यह नहीं प्रतियोगिता का मंच


यह नहीं प्रतियोगिता का मंच,

नहीं व्यर्थ की होड़ा होड़ी कर।

स्वयं को स्थापित करने को,

नहीं हरकत कोई घिनौनी कर।

         

            तू अपने उत्थान के लिये,

            स्वयं प्रयास करता रहे।           

            उठता रहे गिरता रहे,

            गिरता रहे उठता रहे।

 

कोई पथ प्रदर्शक मिल जाये अच्छा है,

कोई दिग्दर्शक मिल जाये अच्छा है।

गिर जाने पर कोई सँभाल ले,

मिल जाये कोई साथी अच्छा है।

 

             इस शब्द यज्ञ में सार्मथ्यानुसार,

             तू आहुतियाँ देता रह।

             उत्थान हेतु करता रह प्रयास,

             दंश आलोचना का सहता रह।

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