुत ही प्रसिद्ध प्राचीन भवन की ओर चल पड़े। चलते चलते साधना को कभी-कभी एहसास होता जा रहा था जैसे ये रास्ते कुछ कुछ जाने पहचाने हैं, नितांत एकाकीपन के साथ। लेकिन दोस्तों के साथ की उमंग और नए जीवन का रोमांच इन सबके बीच वो बातें गौण हो गई थीं उस वक्त।

अब वे सब एक बड़े से प्राचीन भवन के सामने खड़े थे, जिसके प्रांगण से दायीं तरफ वाली मंदिर में दर्शन के लिए साधना वीणा के साथ चल पड़ी। चलते ही साधना ने ख़ुद से कहा.. ये क्या? उस दरवाजे तक पहुँचते ही ठिठक सी गई वह, पर इग्नोर करते हुए उसने अपना पहला कदम चौखट पार करने के लिए जैसे ही बढ़ाया तो इस बार वह स्तब्ध रह गई !!! उसने वीणा का हाथ जोर से पकड़ लिया क्योंकि हू-ब-हू ये वही प्रतिमाएं थीं जो कुछ दिनों पहले सपने में आईं थीं। उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था, स्मृति आपको कभी ऐसी स्थिति का भी सामना करवा सकती है क्या? कितना अविश्वसनीय था सब। मतलब ये कि पुरातन मंदिर जिसे उसने सिर्फ़ सपने में देखा था वो आज भी मूर्त रूप से इस शहर में "गीता मंदिर" के नाम से स्थित है। हक्की बक्की साधना चुपचाप रजनीश के हाथ को अपने हाथों में लेते हुए कहा अब कहीं नहीं, सीधा घर चल लो प्लीज़ राज़ी प्लीज़...

और इतने दिनों बाद आज के सपने में उसने देखा कैसे रजनीश और वह मूवी देखकर लौट रहे हैं, अचानक रास्ता किसी जंगल की ओर चलने लगता है और साथ साथ वे भी। कुछ दूर यूँ ही पैदल चलते चलते रास्ते में साधना की आँखों के सामने से एक अस्पष्ट सा साया गुज़र जाता है और साधना की नींद खुल जाती है। आँखें खुलते ही वह बेचैन सी हो गई थी क्योंकि सपना कुछ अजीब सा एहसास दे गया था।

रजनीश ने अधमुंदी आँखों से देखते ही साधना को अपनी ओर खींचते हुए पूछा क्यों परेशान हो बताओ। आपबीती सुनाते सुनाते अंत में बस इतना ही कह पाई थी वह जानते हो रजनीश तुमसे मिलने से पहले भी साए के ही सपने से रूबरू हुई थी मैं। मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है।

ओह ! बस इतनी सी बात अलसाई हुई आवाज़ में रजनीश ने कहा। अरे ऐसा कुछ नहीं है कि हर सपना अपने वजूद को तलाश ही ले। मिथक के भ्रम से निकलो और चलो अब सो जाओ। ऐसा ही हो रजनीश, "मेरा तो यही सपना है, कि तुझे ही देखूँ सपनों में..." रजनीश ने छेड़ते हुए तब ये भी कहा था या इस बार कहीं तुम डिजिटल साये के गिरफ़्त में तो नहीं, वहाँ परजीवियों का जंगल ही तो है क्यों? बोलो... सुनते ही साधना ने रजनीश से कहा ओह तुम्हारे अंदाज भी ना.....

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