प्रेम में एक ताप होता है।जो व्यक्ति इस ताप से समुचित मात्रा में भाप नहीं बना पाता वह आख़िरकार पश्चाताप ही करता है।मैं भी कर रहा हूं।कर तो कई वर्षों से रहा था,लेकिन ज़ाहिर आज कर रहा।देर इसलिए हुई कि सोचता रहा शायद इस पश्चाताप के ख़रीदार मिल जाएं।ऐसा इसलिए सोचता रहा क्योंकि इसके ठोस कारण हैं।कारण हमेशा ठोस होते हैं।एक ठोस लेखक को ठोस विषय पर लिखते समय ठोस कारणों को हमेशा ठोस तरीके से रखना चाहिए।

कारण क्या हैं,सुनिए।कारण से पहले उदाहरण। प्रेम एक गन्ना है।गन्ना चूसने से लेकर पेरने,रस निकालने,गुड़ बनाने,शकर बनाने और अंतत: सिरका बनाने के काम आता है।इस अंतत: के बाद भी एक अंतत: है।वह यह कि अगर झगड़ा हो जाए तो गन्ने से कार्यकारी लाठी का काम भी लिया जा सकता है।पाठक शंका न करें,केवल संपादक ही कार्यकारी नहीं होता।

गन्ने को हर हाल में किसी न किसी तरह के खरीदार मिल जाते हैं ।बस किसान थोड़ा कुशल हो।और थोड़ा ज़्यादा ही कुशल हो।उदाहरण के बाद वैसे ही प्रेम को समझिए।प्रेम सफल हो जाए तो बेचिए,असफल हो जाए तो बेचिए।मुझे ख़रीदार नहीं मिले।मैं प्रेम की किसानी का कुशल किसान न बन सका।फिर मैं प्रेम की मंडी का थोड़ा ज़्यादा ही कुशल बेचनहार न हो पाया। इसलिए हारे को हरिनाम।इसीलिए प्यारे को पश्चाताप।यही कारण है कि कर रहा हूं।

मैंने प्रेम का पश्चाताप करने के लिए इतनी तैयारी की है जितनी प्रेम करने के लिए भी नहीं की थी। इतनी करता तो शायद सफल हो जाता।तैयारी?जी तैयारी।प्रेम करने की तैयारी।शुरूआत में ही कुछ सवाल ख़ुद से पूछने चाहिए।जैसे; मैं प्रेम क्यों कर रहा।क्या दुनिया में भले आदमियों के करने लायक कोई और काम नहीं बचा।मेरे प्रेम का आउटपुट क्या होगा! प्रेम में छिटपुट से काम नहीं चलता।मैं कब तक प्रेम करूंगा।नौकरी लगने तक या किसी अन्य अप्रेमित (जिससे किसी ने प्रेम न किया हो या जिसने किसी से प्रेम न किया हो ऐसी पवित्र) लड़की से विवाह होने तक।कब तक?ऐसे बहुत से सवाल हैं।जो लोग ऐसे सवाल हल कर लेते हैं उनके हालचाल पूछने के लिए दुनिया उत्सुक रहती है।जो नहीं कर पाते,प्रेम उनके हलक में फंसा रहता है।

एक युवा कवयित्री ने लिखा कि प्रेम कहानी लिखते वक्त सबसे ज़रूरी है कि आप किसी के प्रेम में न हों ।इतिहास गवाह है कि सारी युवा कवयित्रियां मेरे विरुद्ध रही हैं।अब आप बताएं यह बात पहले पढ़ लेता तो आज मैं पश्चाताप न कर रहा होता।ओ कवयित्री!ध्यान से सुनो।कहानी लिखने की तो छोड़ो ,प्रेम करते वक्त भी सबसे ज़रूरी है कि आप किसी के प्रेम में न हों।तो कहां हों?गणित इस दुनिया में सबसे अच्छी जगह है,रहने के लिए।जो प्रेम की गणित में रहता तो आज मेरा हर कदम हीराजड़ित होता।प्रेम करते समय प्रेम में न रहें,यह कोई सामान्य वाक्य नहीं है।इसे अंग्रेजी में किसी अल्बर्ट या वाल्टर या लीविस के नाम से जोड़कर यहां लिखता तो मुझे बहुत बड़ा विचारक मान लिया जाता।जिसके पास जितने अधिक उद्धरण होते हैं वह प्रसिद्धि का रण उतनी आसानी से जीत लेता है।मुझे सख़्त अफ़सोस है कि मैंने प्रेम किया।प्रेम के उद्धरण याद नहीं किए।जैसे एक सुभाषित है कि हर काम साक्षी भाव से करो।मैंने नहीं किया।इस भाव का मतलब भारतीय दर्शन में बार बार समझाया जा चुका है।यानी आसक्ति से ऊपर उठो।प्रेम के कीचड़ में कमल की तरह रहो।सुख दुख हानि लाभ जय पराजय में समान भाव से प्रेम करो।अपने सुख में उसके दुख में,उसकी हानि में अपने लाभ में,अपनी जय में उसकी पराजय में सम रहो।यह प्रेमप्रज्ञ होना है।स्थितिप्रज्ञ की तरह।मैं मूरख ऐसा कर पाया।भारतीय दर्शन मुझे कभी क्षमा नहीं करेगा।

क्षमा तो मुझे स्वामी विवेकानंद भी नहीं करेंगे।उन्होंने कहा था कि फूलों के लिए रुको नहीं।आगे बढ़ो,फूल तुम्हारे रास्ते में खिलते रहेंगे।बताइए।मैं एक ही मुहल्ले में रुका रहा।काश मैं मुहल्ले मुहल्ले बढ़ता रहता।फूल खिलते रहते या मैं रोज़ कोई न कोई गुल खिलाता रहता।फूलों,मुझे माफ़ करना।मुझे तो कहावतों ने भी लूटा।मैं एक पुराने भरोसे पर कायम रहा और कायम चूर्ण की गति को गया।भरोसा सुनिए।लोग कहते हैं ना कि जिसने मुंह चीरा है वह भोजन की व्यवस्था भी करेगा।मैं समझता रहा कि जिसने होठ दिए,वह चुंबनादि का इंतज़ाम भी करेगा।जिसने बाहें दीं वह आलिंगनादि की व्यवस्था भी करेगा।जिसने....।ख़ैर जाने दीजिए।इससे आगे न मैं कह पाऊंगा न आप सुन पाएंगे।किस्सा कोताह यह कि चीरने वाले ने चीरा तो तबीयत से मगर इंतज़ाम कुछ नहीं किया।मैं भारतीय विश्वासों को कभी माफ़ नहीं करूंगा।

एक कहानी पढ़कर मैंने उसकी नैतिक शिक्षा का लाभ भी नहीं उठाया।इसका दुख मुझे आज तक है।क्या पता कहानी सच ही निकलती।आपने उस लकड़हारे की कहानी पढ़ी होगी जिसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गयी थी।बाद में वनदेवी ने उसे सोने और चांदी की कुल्हाड़ियां दिखाईं।लकड़हारे ने कहा कि ये मेरी नहीं हैं।तब वनदेवी ने लोहे की कुल्हाड़ी दिखाई।लकड़हारा ख़ुश हो गया। वनदेवी प्रसन्न हो गयीं।उन्होंने तीनों कुल्हाड़ियां लकड़हारे को सौंप दीं।मैं सोचता ही रह गया।आज सोचता हूं तो लगता है कि हिम्मत करनी चाहिए थी।करना केवल यह था कि जिससे प्रेम करता उसे नदी किनारे ले जाता।बातों में उलझाकर उसे एक आत्मीय धक्का देकर नदी में ढकेल देता।

आपमें से कुछ लोग इसपर आपत्ति करेंगे।मगर बताइए,प्रेमिकाएं कहां कहां से नहीं ढकेली जा रही हैं।संस्कृति,परंपरा,मर्यादा,रिवाज वग़ैरह के जाने कितने गढ्ढे लड़कियों के लिए ही खोदे गये हैं।कि हे पुरुषों,प्रेम की बातों में फंसा कर लड़कियों को लाओ।ढकेलो।आगे बढ़ो।ठोक बजाकर शादी रचाओ।फिर स्त्री मुक्ति अभियान की फ्रेंचाइज़ी हासिल करो।मैं भी ढकेल देता तो क्या अनहोना हो जाता।

फिर यह भी हो सकता था कि जलदेवी मुझे तीन प्रेमिकाएं प्रदान करती।न मैं हिम्मत जुटा पाया न नैतिक शिक्षा कामयाब हुई।मैं अपनी शिक्षापद्धति को क्या मुंह दिखाऊं जिससे गुज़रने के बाद दहेज,तेज़ाब,हत्या,उत्पीड़न आदि के प्रति पढ़ेलिखे आदमी की आस्था बढ़ जाती है।कानून उसे सुबह शाम टहलाने वाला जीव नज़र आने लगता है।

यह पश्चाताप कुछ पारिवारिक है।जैसे हर कामयाब पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है वैसे ही हर नाकामयाब प्रेम के पीछे एक बाप होता है।मैं इसी मान्यता का एक उदाहरण हूं।बाकी तो सब जाने दीजिए जो एक बापीय पद्धति में होता है,वे मुझे एक कायदे की बाइक भी नहीं दिला पाए थे।बहुत कहा तो एक सेकेंड हैंड दिलवाई।उसने क्या क्या किया,यह जानने के लिए बस एक घटना सुनाता हूं।एक शाम बहुत रचनात्मक संघर्ष के बाद प्रणयप्रवीणा बाइक पर बैठकर घूमने के लिए तैयार हुई।प्रेम के प्रगतिशील इतिहास में बाइक चलाने वाले के पीछे बैठने वाली का कितना जनवादी महत्व है यह कलावादी भी जानते हैं।समाजवादी इस सत्य को साइकिल के ज़रिए समझ सकते हैं।तो साहब।हम चले।चल पड़े।सड़क पर उपयुक्त गड्ढे आएंगे,मैं समुचित ब्रेक लगाऊंगा,पीछे वाली विधिवत हाथ लपेट लेगी ,मैं विधाता का धन्यवाद करूंगा आदि विचार मेरे मन में थे।पहला गड्ढा आता कि इससे पहले ही बाइक रुक गयी।बंद।मैं किक पर किक लगाता जाऊं।बाइक बेअसर।दस मिनट हो गये।तभी पीछे वाली हड़बड़ाई,'मैं भागती हूं।सामने से पापा आ रहे हैं।'वह तो एक ओर से विलुप्त।पापा नाम के प्राणी ने मेरे पास आकर अपनी बाइक रोकी।शायद उन्होंने दूर से पुत्री नाम के प्राणी को मेरे साथ देख लिया था।उन्होंने अपनी गाड़ी टिकाई और जाने क्या सोचकर मेरी गाड़ी स्टार्ट करने लगे।मुझपर जितना गुस्सा आया था सब बाइक पर उतार रहे थे।बाप के आगे बाइक भी हाथ जोड़ती है।स्टार्ट हो गयी।मेरा मन हुआ कि कहूं अब तो स्टार्ट हो ही गयी है,आप घर जाकर अपनी बेटी को यहां भेज दीजिए।कह न सका।वे चले गये।ओ गढ्ढों,ब्रेकों,बाहुपाशों मुझे माफ़ कर देना।

पिछले दिनों एक मनीषी ने कहीं घूमने गये अपने बेटे से मेरे सामने फोन पर कहा कि घूमो

। फिर लौटकर इसका विवरण लिखना।बातचीत के बाद मैंने कहा कि घूमने का आनंद लेने दीजिए।जो याद में ठहरेगा वह लिखा जाएगा ।मनीषी नाराज़ हुए।बोले,महत्व काम का नहीं उसके प्रचार का है।तुम घूमे।किसको पता।लिखोगे सब जानेंगे।इतिहास में दर्ज होना ज़रूरी।तुमने किसी की मदद की।क्या पता।उसकी फोटो खिंचे।छपे।तब बात बनती है।यह ज्ञान मिलते ही मैं अवसाद में हूं।मेरे प्रेम में न अफवाहें उड़ीं,न ख़बरें बनी,न चटखारे लिए गये।क्या किया मैंने।मैं प्रेम करके उसे इतिहास में न डाल पाया।बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा के ज़रूरी अध्याय से वंचित रहा।ओ जवानी और यौवन के तमाम पर्यायवाचियों !मुझे माफ़ कर देना।मैं प्रेम के नोट्स भी न ले सका।जिनके आधार पर कुछ लिखकर नाम कमाता।सुयोग्य लोग तकिया के नीचे काग़ज़ क़लम रखते हैं या स्मार्ट फोन पास में।इधर प्रेम से फ़ारिग हुए उधर नोट्स लिए।ओह।अब लेने का समय निकल चुका।

मैं पश्चाताप कर रहा हूं कि प्रेम में प्रेम ही क्यों किया।

hindi@pratilipi.com
+91 8604623871
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.