आम-तौर पर हिंदी व्यंग्य लेखन को सृजनात्मक लेखन माना जाता है. बुद्धि, चेतना, सरोकार, अनुभव और शब्द कौशल से इस सृजन का संपन्न होना माना जाता है. इस महान विधा का एक विशेष प्रकार सीजनात्मक लेखन है जिसे इस बदलते दौर में बड़ी तेज़ी से व्यंग्यकार-गण अपना रहे हैं.

सीजनात्मक लेखन की प्रक्रिया अत्यंत सरल है. चाहें तो इसे भाजी-तरकारी के सीजन के जरिये यों समझें-


गोभी का सीज़न चालू है. ढेर की ढेर आपके सामने आकर पसर गई है, अभी कल तक दो सौ की किलो मिल रही थी, अब दस की दो किलो है. इस ढेर में भी ठीक-ठाक ही दिख रही है, सो खूब खाने पकाने बाद भी इतनी बची कि बांटने-फेंकने में भी दिल नहीं जला.सूखी, तरी वाली गोभी और पकौड़े बनाए, आलू, बैंगन,मिक्स वेज़ के साथ पकाने के बाद भी बच गए तो आपने ढेरों घिस के परांठे बना लिए, फिर अचार बना कर रख लिया, यहाँ तक कि भंडारे में भी पूरी के साथ बंटवा दिया. होते-होते इतनी बेज़ायका हो गई कि उबकाई आने लगी, पर ये गोभी सामने से नहीं टली.ऐसा होता है सीज़न किसी भी शै का. अब हिंदी व्यंग्य को इसी लाइन पर परखें- मुद्दे की गोभी ढूंढें नहीं मिल रही थी कि सीजन आ गया. मुद्दा एकदम ढेर में आके पसर गया. लेखक टूट पड़े. लूट जैसा माहौल हुआ.लाकर लेख में डाला, निबंध में मिलाया, कविता में घिस के डाला, वन-लाइनर तो टनों पकाए, अखबारी कालमों में तात्कालिकता के बेसन में लपेट-लपेट कर तला. गरज ये कि मुद्दे के बास मारने तक हमने उसे हर संभव व्यंजन में पका लिया.
सब्जी-मंडी के उदाहरण से सीजनात्मक लेखन समझ न आया हो तो मॉडर्न बाज़ार तंत्र से समझिये जहां सीजन ही बाज़ार का सार है. जैसा कि जन कवि ने कहा है-एक रुत आये इक रुत जाए, यहाँ सीजन बारामासी मज़ा देते हैं. एक के जाते ही दूसरा हाज़िर. बल्कि कतार में लगा होता है. मानसून सीजन गया ही था कि कोई फेस्टिवल सीजन आ गया, जिसके ठीक पीछे विंटर सीजन आने को बेक़रार खडा है. बीच में एक ज़रा-सी दरार सा अंतराल है, वहां ‘ऑफ-सीजन’ भी अड़ा हुआ है. हिन्दी व्यंग्य का मालगोदाम और बाज़ार भी कमोबेश इसी तर्ज़ पर चलता है. उधर सीमा-पार की खुराफातों की वजह से देश-भक्ति के सीजन की बयार चली और इधर पत्र-पत्रिकाओं में सीजन-प्रधान व्यंग्य का उत्पादन बड़े स्तर पर होने लगा. इन्टरनेट पर सोशल-मीडिया नामक मॉल के निजी शो-रूम में कविता-कहानी-टिप्पणी-आलेखों और वन लाइनर में पैक व्यंग्य खचाखच भर गया. ढेर के ढेर खपाऊ माल फेसबुक के हैंगरों में टंग गए. इनकी कीमत एक अदद लाइक, बधाई या थोड़ा महंगा हुआ तो छोटी-बड़ी टिप्पणियों से चुकता होने लगी. ब्लॉग और निजी साइट्स के गोदामों में पडा ब्रांडेड अनबिका माल भी इसी भभ्भड़ में झोंक दिया गया. जाने क्यों ऐसा भाव होता है इस सीजनल डिस्काउंट-सेल में कि ग्राहक मुफ्त में भी माल नहीं उठाएगा. साहित्य के आढती ग्रंथावालियों में सड़ता माल भी इस तथाकथित ताज़ा माल में मिलाने लगे. एक सीजन ऐसा भी आया जिसमें कुछ शाश्वत साहित्य की विंटेज कार रैली–सी की गई. जैसे निराला या प्रसाद जन्म-शती पर उनकी अब भी फर्राटे से चलने वाली महान रचनाओं का लुत्फ़ उनके चाहने वालों ने ऊपर बताये अंदाज़ में भी ली. कृषि मंत्रालय की सरकारी अधिसूचना हिन्दी साहित्य के ग्रामीण या आंचलिक साहित्य के सीज़न शुरू होने की उद्घोषणा सिद्ध हुई. इस मौके पर होरी धनिया के साथ प्रेमचन्द और मैले आंचल में लपेट कर रेणु को अपनी टिप्णियों से पालिश कर सोशल मिडिया पर अपने निजी वालों पर लटका देने की होड़ चली. उधर व्यंग्य का मौसम विभाग सीज़न की आमद को एक विशेष फार्मूले पर तय करता है. ताज़ा राजनीतिक घटनाओं पर अखबारों के हैडलाइन इनका ट्रिगर होते हैं. इधर घटना रिपोर्ट हुई, उधर उत्पादन शुरू.हिन्दी का व्यंग्यकार बड़ा तेजस्वी किसान है, साल में हज़ारों फसलें काट लेता है. कोई भी सूचना या समाचार उसकी उर्वर बुद्धि में व्यंग्य का बीज बो सकता है. ये बात दीगर है कि उपज व्यंग्य ही हो ज़रूरी नहीं.
यों अन्य विधाएं भी जियादा पीछे नहीं, पर हिन्दी व्यंग्य प्रमुख रूप से एक सीज़न-प्रधान विधा है. व्यंग्यकार से अपेक्षा रहती है कि वो बदलते मौसम पर नज़र रखे और मौसमी प्रवृत्तियों की काल उधेड़ कर दिखाए, पर वो सीज़न पर ही फोकस करता है. उसके लिए सीजन घटनाओं का समुच्चय होता है, अवसरों का मंच होता है और बहती गंगा में हाथ धोने को भेड़ों की लाइन में लग जाना होता है. हिन्दी पखवाड़ा आया, हिन्दी को कुछ आहुतियाँ दे दीं, अगले रोज़ श्राद्ध आये तो अपने दिवंगत सगे पिताजी को व्यंग्य में घसीट लिया. इसी बीच बापू-बापू का हल्ला हो गया तो मुन्ना भाई की तर्ज़ पर तीन चार सौ शब्दों की बापूगिरी कर ली. अक्सर जब व्यंग्यकार को सीज़न से विज़न न मिल रहा हो तो वो खुद ट्रेंड रच लेता है. किसी बड़े लेखक पर कोई छोटी टिप्पणी कर देता है, सब उस पर बहसने लगते हैं तो कुछ पुराने संस्मरण, कटिंग-सटिंग, फोटो-सोटो चिपका कर एक लघु नहीं तो सूक्ष्म टाइप ही सीज़न चला ही देता है. एक दो रोज़ या अगला सीज़न आने तक इतनी चर्चा हो लेती है कि मरहूम जन्नत या जहन्नुम जहां भी हों करवटें बदलने लगें.
हिंदी व्यंग्य का सबसे लोकप्रिय सीजन है - पुरस्कार का सीज़न. साल में दस-बीस पुरस्कारों की घोषणा हो ही जाती है. अक्सर पुरस्कार जुगाड़ीलालजी झटक ले जाते हैं और अनवरत शर्मा हर बार रह जाते हैं. इस पर जी भर के रचा जाता है. आप भी पिछले सम्मान के मौके पर जमे झगडे पर लिखे में इधर-उधर कलम मारकर एक कालम या पोस्ट- भर व्यंग्य और रच लेते हैं.


इस तरह कह सकते हैं कि व्यंग्यकार के सीज़न हज़ार.दायरा अनंत है. गणतंत्र से चले तो वेलेंटाइन को निबटाया, होली तो विशेषांक ही रहा, एक लंबा सीज़न डेंगू-चिकनगुनिया का भी आया. एक सजग व्यंग्यकार संसद से बस्ती के नाले तक किसी विषय को अछूत नहीं समझता. पर सीजन की अंधी दौड़ में कच्चा-पक्का माल परोस कर व्यंग्य की रेटिंग गिराने से पहले आलू जैसे सदाबहार मुद्दों पर भी गौर कर लें. चुटकुले रचने वाले कई बार सामयिक कालमी व्यंग्यों से अधिक चुटीले तंज कर जाते हैं. आप तो प्रवृत्तियों पर गौर फरमाएं.राजनीतिक आचरण की ही इतने अश्लील परतें हैं कि उन्हें उधेड़ते चले जाएँ तो भी कई सीज़न तक पूरा न खुले. अरे इतनी दूर भी क्यों जाना, कबीर की तरह बुराई की तलाश अपनी गिरेबान में ही कर लें तो बेईमानी का एक अंतहीन सीज़न चल पडेगा और अखबारों के तमाम कालम रंग जायेंगे

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