मैं एक पुरुष,मैं भी तो समाज का हि अंग हूँ,या यूँ कहुँ समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हूँ। आज पुरुष को सब आशंकित नजरो से देखते है।समाज में घटित हो रहे घटनाओं का दोषी क्या अकेला मैं हि हूँ?

इतनी सारी कानूनी नियम -कायदे बने है,सब नारी हित में हि है।इन नियम-कायदों के बीच एक मध्यम वर्गीय पुरुष अपने आप को दबा हुआ महसूस कर रहा है।कभी -कभी तो लगता है की पुरुष होना हि मेरे लिए अभिशाप बन गया है।

हम पुरुष ने , हर जगह नारी को खूद से आगे देखना पसंद किया।

उन्हें स्वत्रंता दि, उनके हर फैसले का सम्मान किया फिर भी ये कैसा समय आया,जो अब हमारे देश व् समाज में महिला दिवस और नारी सशक्तिकरण की आवश्यकता महसूस की गई।

मै जानना चाहता हूँ,उन तथ्यों को ढूंढ़ रहा हूँ,जो नारी सशक्तिकरण की वजह बनी।

ऐसा क्या करूँ,जो समाज मेरे पौरुष पर उँगली ना उठाये।गलतियां कुछ एक पुरुष द्वारा होती है ,और नियम बन जाता है पूरे पुरुष समाज के प्रति।आज तो ऐसा समय आ गया है,जब एक माँ अपनी बेटी को ,अपने पिता-भाई से अकेले में मिलने से मना करती है।आखिर क्या कसूर है हमारा जो हमे रिश्तो में भी दूरियां बनती नजर आती है।हम वही है जो अपने पूरे परिवार के सुरक्षा हेतू कभी भी पीछे नही हटते ,फिर भी शक की सूई हमारी तरफ हि घूमती है।

हां,मैं वही मध्यम वर्गीय समाज में जीने वाला एक साधारण पुरुष हूँ,जिसकी हैसियत भी ज्यादा नही होती ,फिर भी वह अपने बच्चों को महंगे स्कुल में पढ़ता है।अपनी पत्नी को अपनी हैसियत से ज्यादा महंगे कपड़े-गहने दिलवाता हैऔर खूद की आवश्यकता को सिमित करता रहता है,क्योकि पुरुष की असली खुशी परिवार के सदस्यों के चेहरे पर आई मुस्कान है।

सब जानते है,कभी कभी हमारे साथ भी शोषण होता है।कानूनी नियमों का फायदा उठाकर हमारा मानसिक और शारीरिक रूप से शोषण होता है।हम अपने स्वभाव के अनुसार कुछ बोल भी नही पाते पर तकलीफ तो हमे भी होती है ना।क्या करे?आखिर है तो इंसान ही ।अपने घर का छत होता है पुरुष,और आज उसी छत को अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराता नजर आ रहा है।जी मै वही छत हूँ,जो अपने परिवार को धूप, वर्षा की मार सहकर परिवार की रक्षा करना अपना पहला धर्म मानता हूँ,पर अब मै थक गया हूँ,।बाहरी आपदाओं की मार को सहते -सहते जर्जर हो चुका हूँ। अकेला व् सबसे उपेक्षित होने की वजह से दुखी रहने लगा हूँ।कोई मेरे दर्द को समझना हि नही चाहता।

इसी बात की तो तकलीफ है।

मै पुरुष हूँ तभी तो रो भी नही सकता अपनी हालत और हालात पर।खोखला इतना हो गया हूँ की डर लगता है की कही किसी दिन चरमरा कर टूट ना जाऊ,पर फिर भी क्या कोई समझ पायेगा एक मध्यम वर्गीय पुरुष का अनकहा दर्द।

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