बस एक कोना ही काफी है

क्यूँ भई ,आज चाय -वाय मिलेगी या नहीं।निर्मल की आवाज सुनकर तन्द्रा भंग हुई ज्योति की।ऑफिस से आये हुए निर्मल ने पुछा की,किन ख्यालों में खोयी हो।

ज्योति क्या कहती ,वो तो सच में जैसे विशाल सागर की गहराईयों में डूबती चली गयी थी।वह सोचती भी क्यों न आखिर उसे अपनी जिंदगी से एक ऐसे प्रश्न का उत्तर जो मिल गया था ,जिसके जबाब की तलाश उसे बारह बरस से थी।ऐसा लगा जैसे कल की ही बात हो,आज से बारह बरस पहले जब ज्योति पिता के आंगन का अपना बसेरा छोड़कर ,छोटा सा घरोंदा बसाने ससुराल आ गयी थी

संयोग वश उस समय न मोबाइल का इतना प्रचलन था,न ही किसी अन्य माध्यम से ज्योति और निर्मल के बीच कोई विशेष संवाद हुआ था। वह अपने पति के स्वभाव से लगभग अनभिज्ञ ही थी याअपने पति से प्रथम वार्तालाप में उसे कुछ यूँ लगा कि जैसे वो छली जा रही हो ,जैसे उसके नाजुक हृदय पर किसी ने कुठाराघात कर दिया हो।ज्योति के निर्मल से पुछा था,कि उसके जीवन में ज्योति की क्या जगह हैतो निर्मल ने उससे साफ शव्दों में कहा था कि मेरे मन में सभी परिवारी जनों का अपना अपना स्थान है।माँ-बाप,भाई बहिन,भतीजे भतीजी व अन्य सभी के साथ उसके ह्रदय का एक कोना ज्योति के लिए भी सुरक्छित है।वैसे तो यह कोई अनर्गल बात न थी,पर ज्योति को ठेस इसलिए लगी क्यों को वह तो निर्मल के ह्रदय पर अपना पूर्णाधिकार चाहती थी।

शादी के शुरुआती दिनों की ही तो बात है कि भतीजी के बीमार पड़ने पर निर्मल ही उसे दवा देते ,निर्मल ही रात भर जागकर उसका ध्यान रखते ।इन सब में ज्योति को उपेछित सा महसूस होता।

साल दर साल ज्योति ने निर्मल के साथ जीवन के कई रंग देखे।चाहे परिवार में किसी की कोई समस्या हो,या किसी दोस्त की मुसीबत ,उसने निर्मल को सबकी जरूरतों में बराबर से खड़ा पाया।धीरे धीरे उसे पति की आदतें और स्वाभाव समझ भी आने लगा था और पदंड भी।स्वयं ज्योति के लिए निर्मल हमेशा खड़े रहते।घर में होली दीवाली अतिरिक्त काम होने पर जब हम बहुए परेशान होती तो वह निर्मल हो होते जो आगे बढ़कर कहते तुम लोग साफ सफाई कर लो,ऑफिस से आकर शाम की सब्जी में बना दूंगा और सब हंसी खुसी काम में लग जाते।।

ज्योति की यादें और गहराने लगीं,उसे एक घटना याद आ गयी जो उसके मन को गहराई तक भिगो गयी थी।हुआ यूँ की ज्योति को जॉब तो मिलि लेकिन उसके शहर से 500 किलोमीटर दूर।ज्योति ने ज्वाइन तो कर लिया पर अपनों से दूर और अकेले रहना ज्योति के लिए बड़ा कष्टप्रद था। उसका व निर्मल का मिलना जुलना दो तीन महीने बाद ही हो पाता था।एक बार जब वो छुटिटयां बिताकर बापस जा रही थी तो निर्मल उसे ट्रैन में बिठालने स्टेशन आये थे।वो तो कोच में जाकर अपनी बर्थ पर बैठ गयी पर निर्मल बहार प्लेटफॉर्म पर खड़े थे।इंजन ने सीटी दी और ट्रेन ने रेंगना सुरु कर दिया।

निर्मल देख रहे थे की कैसे ज्योति डबडबायी आँखों से उन्हें अपलक निहारे जा रही थी।ये ज्योति की आदत थी की जब तक निर्मल आँखों से ओझल नहीं हो जाते बह उन्हें टकटकी लगाकर जी भर कर देखती रहती थी। अचानक कुछ दूर जाकर ट्रैन रुक गयी शायद किसी ने वहीँ पुलिंग कर दी थी।पर ये क्या निर्मल दौड़ लगाकर आये और फिर से खिड़की के उस पार खड़े हो गए।जब ज्योति ने पुछा तो निर्मल ने जो जबाब दिया वो ज्योति के मन को छू गया। निर्मल बोले,"में इसलिये दौड़कर आ गया कि तुम मुझे फिर से देख सको"।

समय पंख लगाकर उड़ चला पर कहीं न कहीं ज्योति के मन में ये बात दबी रहती थी कि उसे निर्मल के प्यार पर एकाधिकार नहीं मिल पाया।

परंतु अचानक घटी एक घटना से आज ज्योति को हर बात का जबाब मिल गया था।ज्योति की मां बाथरूम में फिसल कर गिर गईं थीं और उनके कूल्हे में फ्रैक्चर हो गया था।उसके मायके के शहर में इतनी चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं ।इसलिये पापा उन्हें ज्योति की ससुराल बाले शहर में ले आये थे।खबर मिलते ही ज्योति भी निकल पड़ी आने के लिए।पर उसके आने तक सब कुछ निर्मल ने ही संभाला था,डॉक्टर से मिलना , एक्स रे करवाना,अस्पताल में भर्ती करवाना सब कुछ

डॉक्टर ने हिप रिप्लेसमेंट के लिए बोला था और ऑपरेशन दो तीन दिन बाद होना था।डॉक्टर ने दो यूनिट ब्लड जमा करवाने को बोला जो हमने जमा करा दिया।पर आपरेशन के दौरान ब्लीडिंग ज्यादा होने के कारण डॉक्टर ने और ब्लड माँगा।ज्योति और उसकी माँ का ब्लड ग्रुप एक था इसलिए वह जल्दीसे पैथोलॉजी गयी और ब्लड निकलवाने लगी।इधर मौसम बहुत खराब हो गया और बारिश शुरू हो गयी।अब ज्योति का मन बहु त घबराने लगा की कैसे भी ब्लड जल्द से जल्द अस्पताल पहुँच जाये।निर्मल ऑफिस से सीधे पैथोलॉजी पहुँचे और ज्योति से बोले की तुम ऑटो से आती रहना में ब्लड लेकर बाइक से अस्पताल पहुँचता हूँ।

शायद वो पल ज्योति कभी भुला नहीं पायेगी कि कैसे निर्मल ने बारिश से बचाने और खून को गर्म रखने के लिए अपनी शर्ट के बटन खोले और खून की थैली अपने सीने से लगाकर बटन बंद कर लिये।सच उसकी आँखों की पोरों से आंसू ढलक आये थे।सब कुछ सही से हो गया।माँ सफल आपरेशन के बाद घर जा चुकीं थीं और आज फुर्सत के पलों में जब ज्योति उन पलों को दुबारा जीने के लिए बैठी तो उसे निर्मल केवल नाम से निर्मल नहीं ह्रदय से भी निर्मल नजर आ रहा था।आज ज्योति को बारह बरस पहले निर्मल की कही एक एक बात याद आ रही थी कि मेरे दिल में सभी रिश्तों की अपनी अपनी जगह हैऔर आज वो उन शब्दों की सच्चाई की पूरी तरह महसूस कर पा रही थी।सच निर्मल ने ठीक ही तो कहा था कि हर शख्स की दिल में अपनी जगह होती है न किसी की कम न किसी की ज्यादा।और ज्योति उसे इतने बरसों में जो जगह कम लग रही थी आज वह उसमे पूर्ण संतुष्ट थी।

क्या हुआ,कहाँ खोयी हो??निर्मल की आवाज दुबारा सुनकर ज्योति अपने आज में लौट आयी और ख़ुशी से झूमते हुए बोल उठी,"हाँ मेरे लिए बस एक कोना ही काफी है"।

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