बिन्दिया-बलिदानी

महेंद्र यादव

बिन्दिया-बलिदानी
(5)
पाठक संख्या − 373
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सारांश

____ बस एक कुत्ता था, जो बार-बार राघव के निश्चल शरीर को सूंघ रहा था। उस निर्जीव चेहरे पर मौत का भय नहीं,मिलन की खुशी थी। हो भी क्यों ना, इतने दिन बाद जो जा रहा था अपनी बिन्दिया से मिलनें...!
Gyanendra
महेंन्द्र भाई भाषाशैली अतिउत्तम है।बस थोड़ा सा सुधार हो सकता है,पाठकों को आकृष्ट करने के लिए बिन्दिया की स्कूली जिन्दगी को ,दोस्तों को उसके घर से जोड़ देते तो एक तरफ ग्रामीणों के दिलों में उसके अौर उसके परिवार के प्रति विरोधाभास होता दूसरी तरफ बिंदिया के परिवार में बिटिया के प्रति प्रेम में अति प्रगाढ़ता प्रस्फुटित होती । इसके बाद पाठक कहानी में खो जाता ,फिर बाद में दर्शाया मार्मिक चित्रण दिल जीत लेता यार। बहुत बढ़िया प्रयास ढ़ेर शुभकामनाएं
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Mohit
सुन्दर कहानी :)
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Ashutosh
बड़ी बात कहती हुयी एक लघु कथा। समाज की जड़ता और रूढ़ि पर एक प्रहार कर रही है। अंतिम का पैरा समाज मे सामाजिकता के लोप और मनुष्य मे कम होती जा रही मनुष्यता को इंगित कर रहा है। कुत्ते के माध्यम से जिस तरह लेखक ने आज के स्वार्थी मानव को जानवर से भी बदत्तर दिखाया है वो क़ाबिले तारीफ़ है। एक उम्दा रचना।
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arun
bahut acche mahendra ji .. aapki kahani padh kr beete dino ki ek madhur yad mn me utar si gai ... vo yad jb kbi yesi hi kahaniyo k pichhe hum paglo jaise apne pustkalya addychh ji se vinti krte ki hme yeh pustak chahiye jaise jaise b ho ..kisi or ko nhi milni chahiye ye to bs hme chahiye. bahut bahut dhanywad.
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Ritu
बहुत सुन्दर . आपकी कहानी ज्यादातर दुखांत क्यों होती हैं .. हमेशा दुःख और जुड़ाव दे जाते हैं कहानी के पात्रो के साथ ..
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